बड़े शौक से सुन रहा था ज़माना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते कहते !

"In Quest of Utopia" -
Remembering Manoj Srivastava

11.08.1955 - 13.08.2020

Tribute

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मनोज का ओज

श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव

श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव, भारतीय सिविल सेवा के वो अधिकारी जो अधिकारी कम और जननेता अधिक थे।  एक आईएएस लोगों के दिलों में कैसे घर कर सकता है और खुद ज़मीन से जुड़कर सतह पर योजनाओं को किस प्रकार आकार दे सकता है, इस बात की मिसाल थे मनोज श्रीवास्तव। हमेशा जीवंत और उत्साह से भरे रहने वाले विद्वान आईएएस श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव ने वर्ष 2020 में दुनिया को अलविदा कह दिया।

1980 में देश की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा के शीर्ष रैंक में जगह बनाने वाले श्री मनोज ने 35 साल के लंबे करियर में वास्तविक दुनिया की नीतियों और शासन की चुनौतियों का समाधान करने के लिए अथक प्रयास किया। सेवा अवधि के दौरान न केवल आम लोगों के सरोकारों से वे जुड़े रहे बल्कि कॉर्नेल, कैंब्रिज, एमआईटी और एलएसई से अपनी अकादमिक रुचियों को भी पूरा करते रहे। देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने उनके मरणोपरांत उनके सम्मान में समाजशास्त्र विषय में विद्यार्थियों के लिए स्वर्ण पदक की घोषणा की। सेवानिवृत्ति के बाद, वे जेएसडब्ल्यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद (आईआईएमए) में विशिष्ट फेलो रहे।

श्री मनोज जब तक सेवा में रहे अपनी उपलब्धियों और कामों का झंडा गाड़ते रहे। रांची में डिप्टी डेवलपमेंट कमिश्नर (डीडीसी) के रूप में उनके द्वारा परिकल्पित और कार्यान्वित किए गए ‘क्लस्टर दृष्टिकोण’ की पूर्व प्रधानमंत्री माननीय डॉ. मनमोहन सिंह ने भी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। साथ ही, पूर्व प्रधानमंत्री माननीय श्री राजीव गांधी के नेतृत्व में शुरू की गई पीएम-डीएम कार्यशालाओं में उनका योगदान, ‘बिहार शिक्षा परियोजना’ (बीईपी) का कार्यान्वयन कराना, जो अपनी तरह का पहला समग्र शैक्षिक सुधार कार्यक्रम था,  एक बीमार साबित हो चुके पर्यटन निगम को लाभ कमाने वाले संगठन में बदल देना, और बाढ़ के अभूतपूर्व संकट की चुनौती का सामना करते हुए सेना, वायु सेना, एनडीआरएफ और कई अन्य जिलाधिकारियों के साथ मिलकर एक प्रभावी आपदा प्रबंधन कार्य को सफल बनाना उनके कई अन्य उल्लेखनीय कार्यों में से हैं।

सेवा में रहते हुए, श्री मनोज श्रीवास्तव नए विचारों और ज्ञान को प्राप्त करने तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छात्रवृत्ति से जुड़े रहने के लिए भी प्रतिबद्ध रहे। इसी जुनून को पूरा करते हुए उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल डेवलपमेंट में मास्टर्स किया। इसके बाद उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक रिसर्च स्कॉलर के रूप में बिहार और बंगाल में शासन, रोजगार सृजन और शिक्षा कार्यक्रमों का व्यापक तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए एलएसई के पूर्व प्रो निदेशक तथा वर्तमान में डरहम विश्वविद्यालय (यूके) के कुलपति,  प्रोफेसर स्टुअर्ट कॉरब्रिज के साथ चुना गया था। इस शोध के ज़रिये प्रो. कॉरब्रिज के साथ लगभग 20 वर्षों तक एक लंबी शैक्षणिक साझेदारी रही, जिसके परिणामस्वरूप सह-लेखक के तौर पर कई प्रकाशन हुए, जिनमें प्रो. कॉरब्रिज एवं अन्य के साथ एक “सीइंग द स्टेट: गवर्नेंस एंड गवर्नमेंटलिटी इन इंडिया” शामिल हैं। (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2005)। उन्हें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी, यूएसए) में स्पर्स (SPURS) फेलो और क्राइसिस स्टेट्स रिसर्च सेंटर, एलएसई में रिसर्च फेलो के रूप में भी चयन का गौरव प्राप्त है। इसके अलावा, एलएसई एंटरप्राइज ने उन्हें भारत पर एक विशेषज्ञ योगदानकर्ता के रूप में आईडीई एग्लोबल की पत्रिका एशिया रीजनल मार्केट्स के लिए लिखने के लिए आमंत्रित किया। और उन्हें एलएसई द्वारा प्रदत्त “प्रो-पुअर गवर्नेंस इन इंडिया” पर प्रतिष्ठित जमशेदजी टाटा फैलोशिप के पहले प्राप्तकर्ता होने का सम्मान प्राप्त है।

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