एक विधिविहीन सेक्टर – सुजैन अब्राहम

बिना सुरक्षा के रोजगार देश के वर्किंग सेक्टर की एक अहम विशेषता बनती जा रही है। न केवल असंगठित क्षेत्र के कामगार बल्कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारी भी श्रम कानूनों के प्रावधानों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिस तेजी से महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए बाध्य होती जा रही हैं, श्रम कानूनों और योजनाओं को कागजों और सीमित क्षेत्र से निकालकर वृहद् संख्या तक पहुंचाना असल चुनौती बनता जा रहा है।

       वर्ष 2005 में कनफेडरेशन आॅफ इंडियन इंडस्ट्रीज ;सीआईआईद्ध ने कार्यस्थल पर महिला सशक्तीकरण के स्तर को   जांचने के लिए एक अध्ययन किया जिसके नतीजे चैंकाने वाले थे। अध्ययन के मुताबिक, काॅरपोरेट घरानों में महिलाओं की संख्या कुल श्रमबल का केवल 6 फीसद है। सीआईआई के अधीन महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय समिति की तत्कालीन चेयरपर्सन अनु आगा ने यह रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि देश की कुल आबादी में आधे से ज्यादा की हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं की संख्या मैनेजर स्तर तक अफसोसनाक स्तर तक कम है। फिर भी वर्किंग सेक्टर में मौजूद महिलाओं की परेशानी केवल संख्या बल को लेकर नहीं है बल्कि उस माहौल को लेकर है जहां उनका हद से ज्यादा शोषण किया जा रहा है। ग्यारहवीं योजना को लेकर जून, 2006 में योजना आयोग को सौंपी गई सामाजिक सुरक्षा कार्यसमूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र में कुल 39.7 करोड़ कर्मचारी काम कर रहे हैं। इनमें से केवल 7 फीसद लोग ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं और रजिस्टर्ड कंपनी या फर्म से नियमित वेतन का लाभ उठा पा रहे हैं जबकि बाकी के 93 फीसद लोग असंगठित क्षेत्र में हैं और अनियमित रोजगार का दंश झेल रहे हैं। इनमें भी 12.39 करोड़ यानी करीब 96 फीसद महिला कामगार असंगठित क्षेत्र में हैं। 10.6 करोड़ महिलाएं गांवों में जबकि बाकी की महिलाएं शहरी क्षेत्र में काम करती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी 1981 के 19.7 फीसद की तुलना में वर्ष 2000 में बढ़कर 25.7 फीसद हो गई और वैश्विक स्तर पर श्रमबल के ‘स्त्री चरित्र’ को लेकर होने वाले बहस की यह एक बड़ी वजह बनी।    

       देखा जाय तो वैश्वीकरण ;ग्लोबलाइजेशनद्ध की नीति का महिला कामगारों की दशा और दिशा पर नकारात्मक असर रहा। बड़ी संख्या में महिलाएं उन कामों की ओर धकेली जाने लगीं जहां न तो पैसा था और न सुरक्षा। यही वजह है कि महिला प्रधानता वाले रोजगारों की तस्वीर बेहद फीकी नजर आती है। पुरुष कर्मचारियों की तुलना में महिलाओं की कमजोर सौदेबाजी क्षमता और नियोक्ता द्वारा लचीले कामगारों की चाहत ने महिलाओं को तेजी से असंगठित क्षेत्र में लाना शुरू किया। चाहे एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन हो या फिर गारमेंट इंडस्ट्री, जहां भी महिला कामगारों की संख्या 60 फीसद से अधिक है, वहां महिलाओं के लिए रोजगार सबसे निचले स्तर पर ही होता है। उनके लिए सबसे कम दक्षता और प्रशिक्षण वाले कामों का सृजन किया जाता है और सबसे कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा या दावे वाले काम दिये जाते हैं। काॅल सेंटर या बीपीओ जैसे कामों को छोड़ दिया जाय, जहां वेतन अच्छी होती है, तो अन्य जगहों पर स्थिति निराशाजनक ही है। 

       न केवल भारत में ही बल्कि पूरी दुनिया के श्रम बाजार में 1991 के बाद से बड़ा बदलाव आया है। उत्पादन का काम या तो छोटी इकाइयों और उद्यमों तक सिमट गया है या फिर उसमें बिखराव आ गया है। आउटसोर्सिंग का काम इस हद तक बढ़ा है कि करोड़ों लोग छोटी यूनिटों में या फिर घर बैठे कामों को पूरा करने में सक्षम हो रहे हैं। यानी उत्पादन सुदूर क्षेत्रों से संचालित हो रहा है। पचास साल पहले जब मशीनीकरण की शुरुआत हुई थी तब मजदूर या कर्मचारी पूरे उत्पादन प्रक्रिया की एक छोटी सी कील नजर आने लगे थे लेकिन आज वही कर्मचारी पूरी प्रक्रिया के छोटे-छोटे पहिये बन गये हैं जिनका मूल उत्पादन केन्द्रों से कोई प्रत्यक्ष संपर्क तक नहीं होता है। श्रम बाजार में आए इस बदलाव का परिणाम श्रम कानूनों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लाभों में बिखराव के रूप में सामने आया है और जब बात महिलाओं की हो तब तो लाभ शून्य में चला जाता है। हैरानी की बात है कि श्रम कानूनों में लाया गया पहला बदलाव वर्ष 2005 में 1948 के कारखाना अधिनियम में था जब महिलाओं को रात में काम करने पर पाबंदी लगा दी गई। इस बदलाव का कारण कथित रूप से महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षा और समानता प्रदान करना बताया गया था जबकि इसके कई बुरे नतीजे सामने आए। औरतों को समानता और सुरक्षा देने के लिए अन्य दूसरे बदलाव जो जरूरी थे उन्हें दरकिनार कर दिया गया। जाहिर तौर पर इस कानून को महिलाओं के लिए ऐच्छिक बनाया गया था लेकिन जल्दी ही कंपनियों ने इसे अनिवार्य बना दिया। केवल वस्त्र उद्योग के निर्यात विंग ने इस संशोधन का स्वागत किया क्योंकि वहां के संविदा पर बहाल कर्मचारी लंबे समय से अपने लिए किसी जरूरी संशोधन का इंतजार कर रहे थे। हालांकि जो एकमात्र सुरक्षा महिलाओं को मिली वो यह कि यदि वे रात्रि पाली में काम करती भी हैं तो उन्हें घर तक छोड़ने के लिए वाहन की सुविधा दी जाएगी। इसके अलावे महिलाओं के लिए मेडिकल सुविधाओं में बढ़ोतरी, प्रसवकालीन सुरक्षा या यौन उत्पीड़न से जुड़ी समस्याओं पर कोई विशेष प्रावधान न तो जोड़े गए और न ही उनमें संशोधन किए गए।

सीआईआई के 2005 के अध्ययन में कहा गया है कि वास्तव में मौजूदा श्रम कानूनों का महिलाओं को कोई विशेष लाभ नहीं मिल रहा है। चाहे वो काम की परिस्थितियों से जुड़ा कोई प्रावधान हो या यौन प्रताड़ना के लिए बनाई गई नीति क्योंकि प्रताड़ित करने वाले ज्यादातर लोग नीति निर्धारकों के स्तर पर ही होते हैं। कहा जा सकता है कि बिना सुरक्षा के रोजगार अब अपवाद नहीं बल्कि विशेषता बन गई है। जहां तक संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की बात है तो अपने लिए सुविधा और सुरक्षा के प्रावधानों का लाभ उठाने के संघर्ष में वे कमजोर और संख्या में कम होते जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र के कामगारों को कई कारणों से अब तक न तो पेशागत सुरक्षा मिल पाई है और न ही सुविधाएं। मौसमी और आकस्मिक रोजगार, कार्यस्थल का स्थायी न होना, काम करने की खराब परिस्थितियां, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच अच्छे संबंध न होना और कानूनी या सरकारी संरक्षण प्राप्त न होना इसके प्रमुख कारणों में हैं।  

दूसरी ओर महिला कामगारों की तस्वीर ज्यादा साफ है। असंगठित क्षेत्र में महिला और बाल कामगारों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ रही है, उनके लिए काम करने के घंटे अधिक लचीले होते जा रहे हैं, श्रम कानूनों तक उनकी पहुंच ज्यादा मुश्किल होती जा रही है। यहां तक कि संगठित क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के लिए भी कानूनों का लाभ उठा पाना टेढ़ी खीर है और ज्यादातर लाभ केवल कागजों तक हैं। ऐसे में फुलटाइम रोजगार का स्थान पार्टटाइम, अस्थायी और अनिश्चित रोजगार ने ले लिया है।

विशेषकर जबसे संविदा पर कर्मचारियों को बहाल करने की नीति और कानून, 1971 लागू किया गया है, नियोक्ताओं के लिए कामगारों को सुविधाओं और लाभों से वंचित रख पाना और भी आसान हो गया है। उत्पादन की प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा छोटी इकाइयों में बांटा जाने लगा है ताकि कर्मचारियों को लाभ के घेरे में आने से रोका जा सके। दुःख की बात ये है कि सरकारें संविदा पर बहाली करने वाली सबसे बड़ी नियोक्ता है और वही श्रम कानूनों का सबसे ज्यादा उल्लंघन करती हैं या उनसे बचने के उपाय तलाशती हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि कांट्रैक्ट लेबर एक्ट संगठित और असंगठित क्षेत्र में असुरक्षा और अनिश्चितता लाने की सबसे बड़ी वजह है। हालांकि मनरेगा एक आशा की किरण है लेकिन इसमें भी सबसे बड़ी बाधा ग्रामीण महिलाओं का संगठित न होना है। उदारीकरण के बाद के दौर में ग्रामीण महिलाओं को संगठित या जागरूक करने की दिशा में बहुत काम नहीं हुए हैं। ऐसे में मनरेगा के झंडे तले उन्हें एकत्र कर पाना मुश्किल नहीं है। इस दिशा में गुजरात में शुरू की गई ‘सेवा’ जो कि महिलाओं की स्वयं सहायता समूहों का संगठन है और आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं की बहाली जैसे कदम महिलाओं को संगठित करने की दिशा में कारगर हो सकते हैं।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं गांवों से होती हैं और अपेक्षाकृत गरीब हैं। वे आसानी से कम पैसे और सुरक्षा के बीच काम करने को राजी हो जाती हैं। गर्भावस्था और बच्चों की देखभाल से जुड़ीं उनकी जिम्मेदारियों के प्रति नियोक्ता अक्सर कड़ा रुख अपनाते हैं जिसके कारण उन्हें अपनी नौकरी बीच में ही छोड़नी पड़ती है। इसके अलावे संगठित और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए बने कानूनों की पहुंच 90 फीसद कर्मचारियों और मजदूरों तक नहीं हो पाती है। इन कारणों को गंभीरता से लेना होगा और महिलाओं के लिए बन रहे नए और पुराने सेक्टरों में भी सामाजिक नीतियों को कड़ाई से लागू करना होगा।      

लेखिका का यह आलेख इंफोचेंजइंडिया.काम में

प्रकाशित उनके आलेख का हिन्दी रूपान्तरण है।