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बिकाउ हैं मगर टिकाउ नहीं ! – दीपिका झा

deepika jhaदुनिया भर की खबर लेने वाली पत्रकार बिरादरी कभी खुद खबर नहीं बन पाती है। उनके संगठन, उनका दोहन, शोषण, भेदभाव और कम पारिश्रमिक की खबर कभी किसी अखबार या टीवी चैनल के जरिये सामने नहीं आ पाती। जब पूरी बिरादरी का ये हाल है तो सोचिये उसके हाशिये पर मौजूद महिलाओं के साथ कैसा रवैया अपनाया जाता होगा। आम तौर पर महिलाओं से जुड़ी खबर किसी भी अखबार या टीवी चैनल के लिए सबसे बिकाउ खबर होती हैं। लेकिन विडंबना है कि खुद उन अखबारों और चैनलों में काम कर रहीं महिलाएं उनके लिए मायने नहीं रखतीं क्योंकि उन्हें टिकाउ नहीं माना जाता। सब कुछ मानने पर ही है। ये मान लिया जाता है कि अनब्याही महिलाएं ज्यादा काम कर सकती हैं। ये भी मान लिया जाता है कि शादी होते ही महिलाओं की कार्यक्षमता घट जाती है और अगर वे मां बन गईं तब तो उन्हें काम पर रखना भी बेकार है। ऐसे में अगर नौकरी से नहीं निकाल सकते तो तुरंत उनकी शिफ्टिंग फीचर डेस्क या फिर अपेक्षाकृत कम जिम्मेदारी वाले डेस्क पर कर दी जाती है। नतीजा कि बड़ी संख्या में महिलाएं या तो काम छोड़ देती हैं या पत्रकारों की गिनती में ही नहीं रह जाती हैं।

        वर्ष 2014 में मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा देश की मीडिया में महिलाओं की स्थिति जानने को लेकर कराए गए एक अध्ययन में बताया गया कि जिलों में महिला पत्रकारों की संख्या केवल 2-7 फीसद है। इतना ही नहीं देश में छह राज्य और दो केन्द्र शासित राज्य ऐसे भी हैं जहां के जिलों में एक भी महिला पत्रकार नहीं है। हालांकि आंध्र प्रदेश सबमें अच्छी स्थिति में है क्योंकि यहां जिलों में 107 महिलाएं पत्रकार हैं। सर्वे में बताया गया कि बड़े मीडिया हाउसों ने महिला पत्रकारों की तरक्की के बारे में छोटे हाउसों की तुलना में कम सोचा। बड़े और राष्ट्रीय स्तर के अखबारों और चैनलों ने महिला पत्रकारों को मान्यता दिलाने में दिलचस्पी नहीं ली। उनकी तुलना में छोटे और स्थानीय अखबारों व चैनलों ने अच्छा काम किया। इसी तरह बड़े घरानों में महिलाओं की संख्या भी छोटे अखबारों की तुलना में कम रही और जिला स्तर पर तो बेहद कम। स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाली महिलाओं की दशा तो और भी खराब है और सर्वे के मुताबिक देश में केवल दो महिला पत्रकार स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं जिनमें एक फोटोग्राफर हैं। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने देश के 28 राज्यों के 255 जिलों से सूचनाओं को एकत्रित कर सर्वे को जारी किया था।

        अखबारों में मार्केटिंग जैसे गैर पत्रकारिय विभागों को छोड़ दिया जाय तो डेस्क और रिपोर्टिंग दो सबसे महत्वपूर्ण विभाग हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बिना अखबार का काम नहीं चल सकता। करीब पंद्रह साल पहले बिहार की राजधानी पटना में लगभग सभी प्रिंट मीडिया हाउसों में महिलाएं डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों ही विभागों में अच्छी संख्या में कार्यरत थीं। पटना से छपने वाले सभी अखबार यथा, हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण और प्रभात खबर खबरों के चयन और पन्नों की ले-आउट से जुड़े लगभग सभी फैसले स्थानीय स्तर पर ही ले लिया करते थे। ऐसे में डेस्कों पर महिला पत्रकारों की बहाली भी खूब होती थी क्योंकि जरूरत ज्यादा लोगों की होती थी। धीरे-धीरे लगभग सभी हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों ने स्थानीय स्तर पर फैसले लेने बंद कर दिये और वे अपने-अपने हेडक्वार्टर से संचालित होने लगे। नतीजतन डेस्कों पर लोगों की जरूरत कम हो गई और फिर शुरू हुआ छंटनी का दौर। जाहिर है महिलाएं निशाने पर रहीं और उन्हें हटाया जाने लगा। जो न जा सकीं उनके लिए काम करने की परिस्थिति इतनी मुश्किल कर दी गई कि उन्होंने खुद ही काम छोड़ दिया। अखबारों में अमूमन दो शिफ्टों-दिन और रात- में होने वाले काम एक शिफ्ट तक ही सीमित कर दिये गये और ड्यूटी अमूमन चार बजे शाम से लेकर देर रात तक की होने लगी। इस व्यवस्था में भी सबसे जल्दी महिलाओं ने सरेंडर किया और कई पत्रकारों ने काम छोड़ दिया। महिलाएं यदि पत्रकार हैं तो वे एक मां, पत्नी और बहू भी हैं। उनके लिए हर भूमिका एक समान महत्वपूर्ण है। ऐसे में जब बात चुनाव की आती है तो सबसे पहले वे अपने करियर को दांव पर लगा देती हैं।

        एक बड़ी मुश्किल तब आई जब दिल्ली में हुए शर्मनाक निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा और उषा मेहरा कमिटी की सिफारिशों पर सरकार ने कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना के खिलाफ अधिनियम को पारित किया और हर कार्यालय में जहां महिलाएं काम कर रही हों एक शिकायत सेल का गठन अनिवार्य बना दिया। स्थिति ये हो गई कि जहां पुरुष अधिकारी सशंकित रहने लगे तो वहीं कुछ महिलाओं ने भी इसका फायदा लेना शुरू कर दिया। अखबारों में हालत ये हो गई कि महिलाओं को बहाल करने पर ही रोक लग गई। नतीजतन लगभग हर अखबार में डेस्क पर बमुश्किल एक या दो महिलाएं रह गईं। रिपोर्टिंग में महिलाओं की संख्या कुछ ज्यादा है क्योंकि वहां देर रात तक रुकने की अनिवार्यता नहीं होती।

             वर्ष 2014 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने देश में महिला पत्रकारों की स्थिति पर एक अध्ययन कराया था जिसके नतीजे काफी निराशाजनक रहे थे। अध्ययन में बताया गया कि ये सही है कि पिछले दो दशकों में देश में पत्रकारिता में आने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है फिर भी उनके काम करने की परिस्थितियां बेहद निराश करने वाली हैं। ज्यादा काम, कम पैसा और गैर बराबर मौका ये सब उनका हौसला घटाने के लिए काफी होते हैं। तिस पर भी प्रोन्नति शायद ही कभी मिलती है। स्ट्रिंगर से शुरू होने वाला उनका सफर अधिक से अधिक चीफ सब एडीटर तक जाकर रुक जाता है। इस अध्ययन में कहा गया कि महिला पत्रकारों को प्रमोशन न दिये जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण जो बताया जाता है वो है उनका नाइट शिफ्ट न कर पाना। रिपोर्ट में बताया गया कि देश में कई महिलाएं-जो कि अच्छे हाउसों में भी काम कर रही हैं- दैनिक पारिश्रमिक पर काम कर रही हैं, जिनके पास नियुक्ति पत्र तक नहीं हैं और महीने के अंत में उन्हें 1500 से 3000 रुपये तक ही मिल पाते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां दैनिक भाष्कर और नई दुनिया जैसे स्थापित मीडिया हाउस हैं, वहां एक भी महिला पत्रकार स्थायी नौकरी में नहीं है। जिनके पास दो से तीन साल का अनुबंध है वे भी खुशकिस्मत हैं क्योंकि इनकी संख्या भी बहुत कम है। ऐसे में जब छंटनी का वक्त आता है तो ये महिलाएं सबसे पहले बाहर जाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के उत्तर-पूर्व में स्थित 7 राज्यों में कुल मिलाकर मात्र 35 महिला पत्रकार हैं जिनमें से 40 फीसद को कभी प्रमोशन नहीं दिया गया जबकि केवल 35 फीसद ही फुल टाइम कर्मचारी हैं।

        औरतों के साथ अन्याय और न्याय की खबरों से भरे रहने वाले टीवी चैनलों और अखबारों के भीतर का सच ये है कि खुद वे कभी अपने यहां काम करने वाली स्त्रियों के साथ न्याय नहीं करते। बिहार की ही एक महिला पत्रकार ने बताया कि मातृत्व अवकाश पूरा करने के बाद जब वो काम पर लौटीं तो उन्हें डिमोट कर दिया गया। इसी तरह मध्य प्रदेश की एक पत्रकार को तो मातृत्व अवकाश लेने के कारण काम से हटा ही दिया गया। ज्यादातर महिलाओं ने, जो हाल ही में मां बनी थीं, बताया कि मैटरनिटी लीव लेने के बाद जब वे लौटीं तो दोबारा ज्वायन करने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। प्रबंधन ने उन्हें काम पर न लौटने देने की हर संभव कोशिश की। एक बड़े अंग्रेजी अखबार में काम करने वाली महिला ने बताया कि मां बनने से पहले तक वे बेहद जिम्मेदार थीं लेकिन जैसे वे मां बनीं उनकी विश्वसनीयता कम हो गई। जबकि सच्चाई तो ये है कि महिलाओं के मां बन जाने से उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है बल्कि वे तो और ज्यादा संवेदनशील तरीके से काम करना सीख जाती हैं। अफसोस कि अखबारों और चैनलों में काम करने वाले पुरुषों को स्त्रियों की दक्षता दिखाई नहीं देती।

दीपिका झा  का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

कठिन है साझा परवरिश की राह-Ms. Flavia Agnes


flavia2बच्चों के संरक्षण और अभिभावकत्व से जुड़े अंग्रेजी कानूनों की शुरुआत इस सिद्धांत से हुई थी कि पिता ही बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक हैं। इस सिद्धांत को भारत समेत सभी कामनवेल्थ देशों ने अपनाया था जो गार्जियन्स एंड वार्ड एक्ट, 1890 (जीडब्ल्यूए) में झलकता भी था।

1956 में जब हिन्दू कोड बनाया जा रहा था तो हिन्दुओं को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया और उन्हें विशेष दर्जे में रखते हुए हिन्दू माइनारिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 (एचएमजीए) का निर्माण किया गया। बाकी के अल्पसंख्यक समुदायों ईसाई, मुसलमान और पारसी को पूर्व के जीडब्ल्यूए के तहत रखा गया। हालांकि वैवाहिक याचिकाओं के लिए सभी पर्सनल कानूनों में समान सिद्धांत का पालन किया जाता रहा।

        यद्यपि सिद्धांततः पिता को बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक माना गया लेकिन फिर भी मां की भूमिका प्राथमिक देखभाल के लिए महत्वपूर्ण मानी गई और तलाक की स्थिति में बच्चे का शारीरिक संरक्षण मां को दिया जाने लगा। हालंkकि इसे अस्थायी व्यवस्था ही समझा गया। जिन मामलों में मां पर अनैतिकता का आरोप लगा हो या जहां मां ने दूसरी शादी कर ली हो, उन मामलों में उसे बच्चे की कस्टडी प्राप्त करने से वंचित रखा जाता था। हालांकि समान अवस्था में यदि पिता पर बच्चों की उपेक्षा करने, उन्हें मारने-पीटने, अनैतिक व्यवहार करने या दूसरी शादी कर लेने का आरोप लगा हो तो भी उसे उसके प्राकृतिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था। यह स्थिति तलाकशुदा महिलाओं को उनका अधिकार पाने से रोकती थी। इस अन्याय के विरुद्ध ^^बच्चे का हित सर्वोपरि है’इस न्यायिक सिद्धांत की उत्पत्ति हुई। यह सिद्धांत पिता का बच्चे पर प्राकृतिक अधिकार वाले सिद्धांत में एक छेद के समान था। आज संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों के कन्वेंशन (यूएनसीआरसी) पर आधारित इस सिद्धांत को तमाम सीमागत और परंपरागत कानूनों से परे रखकर हर जगह अपनाया जा रहा है। बच्चों के संरक्षण, अभिभावकत्व और उस तक पहुंच को अब माता-पिता के अधिकारों के तहत नहीं रखा जा सकता है बल्कि अब बात बच्चों के परम हित की है। अदालतों को बेहद सतर्कतापूर्वक अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना होगा ताकि किसी भी बच्चे के उस मौलिक मानवाधिकार का हनन न हो सके जो उसे बिना डर और कष्ट के जीने की आजादी देता है।

            वास्तव में यह नीति उससे भी ज्यादा जटिल है जितनी की सामने दिखाई देती है। अगर पिता अमीर हो लेकिन मां के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन न हो तो बच्चे का हित किसके साथ होगा, कुछ मामलों में अदालतों ने यह व्यवस्था दी है कि मां के पास आय का जरिया न होने का यह मतलब कतई नहीं है कि उसे बच्चे की कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। पिता की उच्च सामाजिक स्थिति या उसका चरित्र तथा मां का नैतिक आचार, पिता के पक्ष में फैसला लेने के लिए संपूर्ण तथ्य नहीं हो सकते। इन मामलों में केवल एक ही तथ्य मायने रखता है और वह है बच्चे के प्रति दिखायी जाने वाली सुरक्षा और चिंता की भावना। वैधानिक सिद्धांतों में इस बात को भली-भांति अपनाया जा चुका है कि प्रारंभिक दिनों में बच्चे को उसकी मां के प्यार और देखभाल से अलग करना बच्चे के हित में नहीं होगा। इसके अलावा मां को बच्चे का समान रूप से अभिभावक मानने की सोच भी विकसित हुई है और आज के दौर में सभी आधिकारिक कार्यों, जैसे कि स्कूल में नामांकन कराने, बैंक खाता खुलवाने, पासपोर्ट, राशन कार्ड आदि बनवाने में अभिभावक के रूप में मां के अधिकार को भी मान्यता दी जाने लगी है। हालांकि इस स्थिति को पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है।

        जहां गैर कामकाजी माताओं को आय के साधन न होने की वजह से डराया जाता रहा है वहीं कामकाजी मांओं को भी एक अलग प्रकार के तनाव से गुजरना पड़ता है। क्या एक महिला जो नौकरी कर रही है और दिन का ज्यादातर समय घर से बाहर बिता रही है, बच्चे की देखभाल कर पाने में सक्षम होगीघ् हाल के कई मामलों ने इसका भी जवाब दिया है। यह माना गया कि एक मां को केवल इस कारण से कि वह नौकरी कर रही है, बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं रखा जा सकता है। आज के दौर के कस्टडी मामलों में न तो पिता को, जिसे प्राकृतिक रूप से अभिभावक माना जाता रहा है और न ही मां को, जो जैविक रूप से अभिभावक है, को आसानी से बच्चे की कस्टडी दे दी जाती है। बल्कि बच्चे के परम हित को सर्वोपरि मानते हुए घर के माहौल और उसके पालन-पोषण की व्यवस्था को ध्यान में रखा जाता है। साधारणतया अदालतें बच्चे को उसके वर्तमान माहौल से हटा कर गैर कस्टडी वाले अभिभावक के साथ रखने को तरजीह नहीं देती हैं।

        जब कोई मामला सामने आता है तो आम तौर पर अदालतें  बच्चे को उस अभिभावक के पास ही छोड़ देती हैं जिसके पास वो रह रहा होता है जबकि दूसरे को बच्चे से मिलने की छूट दी जाती है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि बच्चे से मिलने की छूट बच्चे के माता-पिता से मिलने के अधिकार के तहत दी जाती है न कि मां-बाप के अधिकार के तहत।

        वैवाहिक मामलों को देखने वाली अदालतों, काउंसलरों तथा वकीलों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कस्टडी संबंधी किसी भी केस के केन्द्र में एक बच्चा होता है। चूंकि बच्चा केस की सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं होता इसलिए उसकी गैरमौजूदगी में उसके हितों को सुरक्षित रखने का दायित्व कोर्ट का होता है। अदालतें दो पक्षों के बीच की लड़ाई में बच्चे को किसी वस्तु की नहीं देख सकतीं। घरेलू हिंसा के उन मामलों में जहां मां को जबरन घर से बाहर निकाल दिया जाता है, वहां तलाक के बाद बच्चे और मां सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस स्थिति में बच्चे को अदालत में प्रस्तुत कर बिना भय और आशंका के माहौल में उनकी इच्छा पूछी जाती है। वे किसके साथ रहना चाहते हैं, इस बारे में बच्चे को फैसला लेने को कहा जाता है। लेकिन अक्सर बच्चे अपने पिता के खिलाफ कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसका कारण पिता से उनका डर भी हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में अदालत को व्यावहारिक भूमिका निभाते हुए बच्चे के लिए सुरक्षित और स्नेह भरा माहौल बनाना चाहिए। बच्चों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके किसी भी फैसले का उन पर या उनकी मां पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। बच्चे के हित से जुड़ा सिद्धांत उस समय और भी मुश्किल में पड़ जाता है जब बच्चा खुद घरेलू हिंसा का शिकार होता है या वो अपनी मां के साथ हिंसा को देख चुका होता है। इन मामलों में अत्यधिक संवेदनशीलता की जरूरत होती है ताकि बच्चा दोबारा से सदमे में न चला जाय। ऐसे में कोर्ट पिता को बच्चे से मिलने की आसान छूट न देते हुए थोड़े समय के लिए ही मिलने की छूट दे सकता है जिससे कि बच्चे को पिता के साथ अच्छे संबंध दोबारा स्थापित करने के लिए समय मिल सके। बच्चे की भावनाओं को देखते हुए अदालत इस समय में धीरे-धीरे बढ़ोतरी कर सकती है। हाल के दिनों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें बच्चे को पिता या परिवार का कोई पुरुष यौन हिंसा का शिकार बनाते हैं। पहले से ही टूट चुके परिवारों में कई बार पत्नी से बदला लेने के लिए बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है।

        हाल के दिनों में बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में आई बढ़ोतरी को देखते हुए ला कमीशन आफ इंडिया ने साझा परवरिश की अवधारणा को अपनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किये हैं। यह अवधारणा अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में पहले से ही अपनाई जा रही है। इस धारणा को अपनाए जाने के पीछे जो तर्क दिय जाते हैं उनके मुताबिक अन्य विकसित देशों की तरह भारतीय परिवारों में भी लोगों की भूमिकाएं बदल रही हैं, जैसे कि पुरुष अब घरों में बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी लेने लगे हैं। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह बताया गया है कि बच्चे की परवरिश में मां और पिता दोनों का एक साथ शामिल होना ज्यादा अच्छा है बनिस्पत कि केवल मां या केवल पिता के। हालांकि इस अवधारणा को लागू करने से पहले साफ-साफ कहा गया है कि कोई भी सुधार भारतीय संस्कृति, समाज और लैंगिक संबंधों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

         लगभग सभी विकसित देशों में तलाक के मामलों में फैसला विवाह संबंधी संपत्ति के बंटवारे के साथ ही होता है। साथ ही बच्चे की कस्टडी पाने वाले को अपने घर में रहने और स्वयं व बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए वित्तीय सुरक्षा पाने का हक होता है। उन देशों में अलग हुई महिलाओं के लिए सुविधाजनक आश्रय और अकेली माताओं के लिए वित्तीय सुरक्षा दिये जाने का भी प्रावधान है।

          मौजूदा कानूनों के तहत बच्चे के 18 वर्ष के होने के बाद उसका साथ देने की जिम्मेदारी से पिता को मुक्त किया जा सकता है। ये वो समय होता है जब बच्चे को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती है। जब बच्चा डिग्री कालेज में पहुंचता है तो उस समय अकेली मां को उसका साथ देने के लिए छोड़ दिया जाता है। पिता द्वारा बच्चे को इस तरह उपेक्षित और अकेला छोड़ दिया जाना आईपीसी की धारा 317 की तरह कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जाता है जबकि अगर कोई अकेली मां अत्यधिक दवाब के कारण भी बच्चे को छोड़ती है तो उसके खिलाफ प्रावधान बनता है।

        इस समय हमारे देश के जो हालात हैं, चाहे वह किसी भी वर्ग में हो, वो ये है कि तलाक या विलगाव गंभीर वित्तीय असुरक्षा की ओर धकेलते हैं। आयकर भरने से किसी की आर्थिक स्थिति का पता नहीं चल जाता है और कई मामलों में तो गुजारा भत्ता को भी कम कर दिया जाता है क्योंकि पत्नी और बच्चे को दुख पहुंचाने के लिए पति अपनी अच्छी खासी नौकरी तक छोड़ देते हैं।

        ध्यान देना होगा कि हम जिन विकसित देशों की बात कर रहे हैं वे पहले से ही यह मानते हैं कि माता-पिता दोनों की साझा परवरिश उस स्थिति में बिल्कुल भी ठीक नहीं है जहां किसी एक को दुव्र्यवहार या घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साथ ही गुजारा भत्ता नहीं देने को बच्चों की उपेक्षा का मामला बनाया जा सकता है। इसके अलावा साझा कस्टडी केवल उन्हीं मामलों में दी जा सकती है जहां मां और पिता दोनों का व्यवहार दोस्ताना और अच्छा हो। जहां दोनों एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी का भाव रखते हों और सहयोग करने को तैयार नहीं हों, वहां बच्चे की साझा कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। ज्यादातर मामलों में बच्चे की कस्टडी बेहद विवादास्पद हो जाती है। ऐसा शहरी धनी परिवारों में अधिक होता है। गंभीरता से जरूरत इस बात की है कि तलाकशुदा महिलाओं और उनके बच्चों को वित्तीय सहयोग मिले जो उनके जीवन को स्थिरता प्रदान कर सके।

(लेखिका महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली अधिवक्ता और मुंबई स्थित मजलिस लीगल सेंटर की निदेशक भी हैं।)

 Ms. Flavia Agnes का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

सृजन सौ मील समुदायों का – पद्मश्री इला आर. भट्ट

imagesगांधी जी स्वराज की बात करते थे। आर्थिक विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त जो स्थानीय नियंत्रण और स्थानीय रोजगार वाले क्षेत्रों में लागू होता था। आज भविष्य के बारे में बात करती हूं तो मुझे भी लगता है कि आम आदमी को स्थानीयता की जरूरत है। इसलिए यहां मैं अपने 100 मील के सिद्धांत के बारे में बताना चाहती हूं जिसकी जड़ें भोजन की पारिस्थिकी में से निकली हैं और जिनका आज बुरी तरह अतिक्रमण किया जा रहा है।

100 मील का सिद्धांत

मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि हमारी छह सबसे मूलभूत जरूरतें हमारे पास सौ मील के दायरे में मौजूद स़्त्रोतों से पूरी की जा सकती हैं। ये मूलभूत जरूरते हैं भोजन, आश्रय, वस्त्र, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और प्राथमिक बैंकिंग। सौ मील का यह सिद्धांत स्थानीयता, आकार और आजीविका को दायरे में लाते हुए विकेन्द्रीकरण का ताना-बाना बुनता है। आजीविका के लिए पदार्थ, उर्जा और ज्ञान के तौर पर जिन चीजों की जरूरत होती है वे सब हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। बीज, मिट्टी और पानी के रूप में ज्ञान हमारे बिल्कुल पास है और उन्हें पहचानने की जरूरत है। इसी तरह सुरक्षा भी स्थानीय खोजों से ही मिलती है न कि कहीं दूर से हमारे पास पहुंचती है। जरूरत है तो हमें उस दुनिया से बाहर निकलने की जो लोगों को वो खाने से रोकती है जो वे उपजाते हैं और वो उपजाने से रोकती है जो वे खाना चाहते हैं। इस वजह से उनका अपने उत्पादों और अपनी खुराक पर से नियंत्रण खो चुका है और वे एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा बन गए हैं जहां नतीजे दूर बैठे लोगों द्वारा तय किये जाते हैं और जिनकी इसमें न तो कोई रुचि होती है और न ही नियंत्रण।

        हमारा अगला बिंदु जुड़ा है समग्र कार्य से। हमने देखा है कि कई समाजों में जहां कामों को समुदायिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, खासकर महिलाओं के मामले में तो वे अधिक संतोषजनक और रचनात्मक रूप में सामने आते हैं। विकेन्द्रीकृत उत्पादन से समुदायों को अपने उत्पादों और उसके इस्तेमाल पर ज्यादा नियंत्रण प्राप्त होता है। इसका मतलब ये हो सकता है कि उत्पादन प्रक्रिया का एक हिस्सा केवल अपने इस्तेमाल या फिर लेन-देन के लिए रहे। हमने देखा है कि उत्पादन से जुड़े स्थानीय संगठन वहां की संस्कृति से ज्यादा अच्छी तरह से जुड़ पाते हैं और इस तरह वे विकास के लिए सतत् और समग्र दृष्टिकोण अपना पाते हैं। इसके अलावे स्थानीय उत्पादन और वितरण से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका भी ज्यादा मजबूत हो जाती है।

        महिलाओं के ज्यादातर काम अवैतनिक होते हैं और उनका महत्व परिवार के लिए होता है। इसके साथ-साथ सामुदायिक कार्य जैसे सामाजिक संबंधों को बनाए रखने का काम भी उनके ही जिम्मे होता है। ऐसे में आर्थिक विकेन्द्रीकरण दो तरह से महिलाओं के लिए लाभप्रद हो सकता है। पहला, यह स्थानीय श्रम और बाजार को मजबूती देगा और महिलाओं के लिए स्थानीय बाजारों तक पहुंच को आसान बनाएगा। दूसरा, यह अवैतनिक कामों का महत्व बढ़ाएगा और उन सभी सामुदायिक और सेवा आधारित कामों को तरजीह देगा जो समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।

        यहां दी गई दलीलों का यह मतलब कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि स्थानीय समुदायों को वृहद समाज से अलग कर देना चाहिए। बल्कि इसके विपरीत स्थानीय समुदायों को तो वृहद बाजारों से और ज्यादा जोडे़ जाने की जरूरत है ताकि उत्पादों का वितरण बढ़े और सेवाओं व दक्षता को और अधिक मजबूती मिल सके। यहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं उनका तात्पर्य उत्पादन और निवेश की संरचनाओं में मौजूद असमानता का प्रतिकार करना है जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को क्रमशः निम्नस्तरीय बल्कि नग्न बनाते जा रहे हैं।

‘सेवा को-आपरेटिव बैंक’स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच गतिशीलता को बनाए रखने का अच्छा उदाहरण है। गरीब महिलाओं का अपनी पूंजी पर अधिकार होता है लेकिन वे इसका इस्तेमाल रोजगार जनक वितरण व लाभांश के लिए करती हैं और इस तरह वृहद बाजारों तक अपनी पहुंच को आसान बनाती हैं। वहीं दूसरी ओर, ^सेवा बैंक’रिजर्व बैंक की वित्तीय और नियामक प्रणालियों के माध्यम से देश के अन्य बड़े बैंकों से भी जुड़ा है और उनके साथ वित्तीय व बैंकिंग लेन-देन करता है।

पिछले कुछ वर्षों में जहां आर्थिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में काम बेहद धीमी गति से हुआ है तो वहीं राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के लिए हड़बड़ी दिखाई गई। उदाहरण के लिए, 1992 के संविधान संशोधन द्वारा गांव और नगर स्तर पर चुने गये स्थानीय निकायों को ज्यादा शक्ति देने की बात की गई थी। इसमें कहा गया था कि संविधान को पंचायती राजतंत्र को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में क्या हुआ! स्थानीय और ग्रामीण निकाय राज्य सरकारों की इच्छा से भंग किये जाने लगे और चुनाव तो दशकों तक नहीं कराये गये। ग्रामीण निकायों के पास अपने कामों को पूरा करने के लिए बेहद सीमित मात्रा में फंड थे तो स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आधारभूत विकास कार्यक्रमों पर या तो नौकरशाहों या फिर राज्य सरकार का नियंत्रण था। इसे कहीं से भी राजनीतिक विकेन्द्रीकरण नहीं कहा जा सकता।

        प्रशासनिक और राजनीतिक ताकतों का विकेन्द्रीकरण भारतीय लोकतंत्र के दोबारा उठ खड़े होने का प्रतीक है जो सत्ता में आम जन की सहभागिता को प्रतिस्थापित करता है। क्षेत्र विशेष के लोगों को अब मालूम है कि उनकी मूलभूत जरूरतें क्या हैं। उसे पूरा करने के लिए तुरंत क्या होना चाहिए और किस चीज के लिए इंतजार किया जा सकता है। लोगों के बीच आई इस जागरूकता से स्थानीय प्रतिभा और दक्षता को बढ़ावा मिलेगा जबकि रोजगारों का सृजन और पर्यावरण का संरक्षण भी होगा। हालांकि स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था का सक्षम होना भी जरूरी है क्योंकि बिना आर्थिक विकेन्द्रीकरण के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण होने पर केन्द्रीय संसाधनों पर निर्भरता और बढ़ती जाएगी।

        अंत में, ^सेवा’के हमारे अनुभवों ने दिखाया है कि सामुदायिक आर्थिक संगठन न केवल गरीब महिलाओं की पहुंच में होते हैं बल्कि इससे उनकी कार्यक्षमता में भी कई तरह से विस्तार होता है। पहला, महिलाओं को समाज के लिए किए गए अपने कामों को लेकर नई पहचान मिलती है। दूसरा, सामुदायिक संस्थाओं द्वारा महिलाओं को अपनी संस्था खोलने और बाजार तक सीधे पहुंचने की इजाजत दे दी जाती है जिससे उन्हें छोटे कारोबारियों और अन्य बिचैलियों के शोषण से मुक्ति मिल जाती है। तीसरा, महिलाओं को अपने संसाधनों, पूंजी और कौशल पर अधिकार मिल जाता है। जब वे ^सेवा’से जुड़ती हैं तो अपनी बचत, लाभ, आवास, पेंशन और अन्य लाभों के बारे में मिल-जुलकर फैसला लेती हैं। चैथी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि समुदाय में रहने पर महिलाएं सरकारी याजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ ले पाती हैं जो वे अकेले रहने पर नहीं ले पाती हैं। और सबसे आखिर में, साथ आने पर न केवल उनकी आवाज को बुलंदी मिलती है बल्कि बाजार में उनकी सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ जाती है।

(इला रमेश भट्ट एक गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता और ^सेल्फ इम्प्लाएड वीमेन एसोसिएशन आफ इंडिया’(सेवा) की संस्थापक हैं। वे इसके स्थापना काल 1972 से लेकर 1996 तक महासचिव रहीं। पेशे से वकील रहीं इला भट्ट ने को-आपरेटिव, माइक्रो फाइनांस, अंतरराष्ट्रीय श्रम और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इन्हें 1977 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे अवार्ड और 1984 में राइट लिवलीहुड अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा इन्हें देश के सम्मानित पद्मश्री (1985) और पद्म भूषण (1986) से भी नवाजा जा चुका है।)

पद्मश्री इला आर. भट्ट का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।

पेरेंटिंग और कार्य भूमिका एक पिता की – विभुति पटेल:

पेरेंटिंग और कार्य

भूमिका एक पिता की

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जब मेरी बेटी का जन्म हुआ तो मुझे और मेरे पति के लिए सबसे जरूरी था अपनी व्यस्त जिंदगी को संतुलित बनाना और इसके लिए हमें आपसी बातचीत के जरिये ढेर सारी योजनाएं बनानी थीं क्योंकि हम दोनों के कार्य क्षेत्र चुनौतियों और सामाजिक दायित्वों से परिपूर्ण थे। हमने फैसला किया कि यदि एक फुल टाइम नौकरी करे और दूसरा फ्रीलांस करे तो मां और बाप में से एक व्यक्ति बच्चे को अपना पूरा समय दे पाएगा। मेरी बेटी का व्यक्तित्व, उसके मूल्य, बौद्धिक सक्रियताएं और उसके पेशागत आचार-विचार, इन सबके पीछे उसके पिता का प्रभाव है जो उसके रोल माडल भी हैं। बच्चों की देखभाल के लिए जितनी जरूरत भौतिक सुविधाओं की है उतनी ही जरूरत उनकी भावनात्मक और विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने की भी है। इसलिए मां और पिता दोनों के लिए जरूरी है कि वे बच्चे के साथ अर्थपूर्ण और भावनात्मक रूप से जुड़ें। प्री स्कूल से लेकर कालेज तक मेरे पति ने बेटी की प्रगति से संबंधित हर बैठकों और सत्रों में हिस्सा लिया। मेरे पति के अलावा केवल एक और पुरुष जो कि किसी बच्चे के नानाजी थे और जिनकी बेटी और दामाद खाड़ी देश में काम करते थे, स्कूल की बैठकों में अन्य मांओं के साथ मौजूद होते थे।

                मेरी बेटी का जन्म 1984 में हुआ था और 1985 से लेकर 1993 तक मुझे देश और देश के बाहर अत्यधिक जाना पड़ता था। 1992 से 1993 के बीच दस महीनों के लिए अपने पोस्ट डाक्टरल कार्य के दौरान मुझे लंदन में रहना पड़ा। मेरे पति अमर ने मेरी बेटी को संभालने में सबसे अहम भूमिका निभाई जब वो शिशु थी या जब वो स्कूल जाने लगी या जब कभी वो बीमार पड़ी। एक बार भी हमारे दिमाग में बेटी को हास्टल में रखने का विचार नहीं आया।

बदलती सच्चाई

परंपरागत रूप से पिताओं को परिवार में फैसले लेने और अनुशासन कायम करने वाला माना जाता है। यदि पिता उग्र स्वभाव वाले हैं तो बहुधा उनके बच्चे विद्रोही बन जाते हैं। ऐसे में भारतीय पिताओं के लिए यह चुनौती है कि वे परिवार में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाएं और ऐसा करने के लिए उन्हें न केवल बच्चों की रोज की जरूरतों को पूरा करना होगा बल्कि प्यार, सुरक्षा और बौद्धिक तथा मनोवैज्ञानिक जुड़ाव के द्वारा उनकी जिंदगी से संबद्ध भी होना होगा। जब एक बच्चा पिता को तानाशाह के रूप में देखना छोड़ देता है तो वह परिवार में दोस्तीपूर्ण संबंधों की ओर बढ़ता है और बच्चों के साथ बातचीत का माहौल बनता है।

                आज के दौर में बहुत कम ही ऐसे पिता हैं जो परिवार के अकेले कमाने वाले व्यक्ति हैं। पिता और मां दोनों की भूमिकाएं बढ़ रही हैं, काम और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखना कई नौकरीपेशा अभिभावकों के लिए चुनौती बना हुआ है, परिवारों का आकार छोटा हो गया है और संयुक्त परिवारों का विखंडन हो गया है। यहां तक कि तलाकशुदा दंपतियों में भी पिताओं को अपने बच्चों से मिलने का अधिकार दिया जाने लगा है। पूरी दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में मैं ऐसे सैकड़ों दंपतियों से मिल चुकी हूं जहां बच्चों की देखभाल के लिए पिताओं ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी है। पहले के समय में ऐसे पिताओं को ‘नामर्द’ और ‘जोरू का गुलाम’कहा जाता था। ऐसे पुरुषों को हतोत्साहित किया जाता था और उन्हें सबसे अलग बताकर सामाजिक कार्यक्रमों में भी हाशिये पर रखा जाता था। लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले पिताओं की संख्या काफी बढ़ी है और इस कार्य के लिए उनकी इज्जत भी की जाती है।

                बच्चों के संपूर्ण विकास में पिताओं की भूमिका पर होने वाली सार्वजनिक बहसों के कारण मेट्रो शहरों के  पुरुषों की सोच में बदलाव आया है। कूल, स्मार्ट, आकर्षक और स्टाइलिश लोगों को अब बच्चों की नैपी बदलने, उन्हें लोरी सुनाने, उनका होमवर्क कराने और उन्हें पार्क ले जाने में न कोई झिझक है और न समस्या। आज के पिता कहते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ कम से कम उतना समय जरूर बिताना चाहते हैं जितना उनके पिता ने उनके साथ बिताया था। ज्यादा से ज्यादा पिता घरों में अपने बच्चों के साथ रहकर उनकी देखभाल कर रहे हैं।

                हमें नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा के गांव से आने वाली कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना देखा था और उनका वह स्वप्न उनके पिता के लगातार सहयोग और प्रोत्साहन के कारण ही पूरा हो सका था। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बाल्यावस्था में बच्चों के साथ पिता के भावनात्मक जुड़ाव का गहरा असर बच्चों के बाद के विकास पर पड़ता है। परिवार में पिता के सकारात्मक और गहरे जुड़ाव के लिए बच्चों के साथ अर्थपूर्ण संवाद का होना जरूरी है।

पेरेंटिंग पर राज्यों की नीतियां

राज्यों के लिए यह जरूरी है कि वे बच्चों की देखभाल में पिताओं की भूमिका को बढ़ाने के बारे में सोचें और यह स्वीकार करें कि बच्चे के जन्म के बाद पुरुषों को पितृत्व अवकाश न मिलने से महिलाओं को फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो मां को मातृत्व अवकाश दिया जाता है जबकि पिता को कोई अवकाश नहीं दिया जाता है। इसके पीछे की मंशा साफ है कि मां को बच्चे की देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए उसे घर पर ही रहना चाहिए जबकि पिता के पास कोई विकल्प नहीं होता। वो अपने बच्चे के लिए बमुश्किल समय निकाल पाता है। ये परिस्थितियां महिलाओं को काम से दूर ले जाती हैं या एक कर्मचारी के रूप में उनके एकीकरण को मुश्किल बना देती हैं। काम के घंटों में लचीलापन, दफ्तर से टेलीकम्यूनिकेशन की सुविधा और कार्यालय में महिलाओं और पुरुषों दोनों के बच्चों के लिए क्रेश की सुविधा तथा पार्ट टाइम काम करने का विकल्प पिताओं को भी बच्चों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यह कहना कि राज्यों को पितृत्व अवकाश के बदले में राशि का भुगतान करना चाहिए, दर्शाता है माता-पिता खुद अपने बच्चे का अहित कर रहे हैं। शिशु केंद्रित मॉडल कहता है कि बच्चे को धरती पर लाने का फैसला मां और पिता दोनों का होता है इसलिए उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी भी दोनों की समान रूप से बनती है। ऐसे में बच्चे के बदले में भुगतान करने की  मानसिकता बच्चे के हित के विरुद्ध है।

श्रम बाजार में लिंग के आधार पर पारिश्रमिक में भेदभाव

श्रम बाजार पारिश्रमिक और प्रोन्नति के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव करता रहा है। महिला श्रमिक पुरुषों की तुलना में हमेशा कम पारिश्रमिक पाती हैं। ऐसी स्थिति में जब बच्चे का जन्म होता है तो परिवार मां और पिता दोनों के योगदान की तुलना करता है और पाता है कि यदि मां बच्चे की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती है तो नुकसान पुरुष के नौकरी छोड़ने की बनिस्बत कम होगा।   इन बाधाओं से पार पाने के लिए कुछ देशों ने अपने यहां परिवारों के लिए प्रोत्साहन के तरीके अपनाए हैं। चिली, इटली और पुर्तगाल में पितृत्व अवकाश अनिवार्य हैं। स्कैंन्डिनेवियाई देशों में पिताओं को घर पर रहने की छूट दिया जाना दिलचस्प है। स्वीडन ने भी जेंडर को लेकर निष्पक्ष रवैया अपनाया है और उन दंपतियों के लिए बोनस की व्यवस्था की है जो छुट्टियां समान रूप से साझा करते हैं। स्वीडिश पिता अब कुल पेंरेंटल लीव का पांचवां हिस्सा लेते हैं जो कि साझा छुट्टियां घोषित करने के समय करीब शून्य था। नार्वे में जहां पिताओं के लिए कई छुट्टियां तय हैं,  दस में से सात पिता अब पांच से ज्यादा सप्ताह की छुट्टियां लेते हैं। जर्मनी ने भी समान पद्धति अपनाई और पाया कि परिवार के लिए छुट्टी लेने वाले पिताओं की संख्या 2006 के 3 फीसद के मुकाबले 2013 में 32 फीसद तक बढ़ गई है। पोलैंड साझा अवकाश को छोड़कर जेंडर कोटा आधारित छुट्टियों को अपना चुका है। फ्रांस उन पति-पत्नियों को बोनस देता है जो बच्चों की जिम्मेदारी को आपस में बांटकर काम करते हैं।

निष्कर्ष

मर्दों को पैसे कमाने वाला और औरतों को बच्चे संभालने वाली मानकर दिया जाने वाला परंपरागत मातृत्व अवकाश न केवल लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता है बल्कि यह व्यवस्था पिताओं के साथ भी अन्याय करती है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने और उनके विकास में अपना सकारात्मक योगदान देने तथा उनके साथ अच्छा समय बिताने का मौका नहीं दिया जाता है। बच्चों को संभालने का साझा मौका दिये जाने से महिलाओं का पेशागत भविष्य संवरता है, बच्चों का अच्छा विकास होता है और बहुत हद तक पिता को भी जीवन में अधिक संतुष्टि मिलती है। मीडिया को भी घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले और खाना बनाने, सफाई करने व अन्य कार्य करने वाले पिताओं की सकारात्मक छवि पेश करनी चाहिए।

डा0 विभुति पटेल का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।