बड़े बजट में ‘छोटे’गुम – ईमंजरी

 

हर साल हमारी संसद करोड़ों-अरबों का बजट पास करती है। हर वर्ग, रोजगार, क्षेत्र और अवसरों से जुड़ी सैकड़ों योजनाएं लागू कराई जाती हैं। लेकिन क्या कभी इन बड़ी योजनाओं में उन छोटे-छोटे बच्चों को भी जगह मिलती है जो न तो अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतर सकते हैं और न ही राजनीतिक दवाब बना सकते हैं। अलबत्ता उन्हें तो अपने अधिकारों के बारे में पता तक नहीं होता। इसमें कोई शक नहीं कि बजट देश की तरक्की का आइना होते हैं और इसका मकसद संपूर्णता में देश का विकास करना होता है। लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बजट, नीतियों और योजनाओं को बनाने में बड़ा हाथ किसी न किसी ऐसे वर्ग का होता है जो सरकार के लिए वोट बैंक का काम करते हैं। महिलाएं, पिछड़ा वर्ग, किसान, कृषि श्रमिक और अन्य जाति आधारित वर्ग कहीं न कहीं सरकार के रहने या नहीं रहने को प्रभावित करते हैं और अपनी उपस्थिति से दवाब  का निर्माण करते रहते हैं। मगर बच्चे ! वे न तो वोट बैंक होते हैं और न ही दवाब समूह, फिर उनके बारे में सोचने की जहमत भला कौन उठाएगा ?

आंकड़ों में जाएं तो पाएंगे कि 90 के दशक में बच्चों पर होने वाला आवंटन 1.2 फीसद से बढ़कर 2006-07 में 4.91 फीसद तक पहुंच गया लेकिन असलियत में न केवल यह आवंटन बेहद कम है बल्कि इसे सही रूप में खर्च भी नहीं किया जाता है। जरूरत, आवंटन और इस्तेमाल में अभी भी बहुत अंतर है। ऐसे में जरूरत है सटीक ‘चाइल्ड बजटिंग’ की। यानी वह पैमाना जिससे नीति निर्धारकों को यह पता चल पाए कि बच्चों की जरूरतों के हिसाब से कितनी राशि का आवंटन किया गया है और कितने की और जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार कमेटी यानी यूएनसीआरसी का सदस्य होने के नाते भारत भी बच्चों के अधिकारों की संरक्षा को लेकर सतर्क है और इस दिशा में प्रयास चाहता है। यूएनसीआरसी कहता है कि बच्चों के अधिकारों को सर्वोच्च स्तर तक साकार करने के लिए बजट में आवंटन को बढ़ाने के हर प्रयास किये जाने चाहिए। इसके लिए उपलब्ध संसाधनों का संपूर्ण इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

भारत न केवल 1992 के बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का भागीदार है बल्कि यूएन के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल यानी एमडीजी को प्राप्त करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। इसके लिए 90 के दशक से लेकर अब तक की सरकारों ने बच्चों की बेहतरी और उनके हितों पर आधारित दर्जनों महत्वाकांक्षी योजनाएं भी बनाई हैं किंतु दुर्भाग्यवश उन योजनाओं में निर्धारित लक्ष्यों और प्राप्त परिणामों में मीलों का फासला है।

बजट 2016 में बच्चे

बात अगर मौजूदा हालात की करें तो निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि वर्तमान सरकार ने भी शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और पोषण जैसे अतिमहत्वपूर्ण बिंदुओं की उपेक्षा ही की है। विशेषकर उस आबादी के लिहाज से जो देश की कुल आबादी का 39 फीसद हिस्सा है। अलबत्ता वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में बच्चों का जिक्र तक नहीं किया। ये ठीक है कि पिछले वर्ष की 30 फीसद कटौती की तुलना में इस वर्ष के बजट में बच्चों की हिस्सेदारी 3.26 फीसद से बढ़कर 3.32 फीसद तक पहुंच गई है। लेकिन महज .6 फीसद की इस बढ़ोतरी से बच्चों का कितना भला होने वाला है, यह देखना होगा।

बच्चों के संपूर्ण विकास से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना आईसीडीएस यानी इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम में 2016 के बजट में 7 फीसद तक की कमी की गई है। इस बेहद जरूरी योजना में कटौती से संबंधित क्षेत्र हतप्रभ है। इसी तरह बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों में बंपर कटौती करते हुए उसे पिछले साल के 15,483.77 करोड़ से घटाकर 14,000 करोड़ कर दिया गया है। मीड डे मील स्कीम में पिछले वर्ष की तुलना में आवंटन 0.49 फीसद    से बढ़ाकर 0.74 फीसद कर दिया है जिसके बाद अब यह 9,700 करोड़ हो जाता है। बजट की घोषणा से ठीक पहले होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि देश की आबादी का सही इस्तेमाल करना है तो बच्चों के पोषण से जुड़े कार्यक्रमों में निवेश को बढ़ाना होगा लेकिन आईसीडीएस में कटौती कर सरकार ने अपने मंसूबे साफ कर दिये। यही हाल बाल सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का भी रहा। 2015 में जेजे एक्ट के लागू होने के बाद से जहां इस सेक्टर में अधिक निवेश की उम्मीद जताई जा रही थी वहीं सरकार ने 2016 के बजट में इसके मुख्य कार्यक्रम आईसीपीएस में आवंटन को 2015 के 402.23 करोड़ से घटाकर 397 करोड़ पर ला दिया। सर्वशिक्षा अभियान में 2.2 फीसद की वृद्धि की गई है और इसे पिछले वर्ष के 22,000 करोड़ से बढ़ाकर 22,500 करोड़ कर दिया गया है। हालांकि यह राशि अभी भी 2014 के 27,758 करोड़ से कहीं कम है।

बच्चों के लिए नीतियां

देश में पहले-पहल 1974 में बच्चों के अधिकारों और उनकी जरूरतों की ओर नीति निर्माताओं का ध्यान गया और एक राष्ट्रीय नीति का निर्माण किया। हाल ही में 2013 में बच्चों के लिए नई राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई जिसमें धर्म, प्रथा, संस्कृति तथा रिवाजों को परे रखते हुए देश के हर बच्चे के सम्मान, सुरक्षा और आजादी को बनाये रखने तथा उन्हें समान अधिकार और अवसर प्रदान करने के लिए जरूरी कदम उठाये जाने की प्रतिबद्धता दिखाई गई है।

नई राष्ट्रीय नीति कहती है कि

  • 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बालक कहा जाएगा।
  • बालपन जीवन का अभिन्न अंग है और इसका अपना महत्व है।
  • बच्चे किसी आम समूह का हिस्सा नहीं हैं बल्कि इनकी अपनी अलग जरूरत हैं जिनकी अलग प्रकार से पूर्ति की जा सकती है। खासकर भिन्न परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की आवश्यकताएं भिन्न होती हैं।
  • बच्चों के संपूर्ण विकास और संरक्षा के लिए दीर्घकालिक, स्थायी, एकीकृत और विशिष्ट प्रयास करने की जरूरत है।

1974 से लेकर अब तक सरकारों ने बच्चों के विकास, उनकी उत्तरजीविता और सुरक्षा से जुड़ी कई अन्य योजनाओं और नीतियों को भी लागू किया है।

बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति, 1974 : पहली बार नीतिगत रूप से बच्चों को देश के लिए संपत्ति माना गया। इसके तहत संविधान में प्रदत्त बाल अधिकारों और उनसे जुड़े प्रावधानों को लागू करने का लक्ष्य रखा गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की अधिकारों की घोषणा को भी लागू किया गया। इस नीति ने राज्यों के दायित्वों की रूप-रेखा तैयार कर दी जिसके मुताबिक बच्चे के जन्म से पहले से लेकर जन्म के बाद तक तथा बालपन के दौरान उसकी तमाम मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक विकास की जिम्मेदारी राज्यों की होगी।

शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति, 1986: इस वर्ष को सभी को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने तथा भेदभाव को समाप्त करने के लक्ष्य के साथ मनाया गया। महिलाओं, अनुसूचित जाति तथा जनजातियों को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्रीय नीति बनाई गई जिसके तहत छात्रवृत्ति, वयस्क शिक्षा, शिक्षकों की नियुक्ति, गरीब परिवारों के लिए अनुदान ताकि वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें और नई शिक्षा संस्थानों के निर्माण आदि की व्यवस्था की गई। बच्चों को केन्द्र में रखकर बनाई गई नीति के दौरान ‘आॅपरेशन ब्लैकबोर्ड’ भी चलाया गया जिसका उद्देश्य प्राथमिक स्कूलों में उपस्थिति को बढ़ाना था।

बाल श्रम को लेकर राष्ट्रीय नीति, 1987: देश में बड़ी संख्या में बाल श्रमिकों के होने की रिपोर्ट आने के बाद चिंतित सरकार ने 1987 में बाल श्रमिकों पर आधारित राष्ट्रीय नीति को लागू किया। यह नीति उन इलाकों में बच्चों के कल्याण को लेकर कटिबद्ध थी जहां बाल श्रमिकों की संख्या अधिक थी। इसके तहत बच्चों के हित में कार्ययोजना बनाने और उन्हें लागू करने पर जोर दिया गया।

राष्ट्रीय पोषण नीति, 1993: भारत लंबे अरसे से बच्चों में कुपोषण की समस्या को झेल रहा है। असल में कुपोषण भोजन, उत्तरजीविता और स्वास्थ्य के अधिकारों तक बच्चों की पहुंच न होने से उत्पन्न हुई समस्या है जो देश को दक्षता और कार्यक्षमता से जुड़ी कई अन्य परेशानियों  की ओर धकेल रहा है। 1993 में बनी पोषण नीति खाद्य उत्पादन एवं वितरण, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, शिक्षा, ग्रामीण व शहरी विकास तथा महिला एवं बाल विकास के क्षेत्रों में अल्पकालिक अथवा दीर्घकालिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000: इस नीति के अंतर्गत भी बच्चों के हितों को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया। इसने 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने, सभी बच्चों को सभी बचाव योग्य रोगों से मुक्ति के लिए टीकाकरण करने, जन्म, मृत्यु तथा विवाह का सौ फीसद पंजीकरण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने का लक्ष्य सामने रखा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2002: यह नीति हर देशवासी के लिए एक निर्धारित स्तर तक अच्छे स्वास्थ्य की गारंटी देती है। इसके लिए गैरकेन्द्रीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्र्रणाली तक आम आदमी की पहुंच को आसान बनाने पर जोर दिया गया। साथ ही पहले से मौजूद आधारभूत संरचनाओं को दुरुस्त करने और नई संरचनाओं के निर्माण का भी लक्ष्य रखा गया।

बच्चों के लिए नेशनल चार्टर, 2003: बच्चों की मौलिक जरूरतों को पूरा करने में नागरिक समाज, समुदाय और परिवार की भूमिकाओं को तय करने का काम नेशनल चार्टर ने किया। इसने हर बच्चे के जीने, स्वस्थ रहने और खुश रहने के अधिकार की वकालत की। इसके लिए पिछड़े परिवारों के बच्चे, गलियों में रहने वाले और लड़कियों को टारगेट समूह में रखकर राज्यों और समुदायों की जिम्मेदारी तय की गई।

 

बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना, 2005: भारत सरकार ने वर्ष 2005 में इस कार्ययोजना को अपनाया था जिसका लक्ष्य था बच्चों के हित में और उनकी सुरक्षा के लिए हर उपाय को अपनाना। इसके तहत जिन बातों को प्राथमिकता दी गई उनमें कन्या भ्रूण हत्या को रोकना, कन्या शिशु हत्या को रोकना, बाल विवाह को समाप्त कर बच्चों को आजादी से जीने का अधिकार देना, लड़कियों को सुरक्षा देना और उनके विकास के लिए लगातार प्रयास करते रहना। इसके अलावा कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना, बच्चों के सभी वैधानिक और सामाजिक जरूरतों की रक्षा करना और उनका हर प्रकार के उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा से बचाव करना। बच्चों से जुड़ी हर बात की समीक्षा करने और उन्हें अपडेट करते रहने के लिए सरकार ने कई अन्य योजनाएं भी शुरू की हैं।

महत्वपूर्ण है राज्यों की भूमिका

यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘चाइल्ड बजटिंग इन इंडिया’ में केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच की दूरी को चाइल्ड बजटिंग के मार्ग में बड़ी बाधा माना गया है। इसमें साफ कहा गया है कि इस दिशा में राज्यों को खुद आगे आना होगा और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बजट आवंटन की अगुवाई करनी होगी। वे राशि के लिए कुछ हद तक केन्द्र पर निर्भर जरूर हैं लेकिन सामाजिक क्षेत्र के प्रावधान बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी उन्हीं की है। देखा गया है कि ज्यादातर राज्य स्वास्थ्य क्षेत्र में बच्चों पर समुचित राशि आवंटित करने में लापरवाही दिखाते हैं। न केवल वे केन्द्र द्वारा प्रदत्त राशि का इस्तेमाल करने में पीछे रहे हैं बल्कि खुद भी राशि जारी करने में आनाकानी करते रहे हैं। राज्यों के इस रवैये से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को झटका लगता है। उनका वांछित परिणाम सामने नहीं आ पाता है। उदाहरण के लिए 1993-94 में केन्द्र सरकार प्रति व्यक्ति 89 रुपये खर्च करती थी जो 2003-04 में बढ़कर 122 रुपये हो गया। लेकिन केन्द्र द्वारा हुई इस बढ़ोतरी का कोई प्रभाव राज्यों के स्वास्थ्य संबंधी खर्च पर नहीं हुआ। राज्यों ने अपने यहां के खर्च में वृद्धि नहीं की। जैसे कि वर्ष 2003-04 में बिहार में प्रति व्यक्ति खर्च 77 रुपये था तो उत्तर प्रदेश में 91 रुपये तथा राजस्थान में 98 जबकि केरल में 275, पंजाब में 294 और दिल्ली में 485 रुपये था। राज्यों में प्रति व्यक्ति खर्च में यह बड़ा अंतर उनके रवैये को साफ दर्शाता है।

इतना ही नहीं बच्चों से जुड़े जिस क्षेत्र में खर्च अधिक होना चाहिए उनमें सरकारें अपेक्षाकृत कम राशि आवंटित करती हैं जिसका खराब असर बच्चों के अधिकारों और उनके विकास पर पड़ता है। जिन राज्यों में बच्चों की संख्या ज्यादा है वहां बच्चों से जुड़ी योजनाओं पर खर्च बेहद कम देखा गया है। हालांकि इसमें राज्यों की लचर वित्तीय स्थिति एक बड़ा कारण है।  राज्य बच्चों की योजनाओं के आवंटन में कटौती कर देते हैं जिसका प्रभाव केन्द्र प्रायोजित योजनाओं पर भी पड़ता है।