सलाखों में कैद मासूमियत रुचिका निगम

 

(क्रिमिनोलाजी व क्रिमिनल जस्टिस में एम.ए.। मानवाधिकार और जेल में सुधार को लेकर काम करती रही हैं।)

 

अक्टूबर, 2013 – हरियाणा के भोंडसी जेल में अपनी मां मेहराम के साथ रहती है चार साल की मंताशा। 24 साल की मेहराम इसी साल दिसम्बर में जेल में अपने पांच साल पूरे करने वाली है। अपराध के लिए कुख्यात हरियाणा के मेवात की रहने वाली मेहराम को अपने पति की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा मिली है। हालांकि जिस व्यक्ति ने वास्तव में उसके पति की हत्या की थी वो उसी के गांव में रहने वाला एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो मेहराम को पसंद करता था। लेकिन मेहराम के ससुराल वालों ने उसका नाम भी पति की हत्या में जोड़ते हुए उसके खिलाफ गवाही दी जिसके कारण उसे सजा हो गई। अब शर्म और समाज का हवाला देते हुए ससुराल वालों ने उससे नाता तोड़ लिया है। भाग्य से मेहराम के मां-बाप ने उससे रिश्ता कायम रखा और उससे मिलने आते रहे। मायके वालों के रूप में मेहराम के पास अभी भी आर्थिक मदद मौजूद है। मेहराम के साथ ही भोंडसी जेल में पच्चीस दूसरी औरतें भी हैं जो किसी न किसी अपराध की सजा काट रही हैं। उनके जिम्मे बागवानी और सफाई जैसे काम हैं।

मेहराम की मां बेगम फातिमा अली जेल में अक्सर अपनी बेटी और नातिन से मिलने जाती रहती हैं। वे उन दोनों को आश्वस्त करती हैं कि उनके पास आश्रय और धन मौजूद है। जेल जाने के थोड़े समय के बाद ही मेहराम ने मंताशा को जन्म दिया था यानी मंताशा ने अब तक जेल के बाहर की दुनिया नहीं देखी है। उसका खाना, पीना और सोना सबकुछ जेल की दीवारों के भीतर ही हो पाता है। रोज सुबह साढ़े पांच बजे से मंताशा अपनी मां के आगे-पीछे जेल के कम्पाउंड में घूमना शुरू कर देती है जब तक कि मेहराम को उस दिन का काम नहीं दे दिया जाता। साढ़े 8 बजे मां-बेटी को जेल की ओर से दूध और कुछ पावरोटी दिया जाता है जिसमें दोनों को अपना पेट भरना पड़ता है। इसके तुरंत बाद मंताशा को जेल में बंद अन्य बच्चों के साथ नहाने के लिए कामन रूम में भेज दिया जाता है जहां नन्ही मंताशा खुद से नहाकर अपने छोटे-छोटे कपड़े भी खुद ही साफ करती है और फिर खुद ही कपड़े पहन कर तैयार भी हो जाती है। ध्यान देने की बात ये है कि जेल में बंद बच्चों को क्रेश में भेजना वैकल्पिक रखा गया है और उसे अनिवार्य नहीं माना गया है। ऐसे में महिला कैदियों को काउंसिलिंग के जरिये क्रेश के फायदों के बारे में समझाना बेहद जरूरी है। सुबह 9 बजे बच्चे जेल के भीतर बने क्रेश में पहुंचा दिये जाते हैं। क्रेश महिला जेल के कंपाउंड के भीतर ही बनाया गया है और बच्चों को रोज दिन का कुछ हिस्सा यहां व्यतीत करना पड़ता है। हालांकि एक साल पहले तक मंताशा के साथ यहां केवल एक और बच्ची थी और उसने कभी किसी पुरुष या लड़के को अपने आस-पास नहीं देखा था।

भारत में हर जेल का संचालन उस राज्य के नियमों के मुताबिक होता है और पूरे देश का जेल प्रशासन केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आता है। जेल में बच्चों को अपनी मांओं, और कुछ मामलों में पिता, के साथ रहने की अनुमति उनके छह साल के होने तक होती है। नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2012 के अंत तक 344 सजायाफ्ता महिलाएं और उनके 382 बच्चे तथा 1226  विचाराधीन महिलाएं एवं उनके 1397 बच्चे देश की जेलों में बंद थे। यानी देश में करीब 1800 बच्चे जेल प्रशासन के रहमोकरम पर जी रहे हैं।

माडल जेल मैन्युएल, 2003 कहता है कि हर जेल में एक अलग क्रेश और नर्सरी बनाई जानी चाहिए। हालांकि देश के ज्यादातर जेलों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है लेकिन भाग्यवश भोंडसी जेल उन कुछ जेलों में शामिल है जहां माता-पिता के साथ जेल में बंद बच्चों के संबंध में दिये गये सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों (जस्टिस अय्यर कमेटी 1986) का पालन किया जा रहा है। इस जेल में क्रेश दो कमरों से बना है जहां बच्चे खेलते और पढ़ते हैं। इसके साथ ही लगा हुआ एक मेडिकल रूम भी है जहां एक महिला डाक्टर बच्चों और महिला कैदियों की जांच करती है। एक बी.ए. पास महिला कैदी को ही क्रेश का इंचार्ज बनाया गया है जो बच्चों को पढ़ाती भी है।

 

जेल के बाद जिंदगी

 

जेल से बाहर आ जाने के बाद भी ऐसे बच्चों की जिंदगी को सामान्य बनने में काफी समय लग जाता है। उनमें असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। मंताशा का ही मामला लें तो मेहराम के परिवार वाले उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उनकी बेटी जेल से रिहा हो जाएगी क्योंकि बाहर आते ही उसका निकाह अलीम के साथ कर दिया जाएगा। अलीम भी मेवात से है और बलात्कार सहित 35 से ज्यादा मामलों में जेल में बंद है। इतना ही नहीं वह भोंडसी जेल के सबसे कुख्यात कैदियों में जाना जाता है। फिर भी कई मौकों पर मेहराम अलीम से निकाह करने की इच्छा जता चुकी है। वह एक अच्छी मां है और मंताशा को पढ़ा-लिखा कर अच्छा इंसान बनाना उसकी प्राथमिकता है फिर भी वह इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहती कि अलीम उसकी बेटी के लिए बुरा पिता साबित हो सकता है। आर्थिक और भावनात्मक मदद के लिए महिला कैदियों का इस तरह किसी के भी साथ विवाह कर लेने का चलन भारत में आम है। जेल से बाहर आने के बाद महिलाओं को उनके परिवार वाले अपनाने से इंकार कर देते हैं लेकिन अगर वो विवाह कर ले तो समाज में उसे जगह मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

 

एक चुनौतीपूर्ण प्रणाली

 

जेल में रह रहे अन्य बच्चों के मुकाबले मंताशा उन भाग्यशाली बच्चों में शामिल है जिसे सुविधायुक्त जेल में पैदा होने और रहने का मौका मिला है। उसे एक प्यार करने वाली मां और नानी मिली है तो पढ़ने और खेलने के लिए क्रेश भी मौजूद है। वह उस जेल प्रशासन पर आश्रित है जो पहले से ही कैदियों के अत्यधिक बोझ, भ्रष्टाचार, कर्मचारियों की कमी, अनट्रेंड स्टाफ और बाबूगिरी को झेल रहा है। इन सबके बीच जेल में रह रहे बच्चों पर जितना ध्यान दिये जाने की जरूरत है वो नहीं हो पाता।

संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि ‘‘कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरीके से किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत आजादी से वंचित नहीं रखा जा सकता।“ इसके अलावा अनुच्छेद 45 में ये कहा गया है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के भीतर 14 साल तक के हर बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य की है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मंताशा जैसी बच्चियां अपने इस मानवाधिकार को कैसे पा सकती हैं। ऐसी बच्चियों को देखभाल के नाम पर अपनी मांओं के साथ जेल में धकेल दिया जाता है जहां उन्हें अपनी सेहत और आजादी के साथ समझौता करना पड़ता है। जीने के कठिन हालातों के अलावा बाहरी दुनिया से दूर रहकर जेल में बंद अन्य वयस्कों के बीच उन्हें अपना हर दिन गुजारना पड़ता है। बिना किसी गलती के उन्हें भी सामाजिक बाध्यताओं और असुरक्षा से जूझना पड़ता है। वैसे इसके लिए जेलों को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता क्योंकि वे भी शक्तिहीन हैं और 1894 के जेल एक्ट से बंधे हैं।

स्वयंसेवी संस्था ‘इंडिया विजन फाउंडेशन’(आईवीएफ) जेल में अपने अभिभावकों के साथ रह रहे बच्चों को मुख्यधारा में लाने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रही है। आईवीएफ ऐसे बच्चों को उनके परिवार से मिलाने का काम करती है और करीब 19 साल से वह तिहाड़ में रह रहे सैकड़ों बच्चों को मुख्यधारा में ला चुकी है। इसने 300 से ज्यादा बच्चों को जेल के क्रेश से निकालकर बाहर के स्कूलों में दाखिला दिलवाने में मदद की है। कुछ उम्मीद 1986 में जगी जब जेलों में बंद महिलाओं की स्थिति का आकलन करने के लिए केन्द्र सरकार ने जस्टिस कृष्णा अय्यर के नेतृत्व में राष्ट्रीय विशषज्ञ कमेटी का गठन किया। कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें जेल में बंद गर्भवती महिलाओं तथा हाल ही में मां बनी महिलाओं का विशेष जिक्र किया गया।

हाल ही में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद महिलाओं और बच्चों के संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किये:

  • महिला कैदियों को अपने बच्चों को छह साल की उम्र तक अपने साथ जेल में रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • छह साल के बाद मां के परामर्श से बच्चे को उपयुक्त अभिभावक के पास रखा जाना चाहिए।
  • इस दौरान बच्चे के खाने-पीने, कपड़ों और आश्रय व दवाओं का खर्च संबद्ध राज्य सरकार उठाएगी।
  • जेल में महिला कैदियों के वार्ड के पास ही उनके बच्चों के लिए एक क्रेश और नर्सरी बनाया जाना चाहिए।
  • तीन साल तक के बच्चों को क्रेश में तथा तीन से छह साल तक के बच्चों को नर्सरी में जगह मिलनी चाहिए।
  • क्रेश और नर्सरी का संचालन जेल प्रशासन द्वारा किया जाना चाहिए।
  • जेल में रह रहे बच्चों के पोषण के लिए हैदराबाद के नेशनल इंस्टीच्यूट आॅफ न्यूट्रीशन द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन किया जाना चाहिए।
  • अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को तीन महीने के भीतर जेलों में लागू कर दिया जाना चाहिए।

यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी उपरोक्त निर्देशों का वास्तव में पालन किया जाय तो जेलों में बंद बचपन को समय से पहले ही कुम्हलाने से बचाया जा सकता है।

 

(यह आलेख इंडियाटुगेदर.काम में  ‘ए चाइल्डहुड लास्ट बिहाइंड बार्स’ के नाम से प्रकाशित आलेख का हिंदी रूपांतरण है।)