स्कूलों की जवाबदेही बढ़ी, भरोसा घटा – पूजा अवस्थी

 

लखनउ के सबसे पुराने स्कूलों में से एक ला मार्टिनियर ब्याएज काॅलेज में कक्षा छह के छात्र विराज कालरा को लंबे बाल रखने के कारण उसके शिक्षक ने चांटा मार दिया। विराज के पिता अमीश ने स्कूल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जिसमें उनका साथ पहले से ही स्कूल को चुनौती दे रहे कुछ अन्य अभिभावकों ने भी दिया। अमीश का कहना है कि उन्होंने प्रिंसिपल के अड़ियल और बुरे बर्ताव के कारण उनके खिलाफ शिकायत की है। अमीश के मुताबिक, प्रिंसिपल ने माफी मांगने के बजाय उन्हें धमकी दी कि उनके बच्चे को स्कूल में होने वाले किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेने दिया जाएगा। प्रिंसिपल के इस रवैये से आहत अमीश ने राज्य के बाल अधिकार संरक्षण आयोग में शिकायत दर्ज कराई जिसने स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगा लेकिन स्कूल ने कोई जवाब नहीं दिया। इसी बीच गर्मी की छुट्टियां हो गईं। कई रातों तक बेचैन रहने और मामले में कोई प्रगति नहीं देखकर अमीश ने अपने बच्चे को स्कूल से हटा लेने का फैसला लिया। ये वो स्कूल है जहां अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना लखनउ और उसके बाहर के भी माता-पिता देखा करते हैं।

कालरा का मामला स्कूल और पेरेंट के बीच के बदलते रिश्तों को दर्शाता है। अब पेरेंट स्कूल के ब्रांड के नाम पर कुछ भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं बल्कि अब वे उस ग्राहक के तौर पर पेश आते हैं जो पैसा देने के बदले अच्छी सेवा पाने का हक जताते हैं। क्लीनिकल साइकोलाॅजिस्ट कृष्णा कुमार दत्त कहती हैं कि उपभोक्तावाद ने शिक्षा को भी प्रभावित किया है। अभिभावक शिक्षा के खरीदार के रूप में सामने आ रहे हैं। उनके मन में स्कूल के लिए वो सम्मान नहीं रह गया है जो पहले हुआ करता था। मीडिया भी स्कूलों की गलत छवि पेश करने का काम कर रहा है। महानगर गल्र्स स्कूल की प्राचार्या श्रुति सिंह कहती हैं कि आज के पेरेंट स्कूलों से अप्राकृतिक उम्मीदें करने लगे हैं। कोई स्कूल ये कैसे जान सकता है बच्चे ने घर में दूध पीया है या नहीं अथवा उसने घर में कितनी देर टीवी देखा है। बाल अधिकारों के प्रति पेरेंट में बढ़ती जागरूकता के कारण भी स्कूलों और अभिभावकों के रिश्तों में बदलाव आया है। इसके अलावा संयुक्त परिवारों के टूटने के बाद पेरेंट चाहते हैं कि स्कूल ही उनके लिए परिवार के सदस्यों का काम करे।

हालांकि इन सब बदलावों को नकारात्मक नहीं कहा जा सकता है। जैसा कि एक सर्वे ‘प्राइवेट स्कूलिंग इन इंडिया: ए न्यू एजुकेशनल लैंडस्केप, 2008-इंडिया ह्यूमेन डेवलपमेंट सर्वे’ में भी कहा गया है कि मिडिल क्लास गैर सरकारी स्कूलों पर पेरेंट की बढ़ती निर्भरता ने स्कूल और शिक्षकों की  जवाबदेही को बढ़ाया है और इससे स्कूलों में माहौल बदला है। कुछ हद तक यही स्थिति सरकारी स्कूलों में भी है जहां अभिभावक अपना विरोध दिखाने लगे हैं। जैसा कि जुलाई, 2015 को हुआ जब लखनउ के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में मिड डे मील का दूध पीने के बाद 50 बच्चे बीमार पड़ गये तो नाराज अभिभावकों ने स्कूल में तोड़-फोड़ मचा दी थी।

शहर के कई स्कूलों में काउंसिलर का काम कर चुकीं शामा एन बताती हैं कि बच्चों की सुरक्षा के प्रति अतिचिंतित अभिभावकों की ओर से शिकायतों का आना बढ़ गया है। चूंकि वे खुद अपने बच्चों के साथ काफी कम समय व्यतीत करते हैं इसलिए बच्चे में थोड़ा सा बदलाव देखने पर भी चिंतित और अतिप्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। शोमा कहती हैं कि बच्चे भी जोड़-तोड़ करने में माहिर होते हैं। वे जानते हैं कि क्या करना है जिससे माता-पिता की ‘ना’ ‘हां’ में बदल जाएगी और वे ऐसा ही बर्ताव करने लगते हैं। यहां पर मां-बाप को समझना होगा कि बच्चे की ‘सीमा’ कहां तक है और उसे पार करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। वे बताती हैं कि एक बार एक हाइपरएक्टिव बच्चे का मामला उनके सामने आया जब बच्चे के मां-बाप ने शिकायत की कि उनके बच्चे का रिजल्ट लगातार खराब होता जा रहा है। शिक्षकों ने बताया कि उनका बच्चा क्लास में बुरा बर्ताव करता है। शोमा कहती हैं कि मामले की तह तक जाने के बाद उन्हें पता लगा कि बच्चे की मां घर में एक आज्ञाकारी मां की तरह पेश आती हैं जो बच्चे को उन्हें मारने तक की इजाजत दे सकती है। घर में ऐसा माहौल पाने वाला बच्चा अपने बर्ताव को सामान्य मानने लगता है और समझता है कि ऐसा व्यवहार घर से बाहर भी किया जा सकता है। वे कहती हैं कि ऐसे मामलों को बेहद संजीदगी से सुलझाने की जरूरत है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि स्कूल और पेरेंट्स के बीच विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। इसे सुधारने में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह लगातार प्रयास कर रही हैं। इसके लिए पब्लिक स्कूलों को ज्यादा जिम्मेदार और पारदर्शी बनाया जा रहा है। उन्हें अपनी फीस संरचना को सार्वजनिक करने, आठवीं तक के बच्चों को फेल नहीं करने तथा शारीरिक दंड बंद करने को कहा गया है। कालरा मामले में वे कहती हैं कि बड़े घरों के बच्चे जो बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं, अक्सर हमारे सुझावों को मानने से इंकार कर देते हैं। कालरा मामले में हम दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का समान मौका देना चाहते थे लेकिन स्कूल ने अपना पक्ष नहीं रखा।

प्राइवेट स्कूल अपनी फीस और छिपे हुए खर्चों को लेकर हमेशा विवादों में रहते हैं लेकिन फिर भी पेरेंट अपने बच्चों को उसी में पढ़ाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से अधिक स्कूल के बड़े नाम और सुविधाओं से मतलब होता है। 2011 में विप्रो और एजुकेशनल इनीशिएटिव द्वारा किये गये ‘क्वालिटी एजुकेशन स्टडी’ में पाया गया कि देश के 89 बड़े स्कूलों के बच्चे स्कूल की अपनी पढ़ाई पर भरोसा रखते हैं लेकिन उनमें नागरिक जिम्मेदारी, विविधताओं अथवा लैंगिक समानता जैसे विषयों पर बेहद कम संवेदनशीलता है। लखनउ के मिलेनियम स्कूल की प्रिंसिपल मंजुला गोस्वामी इस बात से इंकार करती हैं कि आज के दौर में पेरेंट को धमका कर बेवकूफ बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि जो मां-बाप केवल स्कूल का नाम देखकर बच्चे का दाखिला करवाते हैं और बदले में परेशानी ही पाते हैं उन्हें एक बार अपने फैसले पर सोचना चाहिए। पेशे से पत्रकार कुलसुम ताल्हा एक सिंगल मदर थीं और उन्होंने अपने बेटे का दाखिला शहर के एक अन्य प्रतिष्ठित स्कूल सेंट फ्रांसिस कालेज में करवाया था। वह अपने स्कूल की क्रिकेट टीम का कप्तान भी था। जब बारहवीं की परीक्षा पास आई तो स्कूल ने उनके बेटे को दो अन्य छात्रों के साथ परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी क्योंकि उनकी हाजिरी 60 फीसद से कम थी। प्रैक्टिकल परीक्षा के महज तीन दिन पहले उसे इस बारे में बताया गया। कुलसुम ने तुरंत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली और बेटे को परीक्षा देने की अनुमति मिल गई। स्कूल ने इस फैसले को चुनौती दी जिसके बाद लखनउ पीठ ने फैसले को बहाल रखा तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। वहां भी कुलसुम को जीत मिली। उनकी अपील पर क्लास की हाजिरी रजिस्टर को अदालत में लाया गया जिसमें पाया गया कि उनके बेटे को केवल उन्हीं दिनों में अनुपस्थित दिखाया गया था जब वो स्कूल की तरफ से क्रिकेट खेल रहा था! कोर्ट के फैसले से बौखलाए स्कूल ने बच्चे का रिजल्ट रोककर रखा ताकि वो किसी कालेज में दाखिला न ले सके। अंतत: कुलसुम को भारी फीस देकर मैनेजमेंट कोटे से बेटे का दाखिला पुणे के एक कालेज में करवाना पड़ा। कुलसुम ने बताया कि पूरी घटना से उन्हें मानसिक तनाव झेलना पड़ा, काम छोड़ना पड़ा और उनके बेटे का आत्मविश्वास टूट गया। वे पूछती हैं कि आखिर स्कूल की निगरानी कौन करेगा कि बच्चे वहां क्या कर रहे हैं। जब परीक्षा में छात्रों के बैठने या न बैठने का फैसला चार दिन पहले होता है तो फिर परीक्षा की फीस छह महीने पहले ही क्यों ले ली जाती है।

एक दूसरा मामला लेते हैं। नलिनी शरद शहर के मशहूर सिटी मोंटेसरी स्कूल की प्रिंसिपल रह चुकी हैं। 2011 में उनके कार्यकाल के दौरान 9वीं कक्षा के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। छात्र के अभिभावकों ने आरोप लगाया कि उनके बेटे को प्रिंसिपल ने डांटा और उसे अपनी पैंट उतारने के लिए मजबूर किया जिससे आहत होकर उसने आत्महत्या कर ली। अभिभावकों ने नलिनी के खिलाफ मामला दर्ज कराया और जो आज तक कोर्ट में है जबकि नलिनी रिटायर हो चुकी हैं। हालांकि पुलिस की जांच में उन्हें क्लीन चिट दी जा चुकी है लेकिन कोर्ट ने उस रिपोर्ट को मानने से इंकार कर दिया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में भी यह बताया गया कि रिजल्ट खराब होने की वजह से बच्चा तनाव में था और पिता की डांट से बचने के लिए उसने जान दे दी।   इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन आॅफ इंडिया के उपाध्यक्ष मधुसूदन दीक्षित स्कूल और गार्जियन के बीच बढ़ती संवादहीनता की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि फेडरेशन इस दूरी को कम करने की भरसक कोशिश कर रहा है। हालांकि इसमें उन्हें स्कूल और पेरेंट दोनों की तरफ से पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती है। वे कहते हैं कि स्कूल हमारे पास तभी आते हैं जब वे सरकार या किसी विभाग की ओर से परेशानी झेलते हैं जैसे कि पानी या बिजली जैसी समस्या तो दूसरी ओर अभिभावक स्कूलों में होने वाली बैठकों में भाग नहीं लेते लेकिन जैसे ही उनका बच्चा किसी मुसीबत में फंसता है तो वे हम पर दखल देने का दवाब डालने लगते हैं। शिक्षकों को केवल उनकी तनख्वाह से मतलब होता है। ये मानसिकता उनके बीच संवाद करने की संभावनाओं को खत्म कर देती है।