पेरेंटिंग और कार्य भूमिका एक पिता की – विभुति पटेल:

पेरेंटिंग और कार्य

भूमिका एक पिता की

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जब मेरी बेटी का जन्म हुआ तो मुझे और मेरे पति के लिए सबसे जरूरी था अपनी व्यस्त जिंदगी को संतुलित बनाना और इसके लिए हमें आपसी बातचीत के जरिये ढेर सारी योजनाएं बनानी थीं क्योंकि हम दोनों के कार्य क्षेत्र चुनौतियों और सामाजिक दायित्वों से परिपूर्ण थे। हमने फैसला किया कि यदि एक फुल टाइम नौकरी करे और दूसरा फ्रीलांस करे तो मां और बाप में से एक व्यक्ति बच्चे को अपना पूरा समय दे पाएगा। मेरी बेटी का व्यक्तित्व, उसके मूल्य, बौद्धिक सक्रियताएं और उसके पेशागत आचार-विचार, इन सबके पीछे उसके पिता का प्रभाव है जो उसके रोल माडल भी हैं। बच्चों की देखभाल के लिए जितनी जरूरत भौतिक सुविधाओं की है उतनी ही जरूरत उनकी भावनात्मक और विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने की भी है। इसलिए मां और पिता दोनों के लिए जरूरी है कि वे बच्चे के साथ अर्थपूर्ण और भावनात्मक रूप से जुड़ें। प्री स्कूल से लेकर कालेज तक मेरे पति ने बेटी की प्रगति से संबंधित हर बैठकों और सत्रों में हिस्सा लिया। मेरे पति के अलावा केवल एक और पुरुष जो कि किसी बच्चे के नानाजी थे और जिनकी बेटी और दामाद खाड़ी देश में काम करते थे, स्कूल की बैठकों में अन्य मांओं के साथ मौजूद होते थे।

                मेरी बेटी का जन्म 1984 में हुआ था और 1985 से लेकर 1993 तक मुझे देश और देश के बाहर अत्यधिक जाना पड़ता था। 1992 से 1993 के बीच दस महीनों के लिए अपने पोस्ट डाक्टरल कार्य के दौरान मुझे लंदन में रहना पड़ा। मेरे पति अमर ने मेरी बेटी को संभालने में सबसे अहम भूमिका निभाई जब वो शिशु थी या जब वो स्कूल जाने लगी या जब कभी वो बीमार पड़ी। एक बार भी हमारे दिमाग में बेटी को हास्टल में रखने का विचार नहीं आया।

बदलती सच्चाई

परंपरागत रूप से पिताओं को परिवार में फैसले लेने और अनुशासन कायम करने वाला माना जाता है। यदि पिता उग्र स्वभाव वाले हैं तो बहुधा उनके बच्चे विद्रोही बन जाते हैं। ऐसे में भारतीय पिताओं के लिए यह चुनौती है कि वे परिवार में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाएं और ऐसा करने के लिए उन्हें न केवल बच्चों की रोज की जरूरतों को पूरा करना होगा बल्कि प्यार, सुरक्षा और बौद्धिक तथा मनोवैज्ञानिक जुड़ाव के द्वारा उनकी जिंदगी से संबद्ध भी होना होगा। जब एक बच्चा पिता को तानाशाह के रूप में देखना छोड़ देता है तो वह परिवार में दोस्तीपूर्ण संबंधों की ओर बढ़ता है और बच्चों के साथ बातचीत का माहौल बनता है।

                आज के दौर में बहुत कम ही ऐसे पिता हैं जो परिवार के अकेले कमाने वाले व्यक्ति हैं। पिता और मां दोनों की भूमिकाएं बढ़ रही हैं, काम और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखना कई नौकरीपेशा अभिभावकों के लिए चुनौती बना हुआ है, परिवारों का आकार छोटा हो गया है और संयुक्त परिवारों का विखंडन हो गया है। यहां तक कि तलाकशुदा दंपतियों में भी पिताओं को अपने बच्चों से मिलने का अधिकार दिया जाने लगा है। पूरी दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में मैं ऐसे सैकड़ों दंपतियों से मिल चुकी हूं जहां बच्चों की देखभाल के लिए पिताओं ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी है। पहले के समय में ऐसे पिताओं को ‘नामर्द’ और ‘जोरू का गुलाम’कहा जाता था। ऐसे पुरुषों को हतोत्साहित किया जाता था और उन्हें सबसे अलग बताकर सामाजिक कार्यक्रमों में भी हाशिये पर रखा जाता था। लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले पिताओं की संख्या काफी बढ़ी है और इस कार्य के लिए उनकी इज्जत भी की जाती है।

                बच्चों के संपूर्ण विकास में पिताओं की भूमिका पर होने वाली सार्वजनिक बहसों के कारण मेट्रो शहरों के  पुरुषों की सोच में बदलाव आया है। कूल, स्मार्ट, आकर्षक और स्टाइलिश लोगों को अब बच्चों की नैपी बदलने, उन्हें लोरी सुनाने, उनका होमवर्क कराने और उन्हें पार्क ले जाने में न कोई झिझक है और न समस्या। आज के पिता कहते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ कम से कम उतना समय जरूर बिताना चाहते हैं जितना उनके पिता ने उनके साथ बिताया था। ज्यादा से ज्यादा पिता घरों में अपने बच्चों के साथ रहकर उनकी देखभाल कर रहे हैं।

                हमें नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा के गांव से आने वाली कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना देखा था और उनका वह स्वप्न उनके पिता के लगातार सहयोग और प्रोत्साहन के कारण ही पूरा हो सका था। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बाल्यावस्था में बच्चों के साथ पिता के भावनात्मक जुड़ाव का गहरा असर बच्चों के बाद के विकास पर पड़ता है। परिवार में पिता के सकारात्मक और गहरे जुड़ाव के लिए बच्चों के साथ अर्थपूर्ण संवाद का होना जरूरी है।

पेरेंटिंग पर राज्यों की नीतियां

राज्यों के लिए यह जरूरी है कि वे बच्चों की देखभाल में पिताओं की भूमिका को बढ़ाने के बारे में सोचें और यह स्वीकार करें कि बच्चे के जन्म के बाद पुरुषों को पितृत्व अवकाश न मिलने से महिलाओं को फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो मां को मातृत्व अवकाश दिया जाता है जबकि पिता को कोई अवकाश नहीं दिया जाता है। इसके पीछे की मंशा साफ है कि मां को बच्चे की देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए उसे घर पर ही रहना चाहिए जबकि पिता के पास कोई विकल्प नहीं होता। वो अपने बच्चे के लिए बमुश्किल समय निकाल पाता है। ये परिस्थितियां महिलाओं को काम से दूर ले जाती हैं या एक कर्मचारी के रूप में उनके एकीकरण को मुश्किल बना देती हैं। काम के घंटों में लचीलापन, दफ्तर से टेलीकम्यूनिकेशन की सुविधा और कार्यालय में महिलाओं और पुरुषों दोनों के बच्चों के लिए क्रेश की सुविधा तथा पार्ट टाइम काम करने का विकल्प पिताओं को भी बच्चों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यह कहना कि राज्यों को पितृत्व अवकाश के बदले में राशि का भुगतान करना चाहिए, दर्शाता है माता-पिता खुद अपने बच्चे का अहित कर रहे हैं। शिशु केंद्रित मॉडल कहता है कि बच्चे को धरती पर लाने का फैसला मां और पिता दोनों का होता है इसलिए उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी भी दोनों की समान रूप से बनती है। ऐसे में बच्चे के बदले में भुगतान करने की  मानसिकता बच्चे के हित के विरुद्ध है।

श्रम बाजार में लिंग के आधार पर पारिश्रमिक में भेदभाव

श्रम बाजार पारिश्रमिक और प्रोन्नति के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव करता रहा है। महिला श्रमिक पुरुषों की तुलना में हमेशा कम पारिश्रमिक पाती हैं। ऐसी स्थिति में जब बच्चे का जन्म होता है तो परिवार मां और पिता दोनों के योगदान की तुलना करता है और पाता है कि यदि मां बच्चे की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती है तो नुकसान पुरुष के नौकरी छोड़ने की बनिस्बत कम होगा।   इन बाधाओं से पार पाने के लिए कुछ देशों ने अपने यहां परिवारों के लिए प्रोत्साहन के तरीके अपनाए हैं। चिली, इटली और पुर्तगाल में पितृत्व अवकाश अनिवार्य हैं। स्कैंन्डिनेवियाई देशों में पिताओं को घर पर रहने की छूट दिया जाना दिलचस्प है। स्वीडन ने भी जेंडर को लेकर निष्पक्ष रवैया अपनाया है और उन दंपतियों के लिए बोनस की व्यवस्था की है जो छुट्टियां समान रूप से साझा करते हैं। स्वीडिश पिता अब कुल पेंरेंटल लीव का पांचवां हिस्सा लेते हैं जो कि साझा छुट्टियां घोषित करने के समय करीब शून्य था। नार्वे में जहां पिताओं के लिए कई छुट्टियां तय हैं,  दस में से सात पिता अब पांच से ज्यादा सप्ताह की छुट्टियां लेते हैं। जर्मनी ने भी समान पद्धति अपनाई और पाया कि परिवार के लिए छुट्टी लेने वाले पिताओं की संख्या 2006 के 3 फीसद के मुकाबले 2013 में 32 फीसद तक बढ़ गई है। पोलैंड साझा अवकाश को छोड़कर जेंडर कोटा आधारित छुट्टियों को अपना चुका है। फ्रांस उन पति-पत्नियों को बोनस देता है जो बच्चों की जिम्मेदारी को आपस में बांटकर काम करते हैं।

निष्कर्ष

मर्दों को पैसे कमाने वाला और औरतों को बच्चे संभालने वाली मानकर दिया जाने वाला परंपरागत मातृत्व अवकाश न केवल लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता है बल्कि यह व्यवस्था पिताओं के साथ भी अन्याय करती है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने और उनके विकास में अपना सकारात्मक योगदान देने तथा उनके साथ अच्छा समय बिताने का मौका नहीं दिया जाता है। बच्चों को संभालने का साझा मौका दिये जाने से महिलाओं का पेशागत भविष्य संवरता है, बच्चों का अच्छा विकास होता है और बहुत हद तक पिता को भी जीवन में अधिक संतुष्टि मिलती है। मीडिया को भी घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले और खाना बनाने, सफाई करने व अन्य कार्य करने वाले पिताओं की सकारात्मक छवि पेश करनी चाहिए।

डा0 विभुति पटेल का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।