सृजन सौ मील समुदायों का – पद्मश्री इला आर. भट्ट

imagesगांधी जी स्वराज की बात करते थे। आर्थिक विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त जो स्थानीय नियंत्रण और स्थानीय रोजगार वाले क्षेत्रों में लागू होता था। आज भविष्य के बारे में बात करती हूं तो मुझे भी लगता है कि आम आदमी को स्थानीयता की जरूरत है। इसलिए यहां मैं अपने 100 मील के सिद्धांत के बारे में बताना चाहती हूं जिसकी जड़ें भोजन की पारिस्थिकी में से निकली हैं और जिनका आज बुरी तरह अतिक्रमण किया जा रहा है।

100 मील का सिद्धांत

मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि हमारी छह सबसे मूलभूत जरूरतें हमारे पास सौ मील के दायरे में मौजूद स़्त्रोतों से पूरी की जा सकती हैं। ये मूलभूत जरूरते हैं भोजन, आश्रय, वस्त्र, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और प्राथमिक बैंकिंग। सौ मील का यह सिद्धांत स्थानीयता, आकार और आजीविका को दायरे में लाते हुए विकेन्द्रीकरण का ताना-बाना बुनता है। आजीविका के लिए पदार्थ, उर्जा और ज्ञान के तौर पर जिन चीजों की जरूरत होती है वे सब हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। बीज, मिट्टी और पानी के रूप में ज्ञान हमारे बिल्कुल पास है और उन्हें पहचानने की जरूरत है। इसी तरह सुरक्षा भी स्थानीय खोजों से ही मिलती है न कि कहीं दूर से हमारे पास पहुंचती है। जरूरत है तो हमें उस दुनिया से बाहर निकलने की जो लोगों को वो खाने से रोकती है जो वे उपजाते हैं और वो उपजाने से रोकती है जो वे खाना चाहते हैं। इस वजह से उनका अपने उत्पादों और अपनी खुराक पर से नियंत्रण खो चुका है और वे एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा बन गए हैं जहां नतीजे दूर बैठे लोगों द्वारा तय किये जाते हैं और जिनकी इसमें न तो कोई रुचि होती है और न ही नियंत्रण।

        हमारा अगला बिंदु जुड़ा है समग्र कार्य से। हमने देखा है कि कई समाजों में जहां कामों को समुदायिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, खासकर महिलाओं के मामले में तो वे अधिक संतोषजनक और रचनात्मक रूप में सामने आते हैं। विकेन्द्रीकृत उत्पादन से समुदायों को अपने उत्पादों और उसके इस्तेमाल पर ज्यादा नियंत्रण प्राप्त होता है। इसका मतलब ये हो सकता है कि उत्पादन प्रक्रिया का एक हिस्सा केवल अपने इस्तेमाल या फिर लेन-देन के लिए रहे। हमने देखा है कि उत्पादन से जुड़े स्थानीय संगठन वहां की संस्कृति से ज्यादा अच्छी तरह से जुड़ पाते हैं और इस तरह वे विकास के लिए सतत् और समग्र दृष्टिकोण अपना पाते हैं। इसके अलावे स्थानीय उत्पादन और वितरण से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका भी ज्यादा मजबूत हो जाती है।

        महिलाओं के ज्यादातर काम अवैतनिक होते हैं और उनका महत्व परिवार के लिए होता है। इसके साथ-साथ सामुदायिक कार्य जैसे सामाजिक संबंधों को बनाए रखने का काम भी उनके ही जिम्मे होता है। ऐसे में आर्थिक विकेन्द्रीकरण दो तरह से महिलाओं के लिए लाभप्रद हो सकता है। पहला, यह स्थानीय श्रम और बाजार को मजबूती देगा और महिलाओं के लिए स्थानीय बाजारों तक पहुंच को आसान बनाएगा। दूसरा, यह अवैतनिक कामों का महत्व बढ़ाएगा और उन सभी सामुदायिक और सेवा आधारित कामों को तरजीह देगा जो समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।

        यहां दी गई दलीलों का यह मतलब कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि स्थानीय समुदायों को वृहद समाज से अलग कर देना चाहिए। बल्कि इसके विपरीत स्थानीय समुदायों को तो वृहद बाजारों से और ज्यादा जोडे़ जाने की जरूरत है ताकि उत्पादों का वितरण बढ़े और सेवाओं व दक्षता को और अधिक मजबूती मिल सके। यहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं उनका तात्पर्य उत्पादन और निवेश की संरचनाओं में मौजूद असमानता का प्रतिकार करना है जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को क्रमशः निम्नस्तरीय बल्कि नग्न बनाते जा रहे हैं।

‘सेवा को-आपरेटिव बैंक’स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच गतिशीलता को बनाए रखने का अच्छा उदाहरण है। गरीब महिलाओं का अपनी पूंजी पर अधिकार होता है लेकिन वे इसका इस्तेमाल रोजगार जनक वितरण व लाभांश के लिए करती हैं और इस तरह वृहद बाजारों तक अपनी पहुंच को आसान बनाती हैं। वहीं दूसरी ओर, ^सेवा बैंक’रिजर्व बैंक की वित्तीय और नियामक प्रणालियों के माध्यम से देश के अन्य बड़े बैंकों से भी जुड़ा है और उनके साथ वित्तीय व बैंकिंग लेन-देन करता है।

पिछले कुछ वर्षों में जहां आर्थिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में काम बेहद धीमी गति से हुआ है तो वहीं राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के लिए हड़बड़ी दिखाई गई। उदाहरण के लिए, 1992 के संविधान संशोधन द्वारा गांव और नगर स्तर पर चुने गये स्थानीय निकायों को ज्यादा शक्ति देने की बात की गई थी। इसमें कहा गया था कि संविधान को पंचायती राजतंत्र को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में क्या हुआ! स्थानीय और ग्रामीण निकाय राज्य सरकारों की इच्छा से भंग किये जाने लगे और चुनाव तो दशकों तक नहीं कराये गये। ग्रामीण निकायों के पास अपने कामों को पूरा करने के लिए बेहद सीमित मात्रा में फंड थे तो स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आधारभूत विकास कार्यक्रमों पर या तो नौकरशाहों या फिर राज्य सरकार का नियंत्रण था। इसे कहीं से भी राजनीतिक विकेन्द्रीकरण नहीं कहा जा सकता।

        प्रशासनिक और राजनीतिक ताकतों का विकेन्द्रीकरण भारतीय लोकतंत्र के दोबारा उठ खड़े होने का प्रतीक है जो सत्ता में आम जन की सहभागिता को प्रतिस्थापित करता है। क्षेत्र विशेष के लोगों को अब मालूम है कि उनकी मूलभूत जरूरतें क्या हैं। उसे पूरा करने के लिए तुरंत क्या होना चाहिए और किस चीज के लिए इंतजार किया जा सकता है। लोगों के बीच आई इस जागरूकता से स्थानीय प्रतिभा और दक्षता को बढ़ावा मिलेगा जबकि रोजगारों का सृजन और पर्यावरण का संरक्षण भी होगा। हालांकि स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था का सक्षम होना भी जरूरी है क्योंकि बिना आर्थिक विकेन्द्रीकरण के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण होने पर केन्द्रीय संसाधनों पर निर्भरता और बढ़ती जाएगी।

        अंत में, ^सेवा’के हमारे अनुभवों ने दिखाया है कि सामुदायिक आर्थिक संगठन न केवल गरीब महिलाओं की पहुंच में होते हैं बल्कि इससे उनकी कार्यक्षमता में भी कई तरह से विस्तार होता है। पहला, महिलाओं को समाज के लिए किए गए अपने कामों को लेकर नई पहचान मिलती है। दूसरा, सामुदायिक संस्थाओं द्वारा महिलाओं को अपनी संस्था खोलने और बाजार तक सीधे पहुंचने की इजाजत दे दी जाती है जिससे उन्हें छोटे कारोबारियों और अन्य बिचैलियों के शोषण से मुक्ति मिल जाती है। तीसरा, महिलाओं को अपने संसाधनों, पूंजी और कौशल पर अधिकार मिल जाता है। जब वे ^सेवा’से जुड़ती हैं तो अपनी बचत, लाभ, आवास, पेंशन और अन्य लाभों के बारे में मिल-जुलकर फैसला लेती हैं। चैथी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि समुदाय में रहने पर महिलाएं सरकारी याजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ ले पाती हैं जो वे अकेले रहने पर नहीं ले पाती हैं। और सबसे आखिर में, साथ आने पर न केवल उनकी आवाज को बुलंदी मिलती है बल्कि बाजार में उनकी सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ जाती है।

(इला रमेश भट्ट एक गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता और ^सेल्फ इम्प्लाएड वीमेन एसोसिएशन आफ इंडिया’(सेवा) की संस्थापक हैं। वे इसके स्थापना काल 1972 से लेकर 1996 तक महासचिव रहीं। पेशे से वकील रहीं इला भट्ट ने को-आपरेटिव, माइक्रो फाइनांस, अंतरराष्ट्रीय श्रम और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इन्हें 1977 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे अवार्ड और 1984 में राइट लिवलीहुड अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा इन्हें देश के सम्मानित पद्मश्री (1985) और पद्म भूषण (1986) से भी नवाजा जा चुका है।)

पद्मश्री इला आर. भट्ट का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।