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अपनी जिम्मेदारी से न भागें मां-बाप डा. बिंदा सिंह प्रसिद्ध क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट, बिहार

13 साल की बच्ची क्या जानती थी इस दुनिया के बारे में। रिश्तों को उसने मम्मी, पापा और भाई में ही समझा था जो विश्वास और प्रेम से भरे थे। इसलिए फेसबुक पर जब उसे एक ‘दोस्त’ मिला तो वह भी उसे उन्हीं रिश्तों जैसा लगा। दोस्ती परवान चढ़ी और ‘दोस्त’ ने उसे मिलने के लिए बुलाया। खुशी से झूमती वह बच्ची अपने ‘दोस्त’ से मिलने गई लेकिन जब लौटी तो ………..!

हमारे आस-पास की ही कहानी है यह और अगर हम नहीं चेते तो हमारे घर की भी हो सकती है। वह बच्ची कभी सामने तो कभी छिपकर फेसबुक पर चैट किया करती थी। मम्मी ने देख लिया तो डांट दिया वरना कोई बात नहीं। उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनकी बेटी किसके साथ चैट कर रही है। उसका वो तथाकथित दोस्त कौन है। और नतीजा सबके सामने है। सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन जब बच्चे उसका इस्तेमाल कर रहे हों तो सचेत और सतर्क रहना मां-बाप की जिम्मेदारी है।

पटना की ख्यात क्लीनिकल साइकालाजिस्ट डा. बिंदा सिंह बताती हैं कि वर्चुअल फ्रेंडशिप के दौर में सभी को सावधान रहना जरूरी है। चाहे वो कोई बच्चा हो या वयस्क। क्योंकि इंसान का ये स्वभाव होता है कि वह गलत चीजों की ओर जल्दी आकर्षित होता है और अच्छी बातों की अनदेखी करता जाता है। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर फर्जी नाम से आकर्षक अकाउंट बनाने वाले लोगों की कमी नहीं है जो मासूम लोगों को ‘दोस्त’ बनाकर उनके साथ खिलवाड़ करते हैं। डा. बिंदा कहती हैं कि अभिभावकों को न तो बहुत ज्यादा सख्ती से और न ही अत्यधिक ढिलाई से पेश आना चाहिए। उन्हें अपने बच्चों के साथ दोस्त की तरह रहने और अपने साथ हर बात साझा करने की उनमें आदत डालनी चाहिए। मां-बाप को बच्चों के साथ भावनात्मक संबंध विकसित करना चाहिए ताकि वे उनसे डर कर या शरमा कर कोई बात छिपा न सकें। इसके अलावा एक बात जो महत्वपूर्ण है वो यह कि बच्चों का कम्प्यूटर कामन रूम या हाल में रहना चाहिए जिससे वे जो करें सबके सामने करें। प्राइवेसी के नाम पर बच्चों में गलत आदत न पड़े इसका ध्यान रखना चाहिए। साथ ही छोटी उम्र में बच्चों को स्मार्ट फोन देने से भी बचना चाहिए। डाॅक्टर कहती हैं कि लगातार सोशल मीडिया में रहने वाले किशोरवय बच्चे अक्सर पहचान की संकट से गुजरने लगते हैं। वर्चुअल रिश्तों में रहते-रहते वे अपने वास्तविक रिश्तों को ही बिगाड़ने लगते हैं जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है।

इसी तरह टीवी पर बच्चे क्या देख रहे हैं यह देखना भी मां-बाप का ही काम है। छोटे या किशोर उम्र के बच्चों के साथ बैठकर टीवी देखने से पहले ये जान लें कि दिखाए जाने वाले धारावाहिक या फिल्म कैसी है। केवल अपने मनोरंजन के लिए उनका भविष्य खराब करने से बचना चाहिए। हिंसक, डरावनी और सेक्स आधारित फिल्में या कार्यक्रम बच्चों के साथ न देखें और न ही उन्हें देखने दें। डा. बिंदा सिंह कहती हैं कि बच्चे एक्सपेरिमेंटल स्वभाव के होते हैं। वे जो देखते हैं उसे खुद करने की कोशिश करते हैं। कई बार छोटे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए हम कार्टून चैनल लगा देते हैं और खुद काम में लग जाते हैं। लेकिन हमें देखना होगा कि उक्त कार्टून की भाषा कैसी है और उसके चरित्र क्या सिखा रहे हैं। कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे के साथ हम खुद भी बैठकर कार्टून देखें ताकि उसके अच्छे-बुरे प्रभाव को जान सकें। साथ ही बच्चों के टीवी देखने का समय भी तय करना चाहिए। ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चे ज्यादा खाने की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं और उनमें शारीरिक कार्य करने की क्षमता घट जाती है। वे दौड़ने या आउटडोर गेम खेलने से कतराने लगते हैं जो उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।

किशोरावस्था को जीवन का सबसे नाजुक और संवेदनशील हिस्सा मानते हुए डा. बिंदा कहती हैं कि इस उम्र के बच्चों की समस्याओं की ओर सभी को ध्यान देना होगा। परिवार से लेकर सरकार तक को इस उम्र की जरूरतों और मनोभावों को समझना होगा। वे कहती हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे-बच्चियों अथवा झुग्गियों और स्लम में रहने वाले बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक सभी प्रकार की बातों की सही जानकारी देना बहुत जरूरी है। निजी स्कूल तो अपने स्तर से किशोर छात्र-छात्राओं की काउंसिलिंग कराते हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में कोई काम नहीं हा रहा। वहां भी बच्चों को सेक्स, मासिक चक्र और अपने शरीर से जुड़ी अन्य बातों के बारे में बताना चाहिए। इसके लिए किसी प्रोफेशनल काउंसिलर की मदद लेनी चाहिए और विशेषकर लड़कियों के स्कूल में महिला काउंसिलर को ही जाना चाहिए। साथ ही घर में मां-बाप यदि अपने बच्चों को इन चीजों के बारे में बताएं तो बच्चे गुमराह होने से बच जाते हैं। वे बताती हैं कि किशोर उम्र के बच्चे कई तरह की भ्रांतियों में पड़कर गलत रास्ते पर चल देते हैं जो अंततः उनके लिए घातक सिद्ध होता है। गुप्त रोगों के इलाज के नाम पर पैसे वसूलने वाले झोलाछाप डाक्टर ऐसे बच्चों का गलत फायदा उठाते हैं।

डा. बिंदा सुरक्षित और खुशहाल बचपन के लिए स्कूलों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। हर बच्चा आत्मविश्वास से पूर्ण हो इसके लिए जरूरी है कि हर बच्चे को मौका मिले। स्कूलों में शिक्षक इसमें महती भूमिका निभा सकते हैं। केवल कुछ ही बच्चों को तरजीह न देकर उन्हें हरेक बच्चे की प्रतिभा को समझने और उसे सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके अलावा स्कूलों में सेक्स एजुकेशन और नैतिक मूल्यों दोनों की शिक्षा दी जानी चाहिए तभी हम कामयाब कल की उम्मीद कर सकेंगे।

स्कूलों की जवाबदेही बढ़ी, भरोसा घटा – पूजा अवस्थी

 

लखनउ के सबसे पुराने स्कूलों में से एक ला मार्टिनियर ब्याएज काॅलेज में कक्षा छह के छात्र विराज कालरा को लंबे बाल रखने के कारण उसके शिक्षक ने चांटा मार दिया। विराज के पिता अमीश ने स्कूल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जिसमें उनका साथ पहले से ही स्कूल को चुनौती दे रहे कुछ अन्य अभिभावकों ने भी दिया। अमीश का कहना है कि उन्होंने प्रिंसिपल के अड़ियल और बुरे बर्ताव के कारण उनके खिलाफ शिकायत की है। अमीश के मुताबिक, प्रिंसिपल ने माफी मांगने के बजाय उन्हें धमकी दी कि उनके बच्चे को स्कूल में होने वाले किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेने दिया जाएगा। प्रिंसिपल के इस रवैये से आहत अमीश ने राज्य के बाल अधिकार संरक्षण आयोग में शिकायत दर्ज कराई जिसने स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगा लेकिन स्कूल ने कोई जवाब नहीं दिया। इसी बीच गर्मी की छुट्टियां हो गईं। कई रातों तक बेचैन रहने और मामले में कोई प्रगति नहीं देखकर अमीश ने अपने बच्चे को स्कूल से हटा लेने का फैसला लिया। ये वो स्कूल है जहां अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना लखनउ और उसके बाहर के भी माता-पिता देखा करते हैं।

कालरा का मामला स्कूल और पेरेंट के बीच के बदलते रिश्तों को दर्शाता है। अब पेरेंट स्कूल के ब्रांड के नाम पर कुछ भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं बल्कि अब वे उस ग्राहक के तौर पर पेश आते हैं जो पैसा देने के बदले अच्छी सेवा पाने का हक जताते हैं। क्लीनिकल साइकोलाॅजिस्ट कृष्णा कुमार दत्त कहती हैं कि उपभोक्तावाद ने शिक्षा को भी प्रभावित किया है। अभिभावक शिक्षा के खरीदार के रूप में सामने आ रहे हैं। उनके मन में स्कूल के लिए वो सम्मान नहीं रह गया है जो पहले हुआ करता था। मीडिया भी स्कूलों की गलत छवि पेश करने का काम कर रहा है। महानगर गल्र्स स्कूल की प्राचार्या श्रुति सिंह कहती हैं कि आज के पेरेंट स्कूलों से अप्राकृतिक उम्मीदें करने लगे हैं। कोई स्कूल ये कैसे जान सकता है बच्चे ने घर में दूध पीया है या नहीं अथवा उसने घर में कितनी देर टीवी देखा है। बाल अधिकारों के प्रति पेरेंट में बढ़ती जागरूकता के कारण भी स्कूलों और अभिभावकों के रिश्तों में बदलाव आया है। इसके अलावा संयुक्त परिवारों के टूटने के बाद पेरेंट चाहते हैं कि स्कूल ही उनके लिए परिवार के सदस्यों का काम करे।

हालांकि इन सब बदलावों को नकारात्मक नहीं कहा जा सकता है। जैसा कि एक सर्वे ‘प्राइवेट स्कूलिंग इन इंडिया: ए न्यू एजुकेशनल लैंडस्केप, 2008-इंडिया ह्यूमेन डेवलपमेंट सर्वे’ में भी कहा गया है कि मिडिल क्लास गैर सरकारी स्कूलों पर पेरेंट की बढ़ती निर्भरता ने स्कूल और शिक्षकों की  जवाबदेही को बढ़ाया है और इससे स्कूलों में माहौल बदला है। कुछ हद तक यही स्थिति सरकारी स्कूलों में भी है जहां अभिभावक अपना विरोध दिखाने लगे हैं। जैसा कि जुलाई, 2015 को हुआ जब लखनउ के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में मिड डे मील का दूध पीने के बाद 50 बच्चे बीमार पड़ गये तो नाराज अभिभावकों ने स्कूल में तोड़-फोड़ मचा दी थी।

शहर के कई स्कूलों में काउंसिलर का काम कर चुकीं शामा एन बताती हैं कि बच्चों की सुरक्षा के प्रति अतिचिंतित अभिभावकों की ओर से शिकायतों का आना बढ़ गया है। चूंकि वे खुद अपने बच्चों के साथ काफी कम समय व्यतीत करते हैं इसलिए बच्चे में थोड़ा सा बदलाव देखने पर भी चिंतित और अतिप्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। शोमा कहती हैं कि बच्चे भी जोड़-तोड़ करने में माहिर होते हैं। वे जानते हैं कि क्या करना है जिससे माता-पिता की ‘ना’ ‘हां’ में बदल जाएगी और वे ऐसा ही बर्ताव करने लगते हैं। यहां पर मां-बाप को समझना होगा कि बच्चे की ‘सीमा’ कहां तक है और उसे पार करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। वे बताती हैं कि एक बार एक हाइपरएक्टिव बच्चे का मामला उनके सामने आया जब बच्चे के मां-बाप ने शिकायत की कि उनके बच्चे का रिजल्ट लगातार खराब होता जा रहा है। शिक्षकों ने बताया कि उनका बच्चा क्लास में बुरा बर्ताव करता है। शोमा कहती हैं कि मामले की तह तक जाने के बाद उन्हें पता लगा कि बच्चे की मां घर में एक आज्ञाकारी मां की तरह पेश आती हैं जो बच्चे को उन्हें मारने तक की इजाजत दे सकती है। घर में ऐसा माहौल पाने वाला बच्चा अपने बर्ताव को सामान्य मानने लगता है और समझता है कि ऐसा व्यवहार घर से बाहर भी किया जा सकता है। वे कहती हैं कि ऐसे मामलों को बेहद संजीदगी से सुलझाने की जरूरत है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि स्कूल और पेरेंट्स के बीच विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। इसे सुधारने में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह लगातार प्रयास कर रही हैं। इसके लिए पब्लिक स्कूलों को ज्यादा जिम्मेदार और पारदर्शी बनाया जा रहा है। उन्हें अपनी फीस संरचना को सार्वजनिक करने, आठवीं तक के बच्चों को फेल नहीं करने तथा शारीरिक दंड बंद करने को कहा गया है। कालरा मामले में वे कहती हैं कि बड़े घरों के बच्चे जो बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं, अक्सर हमारे सुझावों को मानने से इंकार कर देते हैं। कालरा मामले में हम दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का समान मौका देना चाहते थे लेकिन स्कूल ने अपना पक्ष नहीं रखा।

प्राइवेट स्कूल अपनी फीस और छिपे हुए खर्चों को लेकर हमेशा विवादों में रहते हैं लेकिन फिर भी पेरेंट अपने बच्चों को उसी में पढ़ाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से अधिक स्कूल के बड़े नाम और सुविधाओं से मतलब होता है। 2011 में विप्रो और एजुकेशनल इनीशिएटिव द्वारा किये गये ‘क्वालिटी एजुकेशन स्टडी’ में पाया गया कि देश के 89 बड़े स्कूलों के बच्चे स्कूल की अपनी पढ़ाई पर भरोसा रखते हैं लेकिन उनमें नागरिक जिम्मेदारी, विविधताओं अथवा लैंगिक समानता जैसे विषयों पर बेहद कम संवेदनशीलता है। लखनउ के मिलेनियम स्कूल की प्रिंसिपल मंजुला गोस्वामी इस बात से इंकार करती हैं कि आज के दौर में पेरेंट को धमका कर बेवकूफ बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि जो मां-बाप केवल स्कूल का नाम देखकर बच्चे का दाखिला करवाते हैं और बदले में परेशानी ही पाते हैं उन्हें एक बार अपने फैसले पर सोचना चाहिए। पेशे से पत्रकार कुलसुम ताल्हा एक सिंगल मदर थीं और उन्होंने अपने बेटे का दाखिला शहर के एक अन्य प्रतिष्ठित स्कूल सेंट फ्रांसिस कालेज में करवाया था। वह अपने स्कूल की क्रिकेट टीम का कप्तान भी था। जब बारहवीं की परीक्षा पास आई तो स्कूल ने उनके बेटे को दो अन्य छात्रों के साथ परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी क्योंकि उनकी हाजिरी 60 फीसद से कम थी। प्रैक्टिकल परीक्षा के महज तीन दिन पहले उसे इस बारे में बताया गया। कुलसुम ने तुरंत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली और बेटे को परीक्षा देने की अनुमति मिल गई। स्कूल ने इस फैसले को चुनौती दी जिसके बाद लखनउ पीठ ने फैसले को बहाल रखा तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। वहां भी कुलसुम को जीत मिली। उनकी अपील पर क्लास की हाजिरी रजिस्टर को अदालत में लाया गया जिसमें पाया गया कि उनके बेटे को केवल उन्हीं दिनों में अनुपस्थित दिखाया गया था जब वो स्कूल की तरफ से क्रिकेट खेल रहा था! कोर्ट के फैसले से बौखलाए स्कूल ने बच्चे का रिजल्ट रोककर रखा ताकि वो किसी कालेज में दाखिला न ले सके। अंतत: कुलसुम को भारी फीस देकर मैनेजमेंट कोटे से बेटे का दाखिला पुणे के एक कालेज में करवाना पड़ा। कुलसुम ने बताया कि पूरी घटना से उन्हें मानसिक तनाव झेलना पड़ा, काम छोड़ना पड़ा और उनके बेटे का आत्मविश्वास टूट गया। वे पूछती हैं कि आखिर स्कूल की निगरानी कौन करेगा कि बच्चे वहां क्या कर रहे हैं। जब परीक्षा में छात्रों के बैठने या न बैठने का फैसला चार दिन पहले होता है तो फिर परीक्षा की फीस छह महीने पहले ही क्यों ले ली जाती है।

एक दूसरा मामला लेते हैं। नलिनी शरद शहर के मशहूर सिटी मोंटेसरी स्कूल की प्रिंसिपल रह चुकी हैं। 2011 में उनके कार्यकाल के दौरान 9वीं कक्षा के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। छात्र के अभिभावकों ने आरोप लगाया कि उनके बेटे को प्रिंसिपल ने डांटा और उसे अपनी पैंट उतारने के लिए मजबूर किया जिससे आहत होकर उसने आत्महत्या कर ली। अभिभावकों ने नलिनी के खिलाफ मामला दर्ज कराया और जो आज तक कोर्ट में है जबकि नलिनी रिटायर हो चुकी हैं। हालांकि पुलिस की जांच में उन्हें क्लीन चिट दी जा चुकी है लेकिन कोर्ट ने उस रिपोर्ट को मानने से इंकार कर दिया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में भी यह बताया गया कि रिजल्ट खराब होने की वजह से बच्चा तनाव में था और पिता की डांट से बचने के लिए उसने जान दे दी।   इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन आॅफ इंडिया के उपाध्यक्ष मधुसूदन दीक्षित स्कूल और गार्जियन के बीच बढ़ती संवादहीनता की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि फेडरेशन इस दूरी को कम करने की भरसक कोशिश कर रहा है। हालांकि इसमें उन्हें स्कूल और पेरेंट दोनों की तरफ से पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती है। वे कहते हैं कि स्कूल हमारे पास तभी आते हैं जब वे सरकार या किसी विभाग की ओर से परेशानी झेलते हैं जैसे कि पानी या बिजली जैसी समस्या तो दूसरी ओर अभिभावक स्कूलों में होने वाली बैठकों में भाग नहीं लेते लेकिन जैसे ही उनका बच्चा किसी मुसीबत में फंसता है तो वे हम पर दखल देने का दवाब डालने लगते हैं। शिक्षकों को केवल उनकी तनख्वाह से मतलब होता है। ये मानसिकता उनके बीच संवाद करने की संभावनाओं को खत्म कर देती है।

तारे जम़ीं पर – दीपिका झा

 

  • देश में 50 हजार अनाथ बच्चों को आज भी किसी का इंतजार है।
  • देश में करीब 30 हजार दंपति बच्चे के लिए तरस रहे हैं।

 

दो आंकड़े, दो तस्वीरें और एक-दूसरे से पूरी होतीं दो जरूरतें। चाहिए तो सिर्फ एक पहल। अगर हर बच्चे को मां-बाप मिल जाय और हर मां-बाप को एक बच्चा तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। लेकिन अफसोस कि अपने देश में बच्चा गोद लेने की दर पहले की तुलना में काफी घट गई है। ताज्जुब है कि नई सोच की पोषक और पुरातनपंथी मान्यताओं को नकारने वाली शिक्षा और बदलाव के बाद भी न लोग बदल रहे हैं और न सरकारें।

डेढ़ साल पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी कहा था कि लोग हर साल केवल 800 से एक हजार बच्चों को ही गोद ले रहे हैं। यह शर्मनाक है। दत्तक एजेंसियों की सुस्ती पर कटाक्ष करती श्रीमती गांधी की यह टिप्पणी देश में अनाथ बच्चों के प्रति संवेदनहीनता को उजागर करती है। इससे पहले वर्ष 2013-14 में 4 हजार बच्चों को गोद लिया गया था जो उससे पहले के सालों की तुलना में बहुत कम था। यानी देश में बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। ये स्थिति तब है जब सरकार ने दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किये हैं और उसे जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014 के साथ जोड़ दिया है। इसके अलावा अगस्त, 2015 में ‘चाइल्ड एडाप्शन रिसोर्स इंफार्मेशन एंड गाइडेंस सिस्टम’ यानी केयरिंग्स को भी लागू किया गया जो गोद लेने की लंबी प्रक्रिया को सीमित करता है और गोद लेने के इच्छुक अभिभावकों की भागदौड़ को कम करता है। इसके बाद भी देश में बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या में एक साल के भीतर 25 फीसद से ज्यादा की कमी हुई है। हालांकि आश्चर्यजनक रूप से देश के बाहर रहने वाले लोगों द्वारा यहां के बच्चों को गोद लेने की संख्या में इजाफा हुआ है।

देश के विभिन्न राज्यों के अनाथालयों में कितने बच्चे मौजूद हैं इसका सही-सही आंकड़ा तो किसी के पास नहीं है लेकिन 2013 में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने दावा किया था कि केवल 930 बच्चे ही अनाथालयों में रह रहे हैं। जाहिर है इस दावे में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है क्योंकि वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में जो आंकड़ा पेश किया गया है वह इससे 10 हजार गुना से भी ज्यादा है। इसके मुताबिक देश भर के अनाथालयों में करीब 11 मिलियन बच्चे किसी के द्वारा अपनाए जाने का इंतजार कर रहे हैं और इनमें 90 फीसद लड़कियां हैं। दूसरी ओर स्वयंसेवी संस्था चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन की मानें तो 2007 में देश में 25 मिलियन अनाथ बच्चे मौजूद थे। इनमें से हर साल केवल 0.04 फीसद बच्चे ही दत्तक ग्रहण प्रक्रिया द्वारा अपनाए जाते हैं।

पिछले पांच सालों में गोद लेने की दर में 50 फीसद की गिरावट आई है जो चिंतनीय है। बिहार, उत्तराखंड, झारखंड और पूर्वोत्तर के सातों राज्य अनाथ बच्चों के प्रति अधिक संवेदनहीन बने हुए हैं और वहां गोद लिये जाने की दर अत्यंत कम है जबकि दक्षिणी राज्यों में स्थिति थोड़ी ठीक है। हालांकि महाराष्ट्र जहां सबसे ज्यादा बच्चे गोद लिये जाते हैं, वहां भी इसकी दर घटी है और यह 2010 के 1606 के मुकाबले 2013 में घटकर 1212 हो गई थी। उत्तर भारत में पारंपरिक सोच और सरकार की उदासीनता का परिणाम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। पूर्वोत्तर में तो ऐसी कोई सरकारी दत्तक ग्रहण एजेंसी भी नहीं है जो लोगों को सही जानकारी देकर गोद लेने में उनकी मदद कर सके। यहां तक कि बिहार में 2007-08 के दौरान गोद लिये गये एक भी बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र नहीं बनवा सकी सरकार। सबसे बुरी स्थिति मेघालय की है जहां पिछले पांच वर्षों में केवल चार बच्चों को गोद लिया गया है। इसी तरह चंडीगढ़ में 2010 से 2014 तक मात्र 9 अनाथ बच्चों को मां-बाप मिल सके थे।

दरअसल बच्चा गोद लेने की इच्छा रखने वाले लोगों की अपेक्षाएं इतनी बड़ी होती हैं कि उनके पूरा होने की गुंजाइश काफी कम हो जाती है। ‘मर्फी बेबी सिंड्रोम’ से ग्रस्त लोगों को बच्चा स्वस्थ, सुंदर और गोरा चाहिए होता है जो बहुत कम ही संभव हो पाता है। यदि अपनी जैविक संतान बीमार हो या उसे कोई शारीरिक अपंगता हो तो मां-बाप उसे ठीक करने के लिए पैसा पानी की तरह बहाने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन एक गोद लिए बच्चे पर इतना खर्च करना वो नहीं चाहते। ऐसे में बीमार या अपंग बच्चों को कोई गोद नहीं लेना चाहता। इसके अलावा 85 फीसद लोगों को 0 से 1 साल तक के बच्चे की चाहत होती है। बेटे को गोद लेने की मंशा एक अलग कारण है क्योंकि देश के अनाथालयों में 90 फीसद लड़कियां हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विस्तार होने और आईवीएफ तथा सरोगेसी को अपनाए जाने के कारण भी लोगों में अनाथ बच्चों को गोद लेने की चाहत घटी है। भारत में अभी भी बच्चा गोद लेने का विकल्प सबसे आखिरी में आता है। वैसे दंपति जिन्हें अपनी संतान नहीं है वे शादी के बाद 20-20 सालों तक अपने बच्चे का इंतजार करते हैं लेकिन जब तक बच्चा गोद लेने का फैसला लेते हैं तब तक उनकी उम्र दत्तक ग्रहण कानून के मुताबिक गोद लेने लायक नहीं रह जाती। भारत में यदि दंपति की उम्र मिलाकर 90 वर्ष से ज्यादा हो जाय तो उन्हें बच्चा गोद नहीं दिया जा सकता है। देश में दत्तक ग्रहण कानून भी इतना लंबा खिंचने वाला है कि लोग इससे दूर भागने लगे हैं। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने में आम तौर पर साल भर से भी ज्यादा समय लग जाता है। इसकी वजह से बच्चा गोद देने का काला धंधा तेजी से फलने-फूलने लगा है। नर्सिंग होम और अस्पतालों से सीधे बच्चा गोद देने का कारोबार बढ़ रहा है जो न तो पकड़ में आते हैं और न ही रिकार्ड में। इसके अलावा गरीब मां-बाप द्वारा अपने बच्चों को बेचने के भी मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं जिसका फायदा लोग उठा लेते हैं। धोखाधड़ी का एक मामला 2010 में पुणे में सामने आया था जहां अनाथालय चलाने वाले एक व्यक्ति ने एक दंपति को एचआईवी पाजिटीव बच्चा एक लाख में बेच दिया था। जब बच्चे की मौत हो गई और दंपति को पता चला कि बच्चा पहले से ही एचआईवी पाजिटीव था तो उन्होंने आश्रम चलाने वाले व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और वह पकड़ा गया। उसी साल पुणे का सबसे बड़ा अनाथ आश्रम चलाने वाले जोगिन्दर सिंह भसीन को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया। भसीन पर आरोप था कि वह गरीब मां-बाप की संतानों को खरीद कर अनाथ आश्रम में ले आता था और फिर उन्हें महंगी कीमत पर विदेशियों को बेच दिया करता था। कानूनी तौर पर विदेशी दंपतियों को बच्चा गोद लेने के बदले 5 हजार डालर की राशि चुकानी पड़ती है जबकि चोर बाजार में उनसे 20 हजार डालर तक ले लिये जाते हैं।

दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में आने वाली परेशानियों और उससे होने वाले नुकसान की ओर केन्द्र सरकार का भी ध्यान गया है और संबंधित कानून में कई बदलाव किये गये हैं। विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट विभाग को साफ-साफ कह दिया है कि केवल जन्म प्रमाणपत्र की ही मांग न करें बल्कि अदालत में तय की गई आयु को भी मान्यता दें। इस आदेश के बाद कई लोगों को राहत मिली है। इसके साथ ही उन्हें यह भी आदेश दिया गया है कि विदेशी दंपति द्वारा गोद ली गई संतानों का पासपोर्ट जल्दी बनाया जाय ताकि वे जल्द से जल्द उन्हें अपने घर ले जा सकें। महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सुस्ती दिखाने वाले और खराब प्रदर्शन करने वाले एनजीओ को भी बंद करने की चेतावनी दी है और उन्हें अच्छा काम करने के लिए कहा है। हालांकि दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि दत्तक ग्रहण के कार्य से जुड़े सभी संगठनों को ‘कारा’ के अंतर्गत लाया जाय ताकि सभी की पर्याप्त निगरानी की जा सके। इस समय देश भर में केवल 400 एजेंसी ही ‘कारा’ से जुड़ी हैं। हर अनाथालय को इसके झंडे के नीचे लाना होगा। इसके अलावे उनका कहना है कि ‘कारा’ हर प्रक्रिया को आनलाइन करना चाहती है जो संभव नहीं है क्योंकि बच्चे को गोद लेना कोई मशीनी काम नहीं है बल्कि इसमें लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं। ‘कारा’ के इस रवैये से स्वयंसेवी संगठनों में नाराजगी है।

बड़े बजट में ‘छोटे’गुम – ईमंजरी

 

हर साल हमारी संसद करोड़ों-अरबों का बजट पास करती है। हर वर्ग, रोजगार, क्षेत्र और अवसरों से जुड़ी सैकड़ों योजनाएं लागू कराई जाती हैं। लेकिन क्या कभी इन बड़ी योजनाओं में उन छोटे-छोटे बच्चों को भी जगह मिलती है जो न तो अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतर सकते हैं और न ही राजनीतिक दवाब बना सकते हैं। अलबत्ता उन्हें तो अपने अधिकारों के बारे में पता तक नहीं होता। इसमें कोई शक नहीं कि बजट देश की तरक्की का आइना होते हैं और इसका मकसद संपूर्णता में देश का विकास करना होता है। लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बजट, नीतियों और योजनाओं को बनाने में बड़ा हाथ किसी न किसी ऐसे वर्ग का होता है जो सरकार के लिए वोट बैंक का काम करते हैं। महिलाएं, पिछड़ा वर्ग, किसान, कृषि श्रमिक और अन्य जाति आधारित वर्ग कहीं न कहीं सरकार के रहने या नहीं रहने को प्रभावित करते हैं और अपनी उपस्थिति से दवाब  का निर्माण करते रहते हैं। मगर बच्चे ! वे न तो वोट बैंक होते हैं और न ही दवाब समूह, फिर उनके बारे में सोचने की जहमत भला कौन उठाएगा ?

आंकड़ों में जाएं तो पाएंगे कि 90 के दशक में बच्चों पर होने वाला आवंटन 1.2 फीसद से बढ़कर 2006-07 में 4.91 फीसद तक पहुंच गया लेकिन असलियत में न केवल यह आवंटन बेहद कम है बल्कि इसे सही रूप में खर्च भी नहीं किया जाता है। जरूरत, आवंटन और इस्तेमाल में अभी भी बहुत अंतर है। ऐसे में जरूरत है सटीक ‘चाइल्ड बजटिंग’ की। यानी वह पैमाना जिससे नीति निर्धारकों को यह पता चल पाए कि बच्चों की जरूरतों के हिसाब से कितनी राशि का आवंटन किया गया है और कितने की और जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार कमेटी यानी यूएनसीआरसी का सदस्य होने के नाते भारत भी बच्चों के अधिकारों की संरक्षा को लेकर सतर्क है और इस दिशा में प्रयास चाहता है। यूएनसीआरसी कहता है कि बच्चों के अधिकारों को सर्वोच्च स्तर तक साकार करने के लिए बजट में आवंटन को बढ़ाने के हर प्रयास किये जाने चाहिए। इसके लिए उपलब्ध संसाधनों का संपूर्ण इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

भारत न केवल 1992 के बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का भागीदार है बल्कि यूएन के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल यानी एमडीजी को प्राप्त करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। इसके लिए 90 के दशक से लेकर अब तक की सरकारों ने बच्चों की बेहतरी और उनके हितों पर आधारित दर्जनों महत्वाकांक्षी योजनाएं भी बनाई हैं किंतु दुर्भाग्यवश उन योजनाओं में निर्धारित लक्ष्यों और प्राप्त परिणामों में मीलों का फासला है।

बजट 2016 में बच्चे

बात अगर मौजूदा हालात की करें तो निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि वर्तमान सरकार ने भी शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और पोषण जैसे अतिमहत्वपूर्ण बिंदुओं की उपेक्षा ही की है। विशेषकर उस आबादी के लिहाज से जो देश की कुल आबादी का 39 फीसद हिस्सा है। अलबत्ता वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में बच्चों का जिक्र तक नहीं किया। ये ठीक है कि पिछले वर्ष की 30 फीसद कटौती की तुलना में इस वर्ष के बजट में बच्चों की हिस्सेदारी 3.26 फीसद से बढ़कर 3.32 फीसद तक पहुंच गई है। लेकिन महज .6 फीसद की इस बढ़ोतरी से बच्चों का कितना भला होने वाला है, यह देखना होगा।

बच्चों के संपूर्ण विकास से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना आईसीडीएस यानी इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम में 2016 के बजट में 7 फीसद तक की कमी की गई है। इस बेहद जरूरी योजना में कटौती से संबंधित क्षेत्र हतप्रभ है। इसी तरह बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों में बंपर कटौती करते हुए उसे पिछले साल के 15,483.77 करोड़ से घटाकर 14,000 करोड़ कर दिया गया है। मीड डे मील स्कीम में पिछले वर्ष की तुलना में आवंटन 0.49 फीसद    से बढ़ाकर 0.74 फीसद कर दिया है जिसके बाद अब यह 9,700 करोड़ हो जाता है। बजट की घोषणा से ठीक पहले होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि देश की आबादी का सही इस्तेमाल करना है तो बच्चों के पोषण से जुड़े कार्यक्रमों में निवेश को बढ़ाना होगा लेकिन आईसीडीएस में कटौती कर सरकार ने अपने मंसूबे साफ कर दिये। यही हाल बाल सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का भी रहा। 2015 में जेजे एक्ट के लागू होने के बाद से जहां इस सेक्टर में अधिक निवेश की उम्मीद जताई जा रही थी वहीं सरकार ने 2016 के बजट में इसके मुख्य कार्यक्रम आईसीपीएस में आवंटन को 2015 के 402.23 करोड़ से घटाकर 397 करोड़ पर ला दिया। सर्वशिक्षा अभियान में 2.2 फीसद की वृद्धि की गई है और इसे पिछले वर्ष के 22,000 करोड़ से बढ़ाकर 22,500 करोड़ कर दिया गया है। हालांकि यह राशि अभी भी 2014 के 27,758 करोड़ से कहीं कम है।

बच्चों के लिए नीतियां

देश में पहले-पहल 1974 में बच्चों के अधिकारों और उनकी जरूरतों की ओर नीति निर्माताओं का ध्यान गया और एक राष्ट्रीय नीति का निर्माण किया। हाल ही में 2013 में बच्चों के लिए नई राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई जिसमें धर्म, प्रथा, संस्कृति तथा रिवाजों को परे रखते हुए देश के हर बच्चे के सम्मान, सुरक्षा और आजादी को बनाये रखने तथा उन्हें समान अधिकार और अवसर प्रदान करने के लिए जरूरी कदम उठाये जाने की प्रतिबद्धता दिखाई गई है।

नई राष्ट्रीय नीति कहती है कि

  • 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बालक कहा जाएगा।
  • बालपन जीवन का अभिन्न अंग है और इसका अपना महत्व है।
  • बच्चे किसी आम समूह का हिस्सा नहीं हैं बल्कि इनकी अपनी अलग जरूरत हैं जिनकी अलग प्रकार से पूर्ति की जा सकती है। खासकर भिन्न परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की आवश्यकताएं भिन्न होती हैं।
  • बच्चों के संपूर्ण विकास और संरक्षा के लिए दीर्घकालिक, स्थायी, एकीकृत और विशिष्ट प्रयास करने की जरूरत है।

1974 से लेकर अब तक सरकारों ने बच्चों के विकास, उनकी उत्तरजीविता और सुरक्षा से जुड़ी कई अन्य योजनाओं और नीतियों को भी लागू किया है।

बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति, 1974 : पहली बार नीतिगत रूप से बच्चों को देश के लिए संपत्ति माना गया। इसके तहत संविधान में प्रदत्त बाल अधिकारों और उनसे जुड़े प्रावधानों को लागू करने का लक्ष्य रखा गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की अधिकारों की घोषणा को भी लागू किया गया। इस नीति ने राज्यों के दायित्वों की रूप-रेखा तैयार कर दी जिसके मुताबिक बच्चे के जन्म से पहले से लेकर जन्म के बाद तक तथा बालपन के दौरान उसकी तमाम मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक विकास की जिम्मेदारी राज्यों की होगी।

शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति, 1986: इस वर्ष को सभी को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने तथा भेदभाव को समाप्त करने के लक्ष्य के साथ मनाया गया। महिलाओं, अनुसूचित जाति तथा जनजातियों को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्रीय नीति बनाई गई जिसके तहत छात्रवृत्ति, वयस्क शिक्षा, शिक्षकों की नियुक्ति, गरीब परिवारों के लिए अनुदान ताकि वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें और नई शिक्षा संस्थानों के निर्माण आदि की व्यवस्था की गई। बच्चों को केन्द्र में रखकर बनाई गई नीति के दौरान ‘आॅपरेशन ब्लैकबोर्ड’ भी चलाया गया जिसका उद्देश्य प्राथमिक स्कूलों में उपस्थिति को बढ़ाना था।

बाल श्रम को लेकर राष्ट्रीय नीति, 1987: देश में बड़ी संख्या में बाल श्रमिकों के होने की रिपोर्ट आने के बाद चिंतित सरकार ने 1987 में बाल श्रमिकों पर आधारित राष्ट्रीय नीति को लागू किया। यह नीति उन इलाकों में बच्चों के कल्याण को लेकर कटिबद्ध थी जहां बाल श्रमिकों की संख्या अधिक थी। इसके तहत बच्चों के हित में कार्ययोजना बनाने और उन्हें लागू करने पर जोर दिया गया।

राष्ट्रीय पोषण नीति, 1993: भारत लंबे अरसे से बच्चों में कुपोषण की समस्या को झेल रहा है। असल में कुपोषण भोजन, उत्तरजीविता और स्वास्थ्य के अधिकारों तक बच्चों की पहुंच न होने से उत्पन्न हुई समस्या है जो देश को दक्षता और कार्यक्षमता से जुड़ी कई अन्य परेशानियों  की ओर धकेल रहा है। 1993 में बनी पोषण नीति खाद्य उत्पादन एवं वितरण, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, शिक्षा, ग्रामीण व शहरी विकास तथा महिला एवं बाल विकास के क्षेत्रों में अल्पकालिक अथवा दीर्घकालिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000: इस नीति के अंतर्गत भी बच्चों के हितों को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया। इसने 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने, सभी बच्चों को सभी बचाव योग्य रोगों से मुक्ति के लिए टीकाकरण करने, जन्म, मृत्यु तथा विवाह का सौ फीसद पंजीकरण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने का लक्ष्य सामने रखा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2002: यह नीति हर देशवासी के लिए एक निर्धारित स्तर तक अच्छे स्वास्थ्य की गारंटी देती है। इसके लिए गैरकेन्द्रीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्र्रणाली तक आम आदमी की पहुंच को आसान बनाने पर जोर दिया गया। साथ ही पहले से मौजूद आधारभूत संरचनाओं को दुरुस्त करने और नई संरचनाओं के निर्माण का भी लक्ष्य रखा गया।

बच्चों के लिए नेशनल चार्टर, 2003: बच्चों की मौलिक जरूरतों को पूरा करने में नागरिक समाज, समुदाय और परिवार की भूमिकाओं को तय करने का काम नेशनल चार्टर ने किया। इसने हर बच्चे के जीने, स्वस्थ रहने और खुश रहने के अधिकार की वकालत की। इसके लिए पिछड़े परिवारों के बच्चे, गलियों में रहने वाले और लड़कियों को टारगेट समूह में रखकर राज्यों और समुदायों की जिम्मेदारी तय की गई।

 

बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना, 2005: भारत सरकार ने वर्ष 2005 में इस कार्ययोजना को अपनाया था जिसका लक्ष्य था बच्चों के हित में और उनकी सुरक्षा के लिए हर उपाय को अपनाना। इसके तहत जिन बातों को प्राथमिकता दी गई उनमें कन्या भ्रूण हत्या को रोकना, कन्या शिशु हत्या को रोकना, बाल विवाह को समाप्त कर बच्चों को आजादी से जीने का अधिकार देना, लड़कियों को सुरक्षा देना और उनके विकास के लिए लगातार प्रयास करते रहना। इसके अलावा कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना, बच्चों के सभी वैधानिक और सामाजिक जरूरतों की रक्षा करना और उनका हर प्रकार के उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा से बचाव करना। बच्चों से जुड़ी हर बात की समीक्षा करने और उन्हें अपडेट करते रहने के लिए सरकार ने कई अन्य योजनाएं भी शुरू की हैं।

महत्वपूर्ण है राज्यों की भूमिका

यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘चाइल्ड बजटिंग इन इंडिया’ में केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच की दूरी को चाइल्ड बजटिंग के मार्ग में बड़ी बाधा माना गया है। इसमें साफ कहा गया है कि इस दिशा में राज्यों को खुद आगे आना होगा और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बजट आवंटन की अगुवाई करनी होगी। वे राशि के लिए कुछ हद तक केन्द्र पर निर्भर जरूर हैं लेकिन सामाजिक क्षेत्र के प्रावधान बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी उन्हीं की है। देखा गया है कि ज्यादातर राज्य स्वास्थ्य क्षेत्र में बच्चों पर समुचित राशि आवंटित करने में लापरवाही दिखाते हैं। न केवल वे केन्द्र द्वारा प्रदत्त राशि का इस्तेमाल करने में पीछे रहे हैं बल्कि खुद भी राशि जारी करने में आनाकानी करते रहे हैं। राज्यों के इस रवैये से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को झटका लगता है। उनका वांछित परिणाम सामने नहीं आ पाता है। उदाहरण के लिए 1993-94 में केन्द्र सरकार प्रति व्यक्ति 89 रुपये खर्च करती थी जो 2003-04 में बढ़कर 122 रुपये हो गया। लेकिन केन्द्र द्वारा हुई इस बढ़ोतरी का कोई प्रभाव राज्यों के स्वास्थ्य संबंधी खर्च पर नहीं हुआ। राज्यों ने अपने यहां के खर्च में वृद्धि नहीं की। जैसे कि वर्ष 2003-04 में बिहार में प्रति व्यक्ति खर्च 77 रुपये था तो उत्तर प्रदेश में 91 रुपये तथा राजस्थान में 98 जबकि केरल में 275, पंजाब में 294 और दिल्ली में 485 रुपये था। राज्यों में प्रति व्यक्ति खर्च में यह बड़ा अंतर उनके रवैये को साफ दर्शाता है।

इतना ही नहीं बच्चों से जुड़े जिस क्षेत्र में खर्च अधिक होना चाहिए उनमें सरकारें अपेक्षाकृत कम राशि आवंटित करती हैं जिसका खराब असर बच्चों के अधिकारों और उनके विकास पर पड़ता है। जिन राज्यों में बच्चों की संख्या ज्यादा है वहां बच्चों से जुड़ी योजनाओं पर खर्च बेहद कम देखा गया है। हालांकि इसमें राज्यों की लचर वित्तीय स्थिति एक बड़ा कारण है।  राज्य बच्चों की योजनाओं के आवंटन में कटौती कर देते हैं जिसका प्रभाव केन्द्र प्रायोजित योजनाओं पर भी पड़ता है।

सलाखों में कैद मासूमियत रुचिका निगम

 

(क्रिमिनोलाजी व क्रिमिनल जस्टिस में एम.ए.। मानवाधिकार और जेल में सुधार को लेकर काम करती रही हैं।)

 

अक्टूबर, 2013 – हरियाणा के भोंडसी जेल में अपनी मां मेहराम के साथ रहती है चार साल की मंताशा। 24 साल की मेहराम इसी साल दिसम्बर में जेल में अपने पांच साल पूरे करने वाली है। अपराध के लिए कुख्यात हरियाणा के मेवात की रहने वाली मेहराम को अपने पति की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा मिली है। हालांकि जिस व्यक्ति ने वास्तव में उसके पति की हत्या की थी वो उसी के गांव में रहने वाला एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो मेहराम को पसंद करता था। लेकिन मेहराम के ससुराल वालों ने उसका नाम भी पति की हत्या में जोड़ते हुए उसके खिलाफ गवाही दी जिसके कारण उसे सजा हो गई। अब शर्म और समाज का हवाला देते हुए ससुराल वालों ने उससे नाता तोड़ लिया है। भाग्य से मेहराम के मां-बाप ने उससे रिश्ता कायम रखा और उससे मिलने आते रहे। मायके वालों के रूप में मेहराम के पास अभी भी आर्थिक मदद मौजूद है। मेहराम के साथ ही भोंडसी जेल में पच्चीस दूसरी औरतें भी हैं जो किसी न किसी अपराध की सजा काट रही हैं। उनके जिम्मे बागवानी और सफाई जैसे काम हैं।

मेहराम की मां बेगम फातिमा अली जेल में अक्सर अपनी बेटी और नातिन से मिलने जाती रहती हैं। वे उन दोनों को आश्वस्त करती हैं कि उनके पास आश्रय और धन मौजूद है। जेल जाने के थोड़े समय के बाद ही मेहराम ने मंताशा को जन्म दिया था यानी मंताशा ने अब तक जेल के बाहर की दुनिया नहीं देखी है। उसका खाना, पीना और सोना सबकुछ जेल की दीवारों के भीतर ही हो पाता है। रोज सुबह साढ़े पांच बजे से मंताशा अपनी मां के आगे-पीछे जेल के कम्पाउंड में घूमना शुरू कर देती है जब तक कि मेहराम को उस दिन का काम नहीं दे दिया जाता। साढ़े 8 बजे मां-बेटी को जेल की ओर से दूध और कुछ पावरोटी दिया जाता है जिसमें दोनों को अपना पेट भरना पड़ता है। इसके तुरंत बाद मंताशा को जेल में बंद अन्य बच्चों के साथ नहाने के लिए कामन रूम में भेज दिया जाता है जहां नन्ही मंताशा खुद से नहाकर अपने छोटे-छोटे कपड़े भी खुद ही साफ करती है और फिर खुद ही कपड़े पहन कर तैयार भी हो जाती है। ध्यान देने की बात ये है कि जेल में बंद बच्चों को क्रेश में भेजना वैकल्पिक रखा गया है और उसे अनिवार्य नहीं माना गया है। ऐसे में महिला कैदियों को काउंसिलिंग के जरिये क्रेश के फायदों के बारे में समझाना बेहद जरूरी है। सुबह 9 बजे बच्चे जेल के भीतर बने क्रेश में पहुंचा दिये जाते हैं। क्रेश महिला जेल के कंपाउंड के भीतर ही बनाया गया है और बच्चों को रोज दिन का कुछ हिस्सा यहां व्यतीत करना पड़ता है। हालांकि एक साल पहले तक मंताशा के साथ यहां केवल एक और बच्ची थी और उसने कभी किसी पुरुष या लड़के को अपने आस-पास नहीं देखा था।

भारत में हर जेल का संचालन उस राज्य के नियमों के मुताबिक होता है और पूरे देश का जेल प्रशासन केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आता है। जेल में बच्चों को अपनी मांओं, और कुछ मामलों में पिता, के साथ रहने की अनुमति उनके छह साल के होने तक होती है। नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2012 के अंत तक 344 सजायाफ्ता महिलाएं और उनके 382 बच्चे तथा 1226  विचाराधीन महिलाएं एवं उनके 1397 बच्चे देश की जेलों में बंद थे। यानी देश में करीब 1800 बच्चे जेल प्रशासन के रहमोकरम पर जी रहे हैं।

माडल जेल मैन्युएल, 2003 कहता है कि हर जेल में एक अलग क्रेश और नर्सरी बनाई जानी चाहिए। हालांकि देश के ज्यादातर जेलों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है लेकिन भाग्यवश भोंडसी जेल उन कुछ जेलों में शामिल है जहां माता-पिता के साथ जेल में बंद बच्चों के संबंध में दिये गये सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों (जस्टिस अय्यर कमेटी 1986) का पालन किया जा रहा है। इस जेल में क्रेश दो कमरों से बना है जहां बच्चे खेलते और पढ़ते हैं। इसके साथ ही लगा हुआ एक मेडिकल रूम भी है जहां एक महिला डाक्टर बच्चों और महिला कैदियों की जांच करती है। एक बी.ए. पास महिला कैदी को ही क्रेश का इंचार्ज बनाया गया है जो बच्चों को पढ़ाती भी है।

 

जेल के बाद जिंदगी

 

जेल से बाहर आ जाने के बाद भी ऐसे बच्चों की जिंदगी को सामान्य बनने में काफी समय लग जाता है। उनमें असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। मंताशा का ही मामला लें तो मेहराम के परिवार वाले उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उनकी बेटी जेल से रिहा हो जाएगी क्योंकि बाहर आते ही उसका निकाह अलीम के साथ कर दिया जाएगा। अलीम भी मेवात से है और बलात्कार सहित 35 से ज्यादा मामलों में जेल में बंद है। इतना ही नहीं वह भोंडसी जेल के सबसे कुख्यात कैदियों में जाना जाता है। फिर भी कई मौकों पर मेहराम अलीम से निकाह करने की इच्छा जता चुकी है। वह एक अच्छी मां है और मंताशा को पढ़ा-लिखा कर अच्छा इंसान बनाना उसकी प्राथमिकता है फिर भी वह इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहती कि अलीम उसकी बेटी के लिए बुरा पिता साबित हो सकता है। आर्थिक और भावनात्मक मदद के लिए महिला कैदियों का इस तरह किसी के भी साथ विवाह कर लेने का चलन भारत में आम है। जेल से बाहर आने के बाद महिलाओं को उनके परिवार वाले अपनाने से इंकार कर देते हैं लेकिन अगर वो विवाह कर ले तो समाज में उसे जगह मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

 

एक चुनौतीपूर्ण प्रणाली

 

जेल में रह रहे अन्य बच्चों के मुकाबले मंताशा उन भाग्यशाली बच्चों में शामिल है जिसे सुविधायुक्त जेल में पैदा होने और रहने का मौका मिला है। उसे एक प्यार करने वाली मां और नानी मिली है तो पढ़ने और खेलने के लिए क्रेश भी मौजूद है। वह उस जेल प्रशासन पर आश्रित है जो पहले से ही कैदियों के अत्यधिक बोझ, भ्रष्टाचार, कर्मचारियों की कमी, अनट्रेंड स्टाफ और बाबूगिरी को झेल रहा है। इन सबके बीच जेल में रह रहे बच्चों पर जितना ध्यान दिये जाने की जरूरत है वो नहीं हो पाता।

संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि ‘‘कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरीके से किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत आजादी से वंचित नहीं रखा जा सकता।“ इसके अलावा अनुच्छेद 45 में ये कहा गया है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के भीतर 14 साल तक के हर बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य की है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मंताशा जैसी बच्चियां अपने इस मानवाधिकार को कैसे पा सकती हैं। ऐसी बच्चियों को देखभाल के नाम पर अपनी मांओं के साथ जेल में धकेल दिया जाता है जहां उन्हें अपनी सेहत और आजादी के साथ समझौता करना पड़ता है। जीने के कठिन हालातों के अलावा बाहरी दुनिया से दूर रहकर जेल में बंद अन्य वयस्कों के बीच उन्हें अपना हर दिन गुजारना पड़ता है। बिना किसी गलती के उन्हें भी सामाजिक बाध्यताओं और असुरक्षा से जूझना पड़ता है। वैसे इसके लिए जेलों को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता क्योंकि वे भी शक्तिहीन हैं और 1894 के जेल एक्ट से बंधे हैं।

स्वयंसेवी संस्था ‘इंडिया विजन फाउंडेशन’(आईवीएफ) जेल में अपने अभिभावकों के साथ रह रहे बच्चों को मुख्यधारा में लाने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रही है। आईवीएफ ऐसे बच्चों को उनके परिवार से मिलाने का काम करती है और करीब 19 साल से वह तिहाड़ में रह रहे सैकड़ों बच्चों को मुख्यधारा में ला चुकी है। इसने 300 से ज्यादा बच्चों को जेल के क्रेश से निकालकर बाहर के स्कूलों में दाखिला दिलवाने में मदद की है। कुछ उम्मीद 1986 में जगी जब जेलों में बंद महिलाओं की स्थिति का आकलन करने के लिए केन्द्र सरकार ने जस्टिस कृष्णा अय्यर के नेतृत्व में राष्ट्रीय विशषज्ञ कमेटी का गठन किया। कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें जेल में बंद गर्भवती महिलाओं तथा हाल ही में मां बनी महिलाओं का विशेष जिक्र किया गया।

हाल ही में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद महिलाओं और बच्चों के संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किये:

  • महिला कैदियों को अपने बच्चों को छह साल की उम्र तक अपने साथ जेल में रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • छह साल के बाद मां के परामर्श से बच्चे को उपयुक्त अभिभावक के पास रखा जाना चाहिए।
  • इस दौरान बच्चे के खाने-पीने, कपड़ों और आश्रय व दवाओं का खर्च संबद्ध राज्य सरकार उठाएगी।
  • जेल में महिला कैदियों के वार्ड के पास ही उनके बच्चों के लिए एक क्रेश और नर्सरी बनाया जाना चाहिए।
  • तीन साल तक के बच्चों को क्रेश में तथा तीन से छह साल तक के बच्चों को नर्सरी में जगह मिलनी चाहिए।
  • क्रेश और नर्सरी का संचालन जेल प्रशासन द्वारा किया जाना चाहिए।
  • जेल में रह रहे बच्चों के पोषण के लिए हैदराबाद के नेशनल इंस्टीच्यूट आॅफ न्यूट्रीशन द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन किया जाना चाहिए।
  • अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को तीन महीने के भीतर जेलों में लागू कर दिया जाना चाहिए।

यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी उपरोक्त निर्देशों का वास्तव में पालन किया जाय तो जेलों में बंद बचपन को समय से पहले ही कुम्हलाने से बचाया जा सकता है।

 

(यह आलेख इंडियाटुगेदर.काम में  ‘ए चाइल्डहुड लास्ट बिहाइंड बार्स’ के नाम से प्रकाशित आलेख का हिंदी रूपांतरण है।)

ख्वाहिशों का भार ढोते बच्चे शोमा ए. चटर्जी (स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखिका )

8 जनवरी, 2007 को कोलकाता के उपनगर में 14  साल का विश्वदीप भट्टाचार्जी अपने पिता के साथ छत पर टेबल टेनिस खेलने के दौरान बेहोश होकर गिर पड़ा और बाद में उसकी मौत हो गई। एक सप्ताह बाद ही बेंगलुरू में 20 साल की सम्पाली मिद्या ने टुमकुर स्टेशन पर चलती ट्रेन से कूदकर अपनी जान दे दी। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में रोज बड स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला 13 साल का देवव्रत राय पढ़ाई के लिए पिता की डांट से परेशान होकर घर छोड़कर चला गया। वह क्रिकेट में ज्यादा ध्यान लगाता था।

उपरोक्त तीन मामले तो केवल उदाहरण हैं क्योंकि बच्चों की उत्पीड़न और मौत के ज्यादातर मामले मीडिया में आ ही नहीं पाते। इसके अलावा ये घटनाएं केवल पश्चिम बंगाल की हैं जबकि पूरे देश का यही हाल है। भारत में परिवार नाम की इकाई एकजुटता के आधार पर चलती है चाहे इसके लिए बच्चों की कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। इसलिए अगर घर में पिता बच्चों को प्रताड़ित करते हैं तो कोई भी मां इसकी थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराएगी और न ही वो अपने परिवार की काउंसिलिंग के लिए किसी के पास जाएगी चाहे परिवार का कोई सदस्य उत्पीड़न का शिकार ही क्यों न हो रहा हो। हमारे देश की विधि व्यवस्था भी बच्चों को उनके मां-बाप की प्रताड़ना, क्रूरता या दवाब से बचाने के लिए कोई उपाय नहीं बताती है। यह अफसोसनाक है क्योंकि अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में अगर मां-बाप बच्चे को प्रताड़ित करते हैं तो बच्चे को उनसे छीन लेने जैसा सख्त कानून मौजूद है।

विश्वदीप पांच साल की उम्र से टेबल टेनिस खेलता आ रहा था और उसने कई बार राज्य का प्रतिनिधित्व भी किया था लेकिन वह अपने पिता को संतुष्ट नहीं कर पाता था। जिस दिन उसकी मौत हुई, वह 6 बजे सुबह ही प्रैक्टिस करके लौटा था। नाश्ता करने के तुरंत बाद पिता ने उसे अपनी बहन नेहा के साथ खेलने के लिए भेज दिया और उसके साथ साढ़े दस बजे तक खेलने के फौरन बाद पिता ने उसे अपने साथ टेबल टेनिस खेलने का दवाब डाला। पिता के साथ खेलने के दौरान जब एक बार विश्वदीप रिटर्न सर्विस नहीं दे सका तो पिता ने उस पर प्लास्टिक की किसी चीज से वार किया। चोट लगने के बाद भी विश्वदीप खेलता रहा। इसी दौरान साढ़े बारह बजे प्रैक्टिस करते-करते वह बेहोश होकर गिर गया। उसे फौरन बांगुर अस्पताल ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। विश्वदीप के कोच तपन चंद्रा ने उसकी मौत की पूरी जिम्मेदारी पिता दीपक पर डालते हुए कहा कि वे मेरे दोस्त भी हैं और मैंने उन्हें कई बार समझाया था कि अपने गुस्से पर काबू रखें। दीपक अक्सर विश्वदीप को बुरी तरह मारते थे जिसके कारण उसकी मौत हो गई। एक बार तो उसने विश्वदीप की चेन से पिटाई कर दी थी जिसके बाद मुझे उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह खून का जमना बताया गया जो किसी चीज से चोट लगने के कारण हो सकता है। विश्वदीप की मां ने अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवायी जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

बर्दवान के कुरमुल के एक स्कूल में साइंस टीचर की बेटी सम्पाली बेंगलुरू के अल्फा इंजीनियरिंग कालेज में कम्प्यूटर साइंस की छात्रा थी। वह परीक्षा में अच्छा नहीं कर पा रही थी और उसे लगता था कि वह अपने पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रही है। इसलिए उसने जान दे दी। उसके पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई करे जबकि वह खुद ऐसा नहीं चाहती थी। उसकी शिक्षिका पूर्णिमा ने बताया था कि वह पढ़ाई में अच्छी नहीं थी और हमें लगता था कि वह गलत लाइन पर चल रही है। सम्पाली ने मरने से पहले अपने पिता के नाम चिट्ठी में सारी बातें लिखी थीं। देवव्रत के पिता रामबहादुर कोलकाता के निकट बेलूर में खटाल चलाते हैं और अपने बेटे को उंचाई पर देखना चाहते हैं। उन्होंने उसका दाखिला शहर के इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवाया था। बैली पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर असित सेन ने बताया कि देवव्रत एक बार पहले भी घर से भाग चुका था जब वह पांचवी में पढ़ता था। उनके मुताबिक वह अपने पिता के दवाब से घबड़ा कर घर से भाग गया है।

दवाब कई और तरह के भी होते हैं। 19 नवम्बर, 2006 को खंडवा के भीखनगांव की छह साल की सानिया ने लगातार 64 घंटे गाकर लिम्का बुक आफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करवाया था। उसने इंदौर की आकांक्षा का 61 घंटे तक लगातार गाना गाने का रिकार्ड तोड़ा था। उसने 745 गाने गाए जिनमें फिल्मी और भक्ति गीत शामिल थे। जब सानिया से पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया तो उसने कहा कि उसे कुछ अलग करने की बड़ी तमन्ना थी। क्या एक छह साल की बच्ची ऐसा सोच सकती है? इंदौर के दीपक गुप्ता ने 101 घंटे तक लगातार गाना गाकर सानिया का रिकार्ड अगले दिन ही तोड़ दिया। आखिर मां-बाप कुछ समय की लोकप्रियता के लिए क्यों अपने बच्चों को इस प्रकार की दौड़ में झोंक देते हैं। इसके पीछे उनकी टीवी चैनलों पर दिखाई देने की महत्वाकांक्षा हो सकती है। इसी तरह एक बच्ची घंटों तक चपाती बनाने की प्रतियोगिता में बेहोश हो गई। उस बच्ची को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई। आखिर ये किस तरह का अभिभावकत्व है जो बच्चों को इतने दवाब में काम करने के लिए विवश कर देता है? ऐसे रिकाॅर्ड बनाने की जरूरत ही क्या है जो एक हफ्ते के बाद ही किसी और बच्चे के द्वारा तोड़ दिया जाय?

इस मामले में अमेरिका और ब्रिटेन भी कुछ कम नहीं हैं। ‘मैडनेस आफ माडर्न फैमिलीज’ में लेखक द्वय मेग सैंडर्स और एनी एशवर्थ लिखते हैं कि कैसे पढ़े-लिखे और समझदार माता-पिता भी दूसरे परिवारों से आगे निकलने की होड़ में अपने बच्चों के साथ अजीबोगरीब तरीके अपनाते हैं। अपने घर में छोटे बच्चों को एग-स्पून दौड़ के लिए चुपचाप तैयार करने से लेकर स्कूल ट्रिप पर फ्रांस गए बच्चों की बस का पीछा करने तक में मां-बाप सनक की हद तक लगे रहते हैं। इस किताब में उन मां-बाप के बारे में बताया गया है जो बच्चों के सोने के कमरे में विदेशी भाषा के रेडियो स्टेशन लगाते हैं ताकि बच्चा सोते समय उस भाषा को सीख सके। अमेरिका में  मध्यवर्गीय माता-पिता बहुत शुरू से ही इस प्रयास में लग जाते हैं कि उनके बच्चों को अच्छे नंबर मिल सके और उनका दाखिला अच्छे काॅलेज में हो सके। सैंडर्स और एनी ने किताब में दबाव देने वाले अभिभावकों को श्रेणीबद्ध कर इसे हल्का बनाए रखने की कोशिश की है। एक ऐसी हेलीकाप्टर मां है जो बच्चे को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखने के लिए उसके चारों ओर घूमती रहती है। एक ऐसे टचलाइन पिता हैं जो अपने बेटे को फुटबाल खेलने के लिए हमेशा उकसाते रहते हैं जिसे फुटबाल खेलना पसंद नहीं है। ऐसे ही एक और टचलाइन मां है जो स्वीमिंग पूल के किनारे अपने मोबाइल पर स्टापवाच लगाकर बेटे की निगरानी करती है। इको मम्मी हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहती है कि उनके बेटे के खाने की प्लेट में शुद्ध सब्जियां और आर्गेनिक मशरूम है कि नहीं। क्राफ्ट मम्मी पत्तियों और घास के कोलाज बनाकर अपने बच्चों को देती हैं और चाहती हैं कि वे भी हमेशा कुछ न कुछ बनाते रहे।

खेल और पढ़ाई के मामले में दवाब बनाने वाले माता-पिता सबसे बुरा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। एक बच्ची के मां-बाप उसे सप्ताह में दो बार स्वीमिंग के लिए सुबह छह बजे के सेशन करने और पांच बार स्कूल के बाद के सेशन करने के लिए कहते हैं। यहां तक कि बच्ची का एक हाथ टूट जाने के बाद भी उस पर स्वीमिंग करने के लिए दवाब डाला जाता रहा। बच्ची को तैराकी के दौरान अपने टूटे प्लास्टर चढ़े हाथ को पानी से बाहर रखना पड़ता था। एक और टेनिस खिलाड़ी को उसकी मां ने ट्रेनिंग रोक देने के लिए कहा क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी बेटी जीत नहीं सकती। तो दवाब डालने और प्रेरित करने के बीच फर्क कैसे पता लगेगा? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि वैसे माता-पिता जो जीवन में कुछ बनना चाहते थे लेकिन बन नहीं पाए, वे अपने बच्चों के जरिये उसे पूरा करना चाहते हैं। बेले व्यू में मुख्य मनोवैज्ञानिक डा. शिलादित्य राय कहते हैं कि ऐसे मां-बाप यह समझने में भूल कर जाते हैं कि संभव है कि उनके बच्चे भी वो काम न कर पाएं। विश्वदीप और सम्पाली के पिता करो या सजा पाओ की इसी मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण हैं। विश्वदीप की दुखद मौत पर खेल मनोवैज्ञानिक लैला दास कहती हैं कि पिता द्वारा लगातार दवाब बनाए जाने के कारण बच्चे के मन में डर बैठ गया होगा जिसके कारण उसे हार्ट अटैक आया होगा। अमेरिका की ओलंपिक जिम्नास्ट डामिनिक माकिनो जिन्होंने अपने मां-बाप से तलाक की मांग की है, कहती हैं कि उन्होंने कभी बचपन देखा ही नहीं। मैंने हमेशा सिर्फ जिम को देखा। मैं सोचती हूं जिम्नास्टिक के अलावा आपने क्या जाना। क्या हम आइसक्रीम खाने नहीं जा सकते? क्या आप मेरे मां और पापा नहीं हो सकते? बालीवुड में कभी टाप शीर्ष बाल कलाकार रह चुकीं डेजी ईरानी बेहद बुरे अनुभव के बारे में बताती हैं ‘‘शूटिंग के दौरान एक बार रोने का सीन होने पर मेरी मां ने मुझे चींटी काटा था ताकि मैं रोउं। मुझे शुरुआत में केवल दो साल के लिए स्कूल से हटाया गया था लेकिन दोबारा कभी स्कूल नहीं भेजा गया। मैंने कभी अपने कमाए पैसे को नहीं देखा। मुझे शूटिंग करने या कैमरे के सामने जाने से नफरत थी लेकिन मेरी मां को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मुझे आजादी तब मिली जब मैंने अपने से कहीं ज्यादा उम्र के व्यक्ति से शादी कर ली। मैंने अपने तीनों बच्चों में से किसी पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए दवाब नहीं डाला।” राज कपूर की  मशहूर फिल्म बूट पालिश में काम कर चुकीं बेबी नाज ने बताया था कि उनके मां-बाप हमेशा इस बात के लिए झगड़ते रहते थे कि उनके कमाए पैसे का हकदार कौन होगा जबकि वे स्टूडियो में रात के दस-ग्यारह बजे तक काम करने के बाद भूखी बैठी रहती थीं। मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था तो श्रीदेवी ने 4 साल की उम्र से। क्या वे इतनी परिपक्व थीं कि अपना फैसला खुद ले सकें? अगर ये उनका उत्पीड़न नहीं था तो और क्या था?

घरेलू हिंसा की सारी कहानियां बच्चियों और महिलाओं पर केन्द्रित होती हैं। बाल मजदूरी की सभी घटनाओं में उनसे काम करवाने वाले नियोक्ता निशाने पर रहते हैं। लेकिन जब मां-बाप ही अपने बच्चों का उत्पीड़न करने लगें, उनकी मौत का जिम्मेदार बन जाएं तो क्या करना चाहिए? अगर अब आप किसी बच्ची को अपनी बाथरूम से निकलती मां को यह कहते हुए देखें कि ‘‘वह छोटी बच्ची की तरह लग रही है” तो एक मिनट के लिए रुकें और उसे एक विकल्प देकर देखें कि यह बच्ची भी अपनी बालकनी में दूसरे बच्चों के साथ खेल रही है।

बिकाउ हैं मगर टिकाउ नहीं ! – दीपिका झा

deepika jhaदुनिया भर की खबर लेने वाली पत्रकार बिरादरी कभी खुद खबर नहीं बन पाती है। उनके संगठन, उनका दोहन, शोषण, भेदभाव और कम पारिश्रमिक की खबर कभी किसी अखबार या टीवी चैनल के जरिये सामने नहीं आ पाती। जब पूरी बिरादरी का ये हाल है तो सोचिये उसके हाशिये पर मौजूद महिलाओं के साथ कैसा रवैया अपनाया जाता होगा। आम तौर पर महिलाओं से जुड़ी खबर किसी भी अखबार या टीवी चैनल के लिए सबसे बिकाउ खबर होती हैं। लेकिन विडंबना है कि खुद उन अखबारों और चैनलों में काम कर रहीं महिलाएं उनके लिए मायने नहीं रखतीं क्योंकि उन्हें टिकाउ नहीं माना जाता। सब कुछ मानने पर ही है। ये मान लिया जाता है कि अनब्याही महिलाएं ज्यादा काम कर सकती हैं। ये भी मान लिया जाता है कि शादी होते ही महिलाओं की कार्यक्षमता घट जाती है और अगर वे मां बन गईं तब तो उन्हें काम पर रखना भी बेकार है। ऐसे में अगर नौकरी से नहीं निकाल सकते तो तुरंत उनकी शिफ्टिंग फीचर डेस्क या फिर अपेक्षाकृत कम जिम्मेदारी वाले डेस्क पर कर दी जाती है। नतीजा कि बड़ी संख्या में महिलाएं या तो काम छोड़ देती हैं या पत्रकारों की गिनती में ही नहीं रह जाती हैं।

        वर्ष 2014 में मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा देश की मीडिया में महिलाओं की स्थिति जानने को लेकर कराए गए एक अध्ययन में बताया गया कि जिलों में महिला पत्रकारों की संख्या केवल 2-7 फीसद है। इतना ही नहीं देश में छह राज्य और दो केन्द्र शासित राज्य ऐसे भी हैं जहां के जिलों में एक भी महिला पत्रकार नहीं है। हालांकि आंध्र प्रदेश सबमें अच्छी स्थिति में है क्योंकि यहां जिलों में 107 महिलाएं पत्रकार हैं। सर्वे में बताया गया कि बड़े मीडिया हाउसों ने महिला पत्रकारों की तरक्की के बारे में छोटे हाउसों की तुलना में कम सोचा। बड़े और राष्ट्रीय स्तर के अखबारों और चैनलों ने महिला पत्रकारों को मान्यता दिलाने में दिलचस्पी नहीं ली। उनकी तुलना में छोटे और स्थानीय अखबारों व चैनलों ने अच्छा काम किया। इसी तरह बड़े घरानों में महिलाओं की संख्या भी छोटे अखबारों की तुलना में कम रही और जिला स्तर पर तो बेहद कम। स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाली महिलाओं की दशा तो और भी खराब है और सर्वे के मुताबिक देश में केवल दो महिला पत्रकार स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं जिनमें एक फोटोग्राफर हैं। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने देश के 28 राज्यों के 255 जिलों से सूचनाओं को एकत्रित कर सर्वे को जारी किया था।

        अखबारों में मार्केटिंग जैसे गैर पत्रकारिय विभागों को छोड़ दिया जाय तो डेस्क और रिपोर्टिंग दो सबसे महत्वपूर्ण विभाग हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बिना अखबार का काम नहीं चल सकता। करीब पंद्रह साल पहले बिहार की राजधानी पटना में लगभग सभी प्रिंट मीडिया हाउसों में महिलाएं डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों ही विभागों में अच्छी संख्या में कार्यरत थीं। पटना से छपने वाले सभी अखबार यथा, हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण और प्रभात खबर खबरों के चयन और पन्नों की ले-आउट से जुड़े लगभग सभी फैसले स्थानीय स्तर पर ही ले लिया करते थे। ऐसे में डेस्कों पर महिला पत्रकारों की बहाली भी खूब होती थी क्योंकि जरूरत ज्यादा लोगों की होती थी। धीरे-धीरे लगभग सभी हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों ने स्थानीय स्तर पर फैसले लेने बंद कर दिये और वे अपने-अपने हेडक्वार्टर से संचालित होने लगे। नतीजतन डेस्कों पर लोगों की जरूरत कम हो गई और फिर शुरू हुआ छंटनी का दौर। जाहिर है महिलाएं निशाने पर रहीं और उन्हें हटाया जाने लगा। जो न जा सकीं उनके लिए काम करने की परिस्थिति इतनी मुश्किल कर दी गई कि उन्होंने खुद ही काम छोड़ दिया। अखबारों में अमूमन दो शिफ्टों-दिन और रात- में होने वाले काम एक शिफ्ट तक ही सीमित कर दिये गये और ड्यूटी अमूमन चार बजे शाम से लेकर देर रात तक की होने लगी। इस व्यवस्था में भी सबसे जल्दी महिलाओं ने सरेंडर किया और कई पत्रकारों ने काम छोड़ दिया। महिलाएं यदि पत्रकार हैं तो वे एक मां, पत्नी और बहू भी हैं। उनके लिए हर भूमिका एक समान महत्वपूर्ण है। ऐसे में जब बात चुनाव की आती है तो सबसे पहले वे अपने करियर को दांव पर लगा देती हैं।

        एक बड़ी मुश्किल तब आई जब दिल्ली में हुए शर्मनाक निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा और उषा मेहरा कमिटी की सिफारिशों पर सरकार ने कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना के खिलाफ अधिनियम को पारित किया और हर कार्यालय में जहां महिलाएं काम कर रही हों एक शिकायत सेल का गठन अनिवार्य बना दिया। स्थिति ये हो गई कि जहां पुरुष अधिकारी सशंकित रहने लगे तो वहीं कुछ महिलाओं ने भी इसका फायदा लेना शुरू कर दिया। अखबारों में हालत ये हो गई कि महिलाओं को बहाल करने पर ही रोक लग गई। नतीजतन लगभग हर अखबार में डेस्क पर बमुश्किल एक या दो महिलाएं रह गईं। रिपोर्टिंग में महिलाओं की संख्या कुछ ज्यादा है क्योंकि वहां देर रात तक रुकने की अनिवार्यता नहीं होती।

             वर्ष 2014 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने देश में महिला पत्रकारों की स्थिति पर एक अध्ययन कराया था जिसके नतीजे काफी निराशाजनक रहे थे। अध्ययन में बताया गया कि ये सही है कि पिछले दो दशकों में देश में पत्रकारिता में आने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है फिर भी उनके काम करने की परिस्थितियां बेहद निराश करने वाली हैं। ज्यादा काम, कम पैसा और गैर बराबर मौका ये सब उनका हौसला घटाने के लिए काफी होते हैं। तिस पर भी प्रोन्नति शायद ही कभी मिलती है। स्ट्रिंगर से शुरू होने वाला उनका सफर अधिक से अधिक चीफ सब एडीटर तक जाकर रुक जाता है। इस अध्ययन में कहा गया कि महिला पत्रकारों को प्रमोशन न दिये जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण जो बताया जाता है वो है उनका नाइट शिफ्ट न कर पाना। रिपोर्ट में बताया गया कि देश में कई महिलाएं-जो कि अच्छे हाउसों में भी काम कर रही हैं- दैनिक पारिश्रमिक पर काम कर रही हैं, जिनके पास नियुक्ति पत्र तक नहीं हैं और महीने के अंत में उन्हें 1500 से 3000 रुपये तक ही मिल पाते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां दैनिक भाष्कर और नई दुनिया जैसे स्थापित मीडिया हाउस हैं, वहां एक भी महिला पत्रकार स्थायी नौकरी में नहीं है। जिनके पास दो से तीन साल का अनुबंध है वे भी खुशकिस्मत हैं क्योंकि इनकी संख्या भी बहुत कम है। ऐसे में जब छंटनी का वक्त आता है तो ये महिलाएं सबसे पहले बाहर जाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के उत्तर-पूर्व में स्थित 7 राज्यों में कुल मिलाकर मात्र 35 महिला पत्रकार हैं जिनमें से 40 फीसद को कभी प्रमोशन नहीं दिया गया जबकि केवल 35 फीसद ही फुल टाइम कर्मचारी हैं।

        औरतों के साथ अन्याय और न्याय की खबरों से भरे रहने वाले टीवी चैनलों और अखबारों के भीतर का सच ये है कि खुद वे कभी अपने यहां काम करने वाली स्त्रियों के साथ न्याय नहीं करते। बिहार की ही एक महिला पत्रकार ने बताया कि मातृत्व अवकाश पूरा करने के बाद जब वो काम पर लौटीं तो उन्हें डिमोट कर दिया गया। इसी तरह मध्य प्रदेश की एक पत्रकार को तो मातृत्व अवकाश लेने के कारण काम से हटा ही दिया गया। ज्यादातर महिलाओं ने, जो हाल ही में मां बनी थीं, बताया कि मैटरनिटी लीव लेने के बाद जब वे लौटीं तो दोबारा ज्वायन करने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। प्रबंधन ने उन्हें काम पर न लौटने देने की हर संभव कोशिश की। एक बड़े अंग्रेजी अखबार में काम करने वाली महिला ने बताया कि मां बनने से पहले तक वे बेहद जिम्मेदार थीं लेकिन जैसे वे मां बनीं उनकी विश्वसनीयता कम हो गई। जबकि सच्चाई तो ये है कि महिलाओं के मां बन जाने से उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है बल्कि वे तो और ज्यादा संवेदनशील तरीके से काम करना सीख जाती हैं। अफसोस कि अखबारों और चैनलों में काम करने वाले पुरुषों को स्त्रियों की दक्षता दिखाई नहीं देती।

दीपिका झा  का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

कठिन है साझा परवरिश की राह-Ms. Flavia Agnes


flavia2बच्चों के संरक्षण और अभिभावकत्व से जुड़े अंग्रेजी कानूनों की शुरुआत इस सिद्धांत से हुई थी कि पिता ही बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक हैं। इस सिद्धांत को भारत समेत सभी कामनवेल्थ देशों ने अपनाया था जो गार्जियन्स एंड वार्ड एक्ट, 1890 (जीडब्ल्यूए) में झलकता भी था।

1956 में जब हिन्दू कोड बनाया जा रहा था तो हिन्दुओं को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया और उन्हें विशेष दर्जे में रखते हुए हिन्दू माइनारिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 (एचएमजीए) का निर्माण किया गया। बाकी के अल्पसंख्यक समुदायों ईसाई, मुसलमान और पारसी को पूर्व के जीडब्ल्यूए के तहत रखा गया। हालांकि वैवाहिक याचिकाओं के लिए सभी पर्सनल कानूनों में समान सिद्धांत का पालन किया जाता रहा।

        यद्यपि सिद्धांततः पिता को बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक माना गया लेकिन फिर भी मां की भूमिका प्राथमिक देखभाल के लिए महत्वपूर्ण मानी गई और तलाक की स्थिति में बच्चे का शारीरिक संरक्षण मां को दिया जाने लगा। हालंkकि इसे अस्थायी व्यवस्था ही समझा गया। जिन मामलों में मां पर अनैतिकता का आरोप लगा हो या जहां मां ने दूसरी शादी कर ली हो, उन मामलों में उसे बच्चे की कस्टडी प्राप्त करने से वंचित रखा जाता था। हालांकि समान अवस्था में यदि पिता पर बच्चों की उपेक्षा करने, उन्हें मारने-पीटने, अनैतिक व्यवहार करने या दूसरी शादी कर लेने का आरोप लगा हो तो भी उसे उसके प्राकृतिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था। यह स्थिति तलाकशुदा महिलाओं को उनका अधिकार पाने से रोकती थी। इस अन्याय के विरुद्ध ^^बच्चे का हित सर्वोपरि है’इस न्यायिक सिद्धांत की उत्पत्ति हुई। यह सिद्धांत पिता का बच्चे पर प्राकृतिक अधिकार वाले सिद्धांत में एक छेद के समान था। आज संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों के कन्वेंशन (यूएनसीआरसी) पर आधारित इस सिद्धांत को तमाम सीमागत और परंपरागत कानूनों से परे रखकर हर जगह अपनाया जा रहा है। बच्चों के संरक्षण, अभिभावकत्व और उस तक पहुंच को अब माता-पिता के अधिकारों के तहत नहीं रखा जा सकता है बल्कि अब बात बच्चों के परम हित की है। अदालतों को बेहद सतर्कतापूर्वक अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना होगा ताकि किसी भी बच्चे के उस मौलिक मानवाधिकार का हनन न हो सके जो उसे बिना डर और कष्ट के जीने की आजादी देता है।

            वास्तव में यह नीति उससे भी ज्यादा जटिल है जितनी की सामने दिखाई देती है। अगर पिता अमीर हो लेकिन मां के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन न हो तो बच्चे का हित किसके साथ होगा, कुछ मामलों में अदालतों ने यह व्यवस्था दी है कि मां के पास आय का जरिया न होने का यह मतलब कतई नहीं है कि उसे बच्चे की कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। पिता की उच्च सामाजिक स्थिति या उसका चरित्र तथा मां का नैतिक आचार, पिता के पक्ष में फैसला लेने के लिए संपूर्ण तथ्य नहीं हो सकते। इन मामलों में केवल एक ही तथ्य मायने रखता है और वह है बच्चे के प्रति दिखायी जाने वाली सुरक्षा और चिंता की भावना। वैधानिक सिद्धांतों में इस बात को भली-भांति अपनाया जा चुका है कि प्रारंभिक दिनों में बच्चे को उसकी मां के प्यार और देखभाल से अलग करना बच्चे के हित में नहीं होगा। इसके अलावा मां को बच्चे का समान रूप से अभिभावक मानने की सोच भी विकसित हुई है और आज के दौर में सभी आधिकारिक कार्यों, जैसे कि स्कूल में नामांकन कराने, बैंक खाता खुलवाने, पासपोर्ट, राशन कार्ड आदि बनवाने में अभिभावक के रूप में मां के अधिकार को भी मान्यता दी जाने लगी है। हालांकि इस स्थिति को पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है।

        जहां गैर कामकाजी माताओं को आय के साधन न होने की वजह से डराया जाता रहा है वहीं कामकाजी मांओं को भी एक अलग प्रकार के तनाव से गुजरना पड़ता है। क्या एक महिला जो नौकरी कर रही है और दिन का ज्यादातर समय घर से बाहर बिता रही है, बच्चे की देखभाल कर पाने में सक्षम होगीघ् हाल के कई मामलों ने इसका भी जवाब दिया है। यह माना गया कि एक मां को केवल इस कारण से कि वह नौकरी कर रही है, बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं रखा जा सकता है। आज के दौर के कस्टडी मामलों में न तो पिता को, जिसे प्राकृतिक रूप से अभिभावक माना जाता रहा है और न ही मां को, जो जैविक रूप से अभिभावक है, को आसानी से बच्चे की कस्टडी दे दी जाती है। बल्कि बच्चे के परम हित को सर्वोपरि मानते हुए घर के माहौल और उसके पालन-पोषण की व्यवस्था को ध्यान में रखा जाता है। साधारणतया अदालतें बच्चे को उसके वर्तमान माहौल से हटा कर गैर कस्टडी वाले अभिभावक के साथ रखने को तरजीह नहीं देती हैं।

        जब कोई मामला सामने आता है तो आम तौर पर अदालतें  बच्चे को उस अभिभावक के पास ही छोड़ देती हैं जिसके पास वो रह रहा होता है जबकि दूसरे को बच्चे से मिलने की छूट दी जाती है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि बच्चे से मिलने की छूट बच्चे के माता-पिता से मिलने के अधिकार के तहत दी जाती है न कि मां-बाप के अधिकार के तहत।

        वैवाहिक मामलों को देखने वाली अदालतों, काउंसलरों तथा वकीलों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कस्टडी संबंधी किसी भी केस के केन्द्र में एक बच्चा होता है। चूंकि बच्चा केस की सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं होता इसलिए उसकी गैरमौजूदगी में उसके हितों को सुरक्षित रखने का दायित्व कोर्ट का होता है। अदालतें दो पक्षों के बीच की लड़ाई में बच्चे को किसी वस्तु की नहीं देख सकतीं। घरेलू हिंसा के उन मामलों में जहां मां को जबरन घर से बाहर निकाल दिया जाता है, वहां तलाक के बाद बच्चे और मां सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस स्थिति में बच्चे को अदालत में प्रस्तुत कर बिना भय और आशंका के माहौल में उनकी इच्छा पूछी जाती है। वे किसके साथ रहना चाहते हैं, इस बारे में बच्चे को फैसला लेने को कहा जाता है। लेकिन अक्सर बच्चे अपने पिता के खिलाफ कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसका कारण पिता से उनका डर भी हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में अदालत को व्यावहारिक भूमिका निभाते हुए बच्चे के लिए सुरक्षित और स्नेह भरा माहौल बनाना चाहिए। बच्चों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके किसी भी फैसले का उन पर या उनकी मां पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। बच्चे के हित से जुड़ा सिद्धांत उस समय और भी मुश्किल में पड़ जाता है जब बच्चा खुद घरेलू हिंसा का शिकार होता है या वो अपनी मां के साथ हिंसा को देख चुका होता है। इन मामलों में अत्यधिक संवेदनशीलता की जरूरत होती है ताकि बच्चा दोबारा से सदमे में न चला जाय। ऐसे में कोर्ट पिता को बच्चे से मिलने की आसान छूट न देते हुए थोड़े समय के लिए ही मिलने की छूट दे सकता है जिससे कि बच्चे को पिता के साथ अच्छे संबंध दोबारा स्थापित करने के लिए समय मिल सके। बच्चे की भावनाओं को देखते हुए अदालत इस समय में धीरे-धीरे बढ़ोतरी कर सकती है। हाल के दिनों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें बच्चे को पिता या परिवार का कोई पुरुष यौन हिंसा का शिकार बनाते हैं। पहले से ही टूट चुके परिवारों में कई बार पत्नी से बदला लेने के लिए बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है।

        हाल के दिनों में बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में आई बढ़ोतरी को देखते हुए ला कमीशन आफ इंडिया ने साझा परवरिश की अवधारणा को अपनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किये हैं। यह अवधारणा अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में पहले से ही अपनाई जा रही है। इस धारणा को अपनाए जाने के पीछे जो तर्क दिय जाते हैं उनके मुताबिक अन्य विकसित देशों की तरह भारतीय परिवारों में भी लोगों की भूमिकाएं बदल रही हैं, जैसे कि पुरुष अब घरों में बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी लेने लगे हैं। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह बताया गया है कि बच्चे की परवरिश में मां और पिता दोनों का एक साथ शामिल होना ज्यादा अच्छा है बनिस्पत कि केवल मां या केवल पिता के। हालांकि इस अवधारणा को लागू करने से पहले साफ-साफ कहा गया है कि कोई भी सुधार भारतीय संस्कृति, समाज और लैंगिक संबंधों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

         लगभग सभी विकसित देशों में तलाक के मामलों में फैसला विवाह संबंधी संपत्ति के बंटवारे के साथ ही होता है। साथ ही बच्चे की कस्टडी पाने वाले को अपने घर में रहने और स्वयं व बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए वित्तीय सुरक्षा पाने का हक होता है। उन देशों में अलग हुई महिलाओं के लिए सुविधाजनक आश्रय और अकेली माताओं के लिए वित्तीय सुरक्षा दिये जाने का भी प्रावधान है।

          मौजूदा कानूनों के तहत बच्चे के 18 वर्ष के होने के बाद उसका साथ देने की जिम्मेदारी से पिता को मुक्त किया जा सकता है। ये वो समय होता है जब बच्चे को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती है। जब बच्चा डिग्री कालेज में पहुंचता है तो उस समय अकेली मां को उसका साथ देने के लिए छोड़ दिया जाता है। पिता द्वारा बच्चे को इस तरह उपेक्षित और अकेला छोड़ दिया जाना आईपीसी की धारा 317 की तरह कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जाता है जबकि अगर कोई अकेली मां अत्यधिक दवाब के कारण भी बच्चे को छोड़ती है तो उसके खिलाफ प्रावधान बनता है।

        इस समय हमारे देश के जो हालात हैं, चाहे वह किसी भी वर्ग में हो, वो ये है कि तलाक या विलगाव गंभीर वित्तीय असुरक्षा की ओर धकेलते हैं। आयकर भरने से किसी की आर्थिक स्थिति का पता नहीं चल जाता है और कई मामलों में तो गुजारा भत्ता को भी कम कर दिया जाता है क्योंकि पत्नी और बच्चे को दुख पहुंचाने के लिए पति अपनी अच्छी खासी नौकरी तक छोड़ देते हैं।

        ध्यान देना होगा कि हम जिन विकसित देशों की बात कर रहे हैं वे पहले से ही यह मानते हैं कि माता-पिता दोनों की साझा परवरिश उस स्थिति में बिल्कुल भी ठीक नहीं है जहां किसी एक को दुव्र्यवहार या घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साथ ही गुजारा भत्ता नहीं देने को बच्चों की उपेक्षा का मामला बनाया जा सकता है। इसके अलावा साझा कस्टडी केवल उन्हीं मामलों में दी जा सकती है जहां मां और पिता दोनों का व्यवहार दोस्ताना और अच्छा हो। जहां दोनों एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी का भाव रखते हों और सहयोग करने को तैयार नहीं हों, वहां बच्चे की साझा कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। ज्यादातर मामलों में बच्चे की कस्टडी बेहद विवादास्पद हो जाती है। ऐसा शहरी धनी परिवारों में अधिक होता है। गंभीरता से जरूरत इस बात की है कि तलाकशुदा महिलाओं और उनके बच्चों को वित्तीय सहयोग मिले जो उनके जीवन को स्थिरता प्रदान कर सके।

(लेखिका महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली अधिवक्ता और मुंबई स्थित मजलिस लीगल सेंटर की निदेशक भी हैं।)

 Ms. Flavia Agnes का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

सृजन सौ मील समुदायों का – पद्मश्री इला आर. भट्ट

imagesगांधी जी स्वराज की बात करते थे। आर्थिक विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त जो स्थानीय नियंत्रण और स्थानीय रोजगार वाले क्षेत्रों में लागू होता था। आज भविष्य के बारे में बात करती हूं तो मुझे भी लगता है कि आम आदमी को स्थानीयता की जरूरत है। इसलिए यहां मैं अपने 100 मील के सिद्धांत के बारे में बताना चाहती हूं जिसकी जड़ें भोजन की पारिस्थिकी में से निकली हैं और जिनका आज बुरी तरह अतिक्रमण किया जा रहा है।

100 मील का सिद्धांत

मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि हमारी छह सबसे मूलभूत जरूरतें हमारे पास सौ मील के दायरे में मौजूद स़्त्रोतों से पूरी की जा सकती हैं। ये मूलभूत जरूरते हैं भोजन, आश्रय, वस्त्र, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और प्राथमिक बैंकिंग। सौ मील का यह सिद्धांत स्थानीयता, आकार और आजीविका को दायरे में लाते हुए विकेन्द्रीकरण का ताना-बाना बुनता है। आजीविका के लिए पदार्थ, उर्जा और ज्ञान के तौर पर जिन चीजों की जरूरत होती है वे सब हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। बीज, मिट्टी और पानी के रूप में ज्ञान हमारे बिल्कुल पास है और उन्हें पहचानने की जरूरत है। इसी तरह सुरक्षा भी स्थानीय खोजों से ही मिलती है न कि कहीं दूर से हमारे पास पहुंचती है। जरूरत है तो हमें उस दुनिया से बाहर निकलने की जो लोगों को वो खाने से रोकती है जो वे उपजाते हैं और वो उपजाने से रोकती है जो वे खाना चाहते हैं। इस वजह से उनका अपने उत्पादों और अपनी खुराक पर से नियंत्रण खो चुका है और वे एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा बन गए हैं जहां नतीजे दूर बैठे लोगों द्वारा तय किये जाते हैं और जिनकी इसमें न तो कोई रुचि होती है और न ही नियंत्रण।

        हमारा अगला बिंदु जुड़ा है समग्र कार्य से। हमने देखा है कि कई समाजों में जहां कामों को समुदायिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, खासकर महिलाओं के मामले में तो वे अधिक संतोषजनक और रचनात्मक रूप में सामने आते हैं। विकेन्द्रीकृत उत्पादन से समुदायों को अपने उत्पादों और उसके इस्तेमाल पर ज्यादा नियंत्रण प्राप्त होता है। इसका मतलब ये हो सकता है कि उत्पादन प्रक्रिया का एक हिस्सा केवल अपने इस्तेमाल या फिर लेन-देन के लिए रहे। हमने देखा है कि उत्पादन से जुड़े स्थानीय संगठन वहां की संस्कृति से ज्यादा अच्छी तरह से जुड़ पाते हैं और इस तरह वे विकास के लिए सतत् और समग्र दृष्टिकोण अपना पाते हैं। इसके अलावे स्थानीय उत्पादन और वितरण से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका भी ज्यादा मजबूत हो जाती है।

        महिलाओं के ज्यादातर काम अवैतनिक होते हैं और उनका महत्व परिवार के लिए होता है। इसके साथ-साथ सामुदायिक कार्य जैसे सामाजिक संबंधों को बनाए रखने का काम भी उनके ही जिम्मे होता है। ऐसे में आर्थिक विकेन्द्रीकरण दो तरह से महिलाओं के लिए लाभप्रद हो सकता है। पहला, यह स्थानीय श्रम और बाजार को मजबूती देगा और महिलाओं के लिए स्थानीय बाजारों तक पहुंच को आसान बनाएगा। दूसरा, यह अवैतनिक कामों का महत्व बढ़ाएगा और उन सभी सामुदायिक और सेवा आधारित कामों को तरजीह देगा जो समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।

        यहां दी गई दलीलों का यह मतलब कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि स्थानीय समुदायों को वृहद समाज से अलग कर देना चाहिए। बल्कि इसके विपरीत स्थानीय समुदायों को तो वृहद बाजारों से और ज्यादा जोडे़ जाने की जरूरत है ताकि उत्पादों का वितरण बढ़े और सेवाओं व दक्षता को और अधिक मजबूती मिल सके। यहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं उनका तात्पर्य उत्पादन और निवेश की संरचनाओं में मौजूद असमानता का प्रतिकार करना है जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को क्रमशः निम्नस्तरीय बल्कि नग्न बनाते जा रहे हैं।

‘सेवा को-आपरेटिव बैंक’स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच गतिशीलता को बनाए रखने का अच्छा उदाहरण है। गरीब महिलाओं का अपनी पूंजी पर अधिकार होता है लेकिन वे इसका इस्तेमाल रोजगार जनक वितरण व लाभांश के लिए करती हैं और इस तरह वृहद बाजारों तक अपनी पहुंच को आसान बनाती हैं। वहीं दूसरी ओर, ^सेवा बैंक’रिजर्व बैंक की वित्तीय और नियामक प्रणालियों के माध्यम से देश के अन्य बड़े बैंकों से भी जुड़ा है और उनके साथ वित्तीय व बैंकिंग लेन-देन करता है।

पिछले कुछ वर्षों में जहां आर्थिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में काम बेहद धीमी गति से हुआ है तो वहीं राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के लिए हड़बड़ी दिखाई गई। उदाहरण के लिए, 1992 के संविधान संशोधन द्वारा गांव और नगर स्तर पर चुने गये स्थानीय निकायों को ज्यादा शक्ति देने की बात की गई थी। इसमें कहा गया था कि संविधान को पंचायती राजतंत्र को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में क्या हुआ! स्थानीय और ग्रामीण निकाय राज्य सरकारों की इच्छा से भंग किये जाने लगे और चुनाव तो दशकों तक नहीं कराये गये। ग्रामीण निकायों के पास अपने कामों को पूरा करने के लिए बेहद सीमित मात्रा में फंड थे तो स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आधारभूत विकास कार्यक्रमों पर या तो नौकरशाहों या फिर राज्य सरकार का नियंत्रण था। इसे कहीं से भी राजनीतिक विकेन्द्रीकरण नहीं कहा जा सकता।

        प्रशासनिक और राजनीतिक ताकतों का विकेन्द्रीकरण भारतीय लोकतंत्र के दोबारा उठ खड़े होने का प्रतीक है जो सत्ता में आम जन की सहभागिता को प्रतिस्थापित करता है। क्षेत्र विशेष के लोगों को अब मालूम है कि उनकी मूलभूत जरूरतें क्या हैं। उसे पूरा करने के लिए तुरंत क्या होना चाहिए और किस चीज के लिए इंतजार किया जा सकता है। लोगों के बीच आई इस जागरूकता से स्थानीय प्रतिभा और दक्षता को बढ़ावा मिलेगा जबकि रोजगारों का सृजन और पर्यावरण का संरक्षण भी होगा। हालांकि स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था का सक्षम होना भी जरूरी है क्योंकि बिना आर्थिक विकेन्द्रीकरण के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण होने पर केन्द्रीय संसाधनों पर निर्भरता और बढ़ती जाएगी।

        अंत में, ^सेवा’के हमारे अनुभवों ने दिखाया है कि सामुदायिक आर्थिक संगठन न केवल गरीब महिलाओं की पहुंच में होते हैं बल्कि इससे उनकी कार्यक्षमता में भी कई तरह से विस्तार होता है। पहला, महिलाओं को समाज के लिए किए गए अपने कामों को लेकर नई पहचान मिलती है। दूसरा, सामुदायिक संस्थाओं द्वारा महिलाओं को अपनी संस्था खोलने और बाजार तक सीधे पहुंचने की इजाजत दे दी जाती है जिससे उन्हें छोटे कारोबारियों और अन्य बिचैलियों के शोषण से मुक्ति मिल जाती है। तीसरा, महिलाओं को अपने संसाधनों, पूंजी और कौशल पर अधिकार मिल जाता है। जब वे ^सेवा’से जुड़ती हैं तो अपनी बचत, लाभ, आवास, पेंशन और अन्य लाभों के बारे में मिल-जुलकर फैसला लेती हैं। चैथी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि समुदाय में रहने पर महिलाएं सरकारी याजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ ले पाती हैं जो वे अकेले रहने पर नहीं ले पाती हैं। और सबसे आखिर में, साथ आने पर न केवल उनकी आवाज को बुलंदी मिलती है बल्कि बाजार में उनकी सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ जाती है।

(इला रमेश भट्ट एक गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता और ^सेल्फ इम्प्लाएड वीमेन एसोसिएशन आफ इंडिया’(सेवा) की संस्थापक हैं। वे इसके स्थापना काल 1972 से लेकर 1996 तक महासचिव रहीं। पेशे से वकील रहीं इला भट्ट ने को-आपरेटिव, माइक्रो फाइनांस, अंतरराष्ट्रीय श्रम और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इन्हें 1977 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे अवार्ड और 1984 में राइट लिवलीहुड अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा इन्हें देश के सम्मानित पद्मश्री (1985) और पद्म भूषण (1986) से भी नवाजा जा चुका है।)

पद्मश्री इला आर. भट्ट का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

पेरेंटिंग और कार्य भूमिका एक पिता की – विभुति पटेल:

पेरेंटिंग और कार्य

भूमिका एक पिता की

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जब मेरी बेटी का जन्म हुआ तो मुझे और मेरे पति के लिए सबसे जरूरी था अपनी व्यस्त जिंदगी को संतुलित बनाना और इसके लिए हमें आपसी बातचीत के जरिये ढेर सारी योजनाएं बनानी थीं क्योंकि हम दोनों के कार्य क्षेत्र चुनौतियों और सामाजिक दायित्वों से परिपूर्ण थे। हमने फैसला किया कि यदि एक फुल टाइम नौकरी करे और दूसरा फ्रीलांस करे तो मां और बाप में से एक व्यक्ति बच्चे को अपना पूरा समय दे पाएगा। मेरी बेटी का व्यक्तित्व, उसके मूल्य, बौद्धिक सक्रियताएं और उसके पेशागत आचार-विचार, इन सबके पीछे उसके पिता का प्रभाव है जो उसके रोल माडल भी हैं। बच्चों की देखभाल के लिए जितनी जरूरत भौतिक सुविधाओं की है उतनी ही जरूरत उनकी भावनात्मक और विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने की भी है। इसलिए मां और पिता दोनों के लिए जरूरी है कि वे बच्चे के साथ अर्थपूर्ण और भावनात्मक रूप से जुड़ें। प्री स्कूल से लेकर कालेज तक मेरे पति ने बेटी की प्रगति से संबंधित हर बैठकों और सत्रों में हिस्सा लिया। मेरे पति के अलावा केवल एक और पुरुष जो कि किसी बच्चे के नानाजी थे और जिनकी बेटी और दामाद खाड़ी देश में काम करते थे, स्कूल की बैठकों में अन्य मांओं के साथ मौजूद होते थे।

                मेरी बेटी का जन्म 1984 में हुआ था और 1985 से लेकर 1993 तक मुझे देश और देश के बाहर अत्यधिक जाना पड़ता था। 1992 से 1993 के बीच दस महीनों के लिए अपने पोस्ट डाक्टरल कार्य के दौरान मुझे लंदन में रहना पड़ा। मेरे पति अमर ने मेरी बेटी को संभालने में सबसे अहम भूमिका निभाई जब वो शिशु थी या जब वो स्कूल जाने लगी या जब कभी वो बीमार पड़ी। एक बार भी हमारे दिमाग में बेटी को हास्टल में रखने का विचार नहीं आया।

बदलती सच्चाई

परंपरागत रूप से पिताओं को परिवार में फैसले लेने और अनुशासन कायम करने वाला माना जाता है। यदि पिता उग्र स्वभाव वाले हैं तो बहुधा उनके बच्चे विद्रोही बन जाते हैं। ऐसे में भारतीय पिताओं के लिए यह चुनौती है कि वे परिवार में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाएं और ऐसा करने के लिए उन्हें न केवल बच्चों की रोज की जरूरतों को पूरा करना होगा बल्कि प्यार, सुरक्षा और बौद्धिक तथा मनोवैज्ञानिक जुड़ाव के द्वारा उनकी जिंदगी से संबद्ध भी होना होगा। जब एक बच्चा पिता को तानाशाह के रूप में देखना छोड़ देता है तो वह परिवार में दोस्तीपूर्ण संबंधों की ओर बढ़ता है और बच्चों के साथ बातचीत का माहौल बनता है।

                आज के दौर में बहुत कम ही ऐसे पिता हैं जो परिवार के अकेले कमाने वाले व्यक्ति हैं। पिता और मां दोनों की भूमिकाएं बढ़ रही हैं, काम और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखना कई नौकरीपेशा अभिभावकों के लिए चुनौती बना हुआ है, परिवारों का आकार छोटा हो गया है और संयुक्त परिवारों का विखंडन हो गया है। यहां तक कि तलाकशुदा दंपतियों में भी पिताओं को अपने बच्चों से मिलने का अधिकार दिया जाने लगा है। पूरी दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में मैं ऐसे सैकड़ों दंपतियों से मिल चुकी हूं जहां बच्चों की देखभाल के लिए पिताओं ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी है। पहले के समय में ऐसे पिताओं को ‘नामर्द’ और ‘जोरू का गुलाम’कहा जाता था। ऐसे पुरुषों को हतोत्साहित किया जाता था और उन्हें सबसे अलग बताकर सामाजिक कार्यक्रमों में भी हाशिये पर रखा जाता था। लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले पिताओं की संख्या काफी बढ़ी है और इस कार्य के लिए उनकी इज्जत भी की जाती है।

                बच्चों के संपूर्ण विकास में पिताओं की भूमिका पर होने वाली सार्वजनिक बहसों के कारण मेट्रो शहरों के  पुरुषों की सोच में बदलाव आया है। कूल, स्मार्ट, आकर्षक और स्टाइलिश लोगों को अब बच्चों की नैपी बदलने, उन्हें लोरी सुनाने, उनका होमवर्क कराने और उन्हें पार्क ले जाने में न कोई झिझक है और न समस्या। आज के पिता कहते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ कम से कम उतना समय जरूर बिताना चाहते हैं जितना उनके पिता ने उनके साथ बिताया था। ज्यादा से ज्यादा पिता घरों में अपने बच्चों के साथ रहकर उनकी देखभाल कर रहे हैं।

                हमें नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा के गांव से आने वाली कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना देखा था और उनका वह स्वप्न उनके पिता के लगातार सहयोग और प्रोत्साहन के कारण ही पूरा हो सका था। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बाल्यावस्था में बच्चों के साथ पिता के भावनात्मक जुड़ाव का गहरा असर बच्चों के बाद के विकास पर पड़ता है। परिवार में पिता के सकारात्मक और गहरे जुड़ाव के लिए बच्चों के साथ अर्थपूर्ण संवाद का होना जरूरी है।

पेरेंटिंग पर राज्यों की नीतियां

राज्यों के लिए यह जरूरी है कि वे बच्चों की देखभाल में पिताओं की भूमिका को बढ़ाने के बारे में सोचें और यह स्वीकार करें कि बच्चे के जन्म के बाद पुरुषों को पितृत्व अवकाश न मिलने से महिलाओं को फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो मां को मातृत्व अवकाश दिया जाता है जबकि पिता को कोई अवकाश नहीं दिया जाता है। इसके पीछे की मंशा साफ है कि मां को बच्चे की देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए उसे घर पर ही रहना चाहिए जबकि पिता के पास कोई विकल्प नहीं होता। वो अपने बच्चे के लिए बमुश्किल समय निकाल पाता है। ये परिस्थितियां महिलाओं को काम से दूर ले जाती हैं या एक कर्मचारी के रूप में उनके एकीकरण को मुश्किल बना देती हैं। काम के घंटों में लचीलापन, दफ्तर से टेलीकम्यूनिकेशन की सुविधा और कार्यालय में महिलाओं और पुरुषों दोनों के बच्चों के लिए क्रेश की सुविधा तथा पार्ट टाइम काम करने का विकल्प पिताओं को भी बच्चों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यह कहना कि राज्यों को पितृत्व अवकाश के बदले में राशि का भुगतान करना चाहिए, दर्शाता है माता-पिता खुद अपने बच्चे का अहित कर रहे हैं। शिशु केंद्रित मॉडल कहता है कि बच्चे को धरती पर लाने का फैसला मां और पिता दोनों का होता है इसलिए उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी भी दोनों की समान रूप से बनती है। ऐसे में बच्चे के बदले में भुगतान करने की  मानसिकता बच्चे के हित के विरुद्ध है।

श्रम बाजार में लिंग के आधार पर पारिश्रमिक में भेदभाव

श्रम बाजार पारिश्रमिक और प्रोन्नति के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव करता रहा है। महिला श्रमिक पुरुषों की तुलना में हमेशा कम पारिश्रमिक पाती हैं। ऐसी स्थिति में जब बच्चे का जन्म होता है तो परिवार मां और पिता दोनों के योगदान की तुलना करता है और पाता है कि यदि मां बच्चे की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती है तो नुकसान पुरुष के नौकरी छोड़ने की बनिस्बत कम होगा।   इन बाधाओं से पार पाने के लिए कुछ देशों ने अपने यहां परिवारों के लिए प्रोत्साहन के तरीके अपनाए हैं। चिली, इटली और पुर्तगाल में पितृत्व अवकाश अनिवार्य हैं। स्कैंन्डिनेवियाई देशों में पिताओं को घर पर रहने की छूट दिया जाना दिलचस्प है। स्वीडन ने भी जेंडर को लेकर निष्पक्ष रवैया अपनाया है और उन दंपतियों के लिए बोनस की व्यवस्था की है जो छुट्टियां समान रूप से साझा करते हैं। स्वीडिश पिता अब कुल पेंरेंटल लीव का पांचवां हिस्सा लेते हैं जो कि साझा छुट्टियां घोषित करने के समय करीब शून्य था। नार्वे में जहां पिताओं के लिए कई छुट्टियां तय हैं,  दस में से सात पिता अब पांच से ज्यादा सप्ताह की छुट्टियां लेते हैं। जर्मनी ने भी समान पद्धति अपनाई और पाया कि परिवार के लिए छुट्टी लेने वाले पिताओं की संख्या 2006 के 3 फीसद के मुकाबले 2013 में 32 फीसद तक बढ़ गई है। पोलैंड साझा अवकाश को छोड़कर जेंडर कोटा आधारित छुट्टियों को अपना चुका है। फ्रांस उन पति-पत्नियों को बोनस देता है जो बच्चों की जिम्मेदारी को आपस में बांटकर काम करते हैं।

निष्कर्ष

मर्दों को पैसे कमाने वाला और औरतों को बच्चे संभालने वाली मानकर दिया जाने वाला परंपरागत मातृत्व अवकाश न केवल लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता है बल्कि यह व्यवस्था पिताओं के साथ भी अन्याय करती है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने और उनके विकास में अपना सकारात्मक योगदान देने तथा उनके साथ अच्छा समय बिताने का मौका नहीं दिया जाता है। बच्चों को संभालने का साझा मौका दिये जाने से महिलाओं का पेशागत भविष्य संवरता है, बच्चों का अच्छा विकास होता है और बहुत हद तक पिता को भी जीवन में अधिक संतुष्टि मिलती है। मीडिया को भी घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले और खाना बनाने, सफाई करने व अन्य कार्य करने वाले पिताओं की सकारात्मक छवि पेश करनी चाहिए।

डा0 विभुति पटेल का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।