तारे जम़ीं पर – दीपिका झा

 

  • देश में 50 हजार अनाथ बच्चों को आज भी किसी का इंतजार है।
  • देश में करीब 30 हजार दंपति बच्चे के लिए तरस रहे हैं।

 

दो आंकड़े, दो तस्वीरें और एक-दूसरे से पूरी होतीं दो जरूरतें। चाहिए तो सिर्फ एक पहल। अगर हर बच्चे को मां-बाप मिल जाय और हर मां-बाप को एक बच्चा तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। लेकिन अफसोस कि अपने देश में बच्चा गोद लेने की दर पहले की तुलना में काफी घट गई है। ताज्जुब है कि नई सोच की पोषक और पुरातनपंथी मान्यताओं को नकारने वाली शिक्षा और बदलाव के बाद भी न लोग बदल रहे हैं और न सरकारें।

डेढ़ साल पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी कहा था कि लोग हर साल केवल 800 से एक हजार बच्चों को ही गोद ले रहे हैं। यह शर्मनाक है। दत्तक एजेंसियों की सुस्ती पर कटाक्ष करती श्रीमती गांधी की यह टिप्पणी देश में अनाथ बच्चों के प्रति संवेदनहीनता को उजागर करती है। इससे पहले वर्ष 2013-14 में 4 हजार बच्चों को गोद लिया गया था जो उससे पहले के सालों की तुलना में बहुत कम था। यानी देश में बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। ये स्थिति तब है जब सरकार ने दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किये हैं और उसे जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014 के साथ जोड़ दिया है। इसके अलावा अगस्त, 2015 में ‘चाइल्ड एडाप्शन रिसोर्स इंफार्मेशन एंड गाइडेंस सिस्टम’ यानी केयरिंग्स को भी लागू किया गया जो गोद लेने की लंबी प्रक्रिया को सीमित करता है और गोद लेने के इच्छुक अभिभावकों की भागदौड़ को कम करता है। इसके बाद भी देश में बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या में एक साल के भीतर 25 फीसद से ज्यादा की कमी हुई है। हालांकि आश्चर्यजनक रूप से देश के बाहर रहने वाले लोगों द्वारा यहां के बच्चों को गोद लेने की संख्या में इजाफा हुआ है।

देश के विभिन्न राज्यों के अनाथालयों में कितने बच्चे मौजूद हैं इसका सही-सही आंकड़ा तो किसी के पास नहीं है लेकिन 2013 में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने दावा किया था कि केवल 930 बच्चे ही अनाथालयों में रह रहे हैं। जाहिर है इस दावे में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है क्योंकि वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में जो आंकड़ा पेश किया गया है वह इससे 10 हजार गुना से भी ज्यादा है। इसके मुताबिक देश भर के अनाथालयों में करीब 11 मिलियन बच्चे किसी के द्वारा अपनाए जाने का इंतजार कर रहे हैं और इनमें 90 फीसद लड़कियां हैं। दूसरी ओर स्वयंसेवी संस्था चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन की मानें तो 2007 में देश में 25 मिलियन अनाथ बच्चे मौजूद थे। इनमें से हर साल केवल 0.04 फीसद बच्चे ही दत्तक ग्रहण प्रक्रिया द्वारा अपनाए जाते हैं।

पिछले पांच सालों में गोद लेने की दर में 50 फीसद की गिरावट आई है जो चिंतनीय है। बिहार, उत्तराखंड, झारखंड और पूर्वोत्तर के सातों राज्य अनाथ बच्चों के प्रति अधिक संवेदनहीन बने हुए हैं और वहां गोद लिये जाने की दर अत्यंत कम है जबकि दक्षिणी राज्यों में स्थिति थोड़ी ठीक है। हालांकि महाराष्ट्र जहां सबसे ज्यादा बच्चे गोद लिये जाते हैं, वहां भी इसकी दर घटी है और यह 2010 के 1606 के मुकाबले 2013 में घटकर 1212 हो गई थी। उत्तर भारत में पारंपरिक सोच और सरकार की उदासीनता का परिणाम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। पूर्वोत्तर में तो ऐसी कोई सरकारी दत्तक ग्रहण एजेंसी भी नहीं है जो लोगों को सही जानकारी देकर गोद लेने में उनकी मदद कर सके। यहां तक कि बिहार में 2007-08 के दौरान गोद लिये गये एक भी बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र नहीं बनवा सकी सरकार। सबसे बुरी स्थिति मेघालय की है जहां पिछले पांच वर्षों में केवल चार बच्चों को गोद लिया गया है। इसी तरह चंडीगढ़ में 2010 से 2014 तक मात्र 9 अनाथ बच्चों को मां-बाप मिल सके थे।

दरअसल बच्चा गोद लेने की इच्छा रखने वाले लोगों की अपेक्षाएं इतनी बड़ी होती हैं कि उनके पूरा होने की गुंजाइश काफी कम हो जाती है। ‘मर्फी बेबी सिंड्रोम’ से ग्रस्त लोगों को बच्चा स्वस्थ, सुंदर और गोरा चाहिए होता है जो बहुत कम ही संभव हो पाता है। यदि अपनी जैविक संतान बीमार हो या उसे कोई शारीरिक अपंगता हो तो मां-बाप उसे ठीक करने के लिए पैसा पानी की तरह बहाने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन एक गोद लिए बच्चे पर इतना खर्च करना वो नहीं चाहते। ऐसे में बीमार या अपंग बच्चों को कोई गोद नहीं लेना चाहता। इसके अलावा 85 फीसद लोगों को 0 से 1 साल तक के बच्चे की चाहत होती है। बेटे को गोद लेने की मंशा एक अलग कारण है क्योंकि देश के अनाथालयों में 90 फीसद लड़कियां हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विस्तार होने और आईवीएफ तथा सरोगेसी को अपनाए जाने के कारण भी लोगों में अनाथ बच्चों को गोद लेने की चाहत घटी है। भारत में अभी भी बच्चा गोद लेने का विकल्प सबसे आखिरी में आता है। वैसे दंपति जिन्हें अपनी संतान नहीं है वे शादी के बाद 20-20 सालों तक अपने बच्चे का इंतजार करते हैं लेकिन जब तक बच्चा गोद लेने का फैसला लेते हैं तब तक उनकी उम्र दत्तक ग्रहण कानून के मुताबिक गोद लेने लायक नहीं रह जाती। भारत में यदि दंपति की उम्र मिलाकर 90 वर्ष से ज्यादा हो जाय तो उन्हें बच्चा गोद नहीं दिया जा सकता है। देश में दत्तक ग्रहण कानून भी इतना लंबा खिंचने वाला है कि लोग इससे दूर भागने लगे हैं। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने में आम तौर पर साल भर से भी ज्यादा समय लग जाता है। इसकी वजह से बच्चा गोद देने का काला धंधा तेजी से फलने-फूलने लगा है। नर्सिंग होम और अस्पतालों से सीधे बच्चा गोद देने का कारोबार बढ़ रहा है जो न तो पकड़ में आते हैं और न ही रिकार्ड में। इसके अलावा गरीब मां-बाप द्वारा अपने बच्चों को बेचने के भी मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं जिसका फायदा लोग उठा लेते हैं। धोखाधड़ी का एक मामला 2010 में पुणे में सामने आया था जहां अनाथालय चलाने वाले एक व्यक्ति ने एक दंपति को एचआईवी पाजिटीव बच्चा एक लाख में बेच दिया था। जब बच्चे की मौत हो गई और दंपति को पता चला कि बच्चा पहले से ही एचआईवी पाजिटीव था तो उन्होंने आश्रम चलाने वाले व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और वह पकड़ा गया। उसी साल पुणे का सबसे बड़ा अनाथ आश्रम चलाने वाले जोगिन्दर सिंह भसीन को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया। भसीन पर आरोप था कि वह गरीब मां-बाप की संतानों को खरीद कर अनाथ आश्रम में ले आता था और फिर उन्हें महंगी कीमत पर विदेशियों को बेच दिया करता था। कानूनी तौर पर विदेशी दंपतियों को बच्चा गोद लेने के बदले 5 हजार डालर की राशि चुकानी पड़ती है जबकि चोर बाजार में उनसे 20 हजार डालर तक ले लिये जाते हैं।

दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में आने वाली परेशानियों और उससे होने वाले नुकसान की ओर केन्द्र सरकार का भी ध्यान गया है और संबंधित कानून में कई बदलाव किये गये हैं। विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट विभाग को साफ-साफ कह दिया है कि केवल जन्म प्रमाणपत्र की ही मांग न करें बल्कि अदालत में तय की गई आयु को भी मान्यता दें। इस आदेश के बाद कई लोगों को राहत मिली है। इसके साथ ही उन्हें यह भी आदेश दिया गया है कि विदेशी दंपति द्वारा गोद ली गई संतानों का पासपोर्ट जल्दी बनाया जाय ताकि वे जल्द से जल्द उन्हें अपने घर ले जा सकें। महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सुस्ती दिखाने वाले और खराब प्रदर्शन करने वाले एनजीओ को भी बंद करने की चेतावनी दी है और उन्हें अच्छा काम करने के लिए कहा है। हालांकि दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि दत्तक ग्रहण के कार्य से जुड़े सभी संगठनों को ‘कारा’ के अंतर्गत लाया जाय ताकि सभी की पर्याप्त निगरानी की जा सके। इस समय देश भर में केवल 400 एजेंसी ही ‘कारा’ से जुड़ी हैं। हर अनाथालय को इसके झंडे के नीचे लाना होगा। इसके अलावे उनका कहना है कि ‘कारा’ हर प्रक्रिया को आनलाइन करना चाहती है जो संभव नहीं है क्योंकि बच्चे को गोद लेना कोई मशीनी काम नहीं है बल्कि इसमें लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं। ‘कारा’ के इस रवैये से स्वयंसेवी संगठनों में नाराजगी है।