बिकाउ हैं मगर टिकाउ नहीं ! – दीपिका झा

deepika jhaदुनिया भर की खबर लेने वाली पत्रकार बिरादरी कभी खुद खबर नहीं बन पाती है। उनके संगठन, उनका दोहन, शोषण, भेदभाव और कम पारिश्रमिक की खबर कभी किसी अखबार या टीवी चैनल के जरिये सामने नहीं आ पाती। जब पूरी बिरादरी का ये हाल है तो सोचिये उसके हाशिये पर मौजूद महिलाओं के साथ कैसा रवैया अपनाया जाता होगा। आम तौर पर महिलाओं से जुड़ी खबर किसी भी अखबार या टीवी चैनल के लिए सबसे बिकाउ खबर होती हैं। लेकिन विडंबना है कि खुद उन अखबारों और चैनलों में काम कर रहीं महिलाएं उनके लिए मायने नहीं रखतीं क्योंकि उन्हें टिकाउ नहीं माना जाता। सब कुछ मानने पर ही है। ये मान लिया जाता है कि अनब्याही महिलाएं ज्यादा काम कर सकती हैं। ये भी मान लिया जाता है कि शादी होते ही महिलाओं की कार्यक्षमता घट जाती है और अगर वे मां बन गईं तब तो उन्हें काम पर रखना भी बेकार है। ऐसे में अगर नौकरी से नहीं निकाल सकते तो तुरंत उनकी शिफ्टिंग फीचर डेस्क या फिर अपेक्षाकृत कम जिम्मेदारी वाले डेस्क पर कर दी जाती है। नतीजा कि बड़ी संख्या में महिलाएं या तो काम छोड़ देती हैं या पत्रकारों की गिनती में ही नहीं रह जाती हैं।

        वर्ष 2014 में मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा देश की मीडिया में महिलाओं की स्थिति जानने को लेकर कराए गए एक अध्ययन में बताया गया कि जिलों में महिला पत्रकारों की संख्या केवल 2-7 फीसद है। इतना ही नहीं देश में छह राज्य और दो केन्द्र शासित राज्य ऐसे भी हैं जहां के जिलों में एक भी महिला पत्रकार नहीं है। हालांकि आंध्र प्रदेश सबमें अच्छी स्थिति में है क्योंकि यहां जिलों में 107 महिलाएं पत्रकार हैं। सर्वे में बताया गया कि बड़े मीडिया हाउसों ने महिला पत्रकारों की तरक्की के बारे में छोटे हाउसों की तुलना में कम सोचा। बड़े और राष्ट्रीय स्तर के अखबारों और चैनलों ने महिला पत्रकारों को मान्यता दिलाने में दिलचस्पी नहीं ली। उनकी तुलना में छोटे और स्थानीय अखबारों व चैनलों ने अच्छा काम किया। इसी तरह बड़े घरानों में महिलाओं की संख्या भी छोटे अखबारों की तुलना में कम रही और जिला स्तर पर तो बेहद कम। स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाली महिलाओं की दशा तो और भी खराब है और सर्वे के मुताबिक देश में केवल दो महिला पत्रकार स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं जिनमें एक फोटोग्राफर हैं। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने देश के 28 राज्यों के 255 जिलों से सूचनाओं को एकत्रित कर सर्वे को जारी किया था।

        अखबारों में मार्केटिंग जैसे गैर पत्रकारिय विभागों को छोड़ दिया जाय तो डेस्क और रिपोर्टिंग दो सबसे महत्वपूर्ण विभाग हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बिना अखबार का काम नहीं चल सकता। करीब पंद्रह साल पहले बिहार की राजधानी पटना में लगभग सभी प्रिंट मीडिया हाउसों में महिलाएं डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों ही विभागों में अच्छी संख्या में कार्यरत थीं। पटना से छपने वाले सभी अखबार यथा, हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण और प्रभात खबर खबरों के चयन और पन्नों की ले-आउट से जुड़े लगभग सभी फैसले स्थानीय स्तर पर ही ले लिया करते थे। ऐसे में डेस्कों पर महिला पत्रकारों की बहाली भी खूब होती थी क्योंकि जरूरत ज्यादा लोगों की होती थी। धीरे-धीरे लगभग सभी हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों ने स्थानीय स्तर पर फैसले लेने बंद कर दिये और वे अपने-अपने हेडक्वार्टर से संचालित होने लगे। नतीजतन डेस्कों पर लोगों की जरूरत कम हो गई और फिर शुरू हुआ छंटनी का दौर। जाहिर है महिलाएं निशाने पर रहीं और उन्हें हटाया जाने लगा। जो न जा सकीं उनके लिए काम करने की परिस्थिति इतनी मुश्किल कर दी गई कि उन्होंने खुद ही काम छोड़ दिया। अखबारों में अमूमन दो शिफ्टों-दिन और रात- में होने वाले काम एक शिफ्ट तक ही सीमित कर दिये गये और ड्यूटी अमूमन चार बजे शाम से लेकर देर रात तक की होने लगी। इस व्यवस्था में भी सबसे जल्दी महिलाओं ने सरेंडर किया और कई पत्रकारों ने काम छोड़ दिया। महिलाएं यदि पत्रकार हैं तो वे एक मां, पत्नी और बहू भी हैं। उनके लिए हर भूमिका एक समान महत्वपूर्ण है। ऐसे में जब बात चुनाव की आती है तो सबसे पहले वे अपने करियर को दांव पर लगा देती हैं।

        एक बड़ी मुश्किल तब आई जब दिल्ली में हुए शर्मनाक निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा और उषा मेहरा कमिटी की सिफारिशों पर सरकार ने कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना के खिलाफ अधिनियम को पारित किया और हर कार्यालय में जहां महिलाएं काम कर रही हों एक शिकायत सेल का गठन अनिवार्य बना दिया। स्थिति ये हो गई कि जहां पुरुष अधिकारी सशंकित रहने लगे तो वहीं कुछ महिलाओं ने भी इसका फायदा लेना शुरू कर दिया। अखबारों में हालत ये हो गई कि महिलाओं को बहाल करने पर ही रोक लग गई। नतीजतन लगभग हर अखबार में डेस्क पर बमुश्किल एक या दो महिलाएं रह गईं। रिपोर्टिंग में महिलाओं की संख्या कुछ ज्यादा है क्योंकि वहां देर रात तक रुकने की अनिवार्यता नहीं होती।

             वर्ष 2014 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने देश में महिला पत्रकारों की स्थिति पर एक अध्ययन कराया था जिसके नतीजे काफी निराशाजनक रहे थे। अध्ययन में बताया गया कि ये सही है कि पिछले दो दशकों में देश में पत्रकारिता में आने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है फिर भी उनके काम करने की परिस्थितियां बेहद निराश करने वाली हैं। ज्यादा काम, कम पैसा और गैर बराबर मौका ये सब उनका हौसला घटाने के लिए काफी होते हैं। तिस पर भी प्रोन्नति शायद ही कभी मिलती है। स्ट्रिंगर से शुरू होने वाला उनका सफर अधिक से अधिक चीफ सब एडीटर तक जाकर रुक जाता है। इस अध्ययन में कहा गया कि महिला पत्रकारों को प्रमोशन न दिये जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण जो बताया जाता है वो है उनका नाइट शिफ्ट न कर पाना। रिपोर्ट में बताया गया कि देश में कई महिलाएं-जो कि अच्छे हाउसों में भी काम कर रही हैं- दैनिक पारिश्रमिक पर काम कर रही हैं, जिनके पास नियुक्ति पत्र तक नहीं हैं और महीने के अंत में उन्हें 1500 से 3000 रुपये तक ही मिल पाते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां दैनिक भाष्कर और नई दुनिया जैसे स्थापित मीडिया हाउस हैं, वहां एक भी महिला पत्रकार स्थायी नौकरी में नहीं है। जिनके पास दो से तीन साल का अनुबंध है वे भी खुशकिस्मत हैं क्योंकि इनकी संख्या भी बहुत कम है। ऐसे में जब छंटनी का वक्त आता है तो ये महिलाएं सबसे पहले बाहर जाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के उत्तर-पूर्व में स्थित 7 राज्यों में कुल मिलाकर मात्र 35 महिला पत्रकार हैं जिनमें से 40 फीसद को कभी प्रमोशन नहीं दिया गया जबकि केवल 35 फीसद ही फुल टाइम कर्मचारी हैं।

        औरतों के साथ अन्याय और न्याय की खबरों से भरे रहने वाले टीवी चैनलों और अखबारों के भीतर का सच ये है कि खुद वे कभी अपने यहां काम करने वाली स्त्रियों के साथ न्याय नहीं करते। बिहार की ही एक महिला पत्रकार ने बताया कि मातृत्व अवकाश पूरा करने के बाद जब वो काम पर लौटीं तो उन्हें डिमोट कर दिया गया। इसी तरह मध्य प्रदेश की एक पत्रकार को तो मातृत्व अवकाश लेने के कारण काम से हटा ही दिया गया। ज्यादातर महिलाओं ने, जो हाल ही में मां बनी थीं, बताया कि मैटरनिटी लीव लेने के बाद जब वे लौटीं तो दोबारा ज्वायन करने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। प्रबंधन ने उन्हें काम पर न लौटने देने की हर संभव कोशिश की। एक बड़े अंग्रेजी अखबार में काम करने वाली महिला ने बताया कि मां बनने से पहले तक वे बेहद जिम्मेदार थीं लेकिन जैसे वे मां बनीं उनकी विश्वसनीयता कम हो गई। जबकि सच्चाई तो ये है कि महिलाओं के मां बन जाने से उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है बल्कि वे तो और ज्यादा संवेदनशील तरीके से काम करना सीख जाती हैं। अफसोस कि अखबारों और चैनलों में काम करने वाले पुरुषों को स्त्रियों की दक्षता दिखाई नहीं देती।

दीपिका झा  का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।