ख्वाहिशों का भार ढोते बच्चे शोमा ए. चटर्जी (स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखिका )

8 जनवरी, 2007 को कोलकाता के उपनगर में 14  साल का विश्वदीप भट्टाचार्जी अपने पिता के साथ छत पर टेबल टेनिस खेलने के दौरान बेहोश होकर गिर पड़ा और बाद में उसकी मौत हो गई। एक सप्ताह बाद ही बेंगलुरू में 20 साल की सम्पाली मिद्या ने टुमकुर स्टेशन पर चलती ट्रेन से कूदकर अपनी जान दे दी। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में रोज बड स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला 13 साल का देवव्रत राय पढ़ाई के लिए पिता की डांट से परेशान होकर घर छोड़कर चला गया। वह क्रिकेट में ज्यादा ध्यान लगाता था।

उपरोक्त तीन मामले तो केवल उदाहरण हैं क्योंकि बच्चों की उत्पीड़न और मौत के ज्यादातर मामले मीडिया में आ ही नहीं पाते। इसके अलावा ये घटनाएं केवल पश्चिम बंगाल की हैं जबकि पूरे देश का यही हाल है। भारत में परिवार नाम की इकाई एकजुटता के आधार पर चलती है चाहे इसके लिए बच्चों की कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। इसलिए अगर घर में पिता बच्चों को प्रताड़ित करते हैं तो कोई भी मां इसकी थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराएगी और न ही वो अपने परिवार की काउंसिलिंग के लिए किसी के पास जाएगी चाहे परिवार का कोई सदस्य उत्पीड़न का शिकार ही क्यों न हो रहा हो। हमारे देश की विधि व्यवस्था भी बच्चों को उनके मां-बाप की प्रताड़ना, क्रूरता या दवाब से बचाने के लिए कोई उपाय नहीं बताती है। यह अफसोसनाक है क्योंकि अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में अगर मां-बाप बच्चे को प्रताड़ित करते हैं तो बच्चे को उनसे छीन लेने जैसा सख्त कानून मौजूद है।

विश्वदीप पांच साल की उम्र से टेबल टेनिस खेलता आ रहा था और उसने कई बार राज्य का प्रतिनिधित्व भी किया था लेकिन वह अपने पिता को संतुष्ट नहीं कर पाता था। जिस दिन उसकी मौत हुई, वह 6 बजे सुबह ही प्रैक्टिस करके लौटा था। नाश्ता करने के तुरंत बाद पिता ने उसे अपनी बहन नेहा के साथ खेलने के लिए भेज दिया और उसके साथ साढ़े दस बजे तक खेलने के फौरन बाद पिता ने उसे अपने साथ टेबल टेनिस खेलने का दवाब डाला। पिता के साथ खेलने के दौरान जब एक बार विश्वदीप रिटर्न सर्विस नहीं दे सका तो पिता ने उस पर प्लास्टिक की किसी चीज से वार किया। चोट लगने के बाद भी विश्वदीप खेलता रहा। इसी दौरान साढ़े बारह बजे प्रैक्टिस करते-करते वह बेहोश होकर गिर गया। उसे फौरन बांगुर अस्पताल ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। विश्वदीप के कोच तपन चंद्रा ने उसकी मौत की पूरी जिम्मेदारी पिता दीपक पर डालते हुए कहा कि वे मेरे दोस्त भी हैं और मैंने उन्हें कई बार समझाया था कि अपने गुस्से पर काबू रखें। दीपक अक्सर विश्वदीप को बुरी तरह मारते थे जिसके कारण उसकी मौत हो गई। एक बार तो उसने विश्वदीप की चेन से पिटाई कर दी थी जिसके बाद मुझे उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह खून का जमना बताया गया जो किसी चीज से चोट लगने के कारण हो सकता है। विश्वदीप की मां ने अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवायी जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

बर्दवान के कुरमुल के एक स्कूल में साइंस टीचर की बेटी सम्पाली बेंगलुरू के अल्फा इंजीनियरिंग कालेज में कम्प्यूटर साइंस की छात्रा थी। वह परीक्षा में अच्छा नहीं कर पा रही थी और उसे लगता था कि वह अपने पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रही है। इसलिए उसने जान दे दी। उसके पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई करे जबकि वह खुद ऐसा नहीं चाहती थी। उसकी शिक्षिका पूर्णिमा ने बताया था कि वह पढ़ाई में अच्छी नहीं थी और हमें लगता था कि वह गलत लाइन पर चल रही है। सम्पाली ने मरने से पहले अपने पिता के नाम चिट्ठी में सारी बातें लिखी थीं। देवव्रत के पिता रामबहादुर कोलकाता के निकट बेलूर में खटाल चलाते हैं और अपने बेटे को उंचाई पर देखना चाहते हैं। उन्होंने उसका दाखिला शहर के इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवाया था। बैली पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर असित सेन ने बताया कि देवव्रत एक बार पहले भी घर से भाग चुका था जब वह पांचवी में पढ़ता था। उनके मुताबिक वह अपने पिता के दवाब से घबड़ा कर घर से भाग गया है।

दवाब कई और तरह के भी होते हैं। 19 नवम्बर, 2006 को खंडवा के भीखनगांव की छह साल की सानिया ने लगातार 64 घंटे गाकर लिम्का बुक आफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करवाया था। उसने इंदौर की आकांक्षा का 61 घंटे तक लगातार गाना गाने का रिकार्ड तोड़ा था। उसने 745 गाने गाए जिनमें फिल्मी और भक्ति गीत शामिल थे। जब सानिया से पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया तो उसने कहा कि उसे कुछ अलग करने की बड़ी तमन्ना थी। क्या एक छह साल की बच्ची ऐसा सोच सकती है? इंदौर के दीपक गुप्ता ने 101 घंटे तक लगातार गाना गाकर सानिया का रिकार्ड अगले दिन ही तोड़ दिया। आखिर मां-बाप कुछ समय की लोकप्रियता के लिए क्यों अपने बच्चों को इस प्रकार की दौड़ में झोंक देते हैं। इसके पीछे उनकी टीवी चैनलों पर दिखाई देने की महत्वाकांक्षा हो सकती है। इसी तरह एक बच्ची घंटों तक चपाती बनाने की प्रतियोगिता में बेहोश हो गई। उस बच्ची को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई। आखिर ये किस तरह का अभिभावकत्व है जो बच्चों को इतने दवाब में काम करने के लिए विवश कर देता है? ऐसे रिकाॅर्ड बनाने की जरूरत ही क्या है जो एक हफ्ते के बाद ही किसी और बच्चे के द्वारा तोड़ दिया जाय?

इस मामले में अमेरिका और ब्रिटेन भी कुछ कम नहीं हैं। ‘मैडनेस आफ माडर्न फैमिलीज’ में लेखक द्वय मेग सैंडर्स और एनी एशवर्थ लिखते हैं कि कैसे पढ़े-लिखे और समझदार माता-पिता भी दूसरे परिवारों से आगे निकलने की होड़ में अपने बच्चों के साथ अजीबोगरीब तरीके अपनाते हैं। अपने घर में छोटे बच्चों को एग-स्पून दौड़ के लिए चुपचाप तैयार करने से लेकर स्कूल ट्रिप पर फ्रांस गए बच्चों की बस का पीछा करने तक में मां-बाप सनक की हद तक लगे रहते हैं। इस किताब में उन मां-बाप के बारे में बताया गया है जो बच्चों के सोने के कमरे में विदेशी भाषा के रेडियो स्टेशन लगाते हैं ताकि बच्चा सोते समय उस भाषा को सीख सके। अमेरिका में  मध्यवर्गीय माता-पिता बहुत शुरू से ही इस प्रयास में लग जाते हैं कि उनके बच्चों को अच्छे नंबर मिल सके और उनका दाखिला अच्छे काॅलेज में हो सके। सैंडर्स और एनी ने किताब में दबाव देने वाले अभिभावकों को श्रेणीबद्ध कर इसे हल्का बनाए रखने की कोशिश की है। एक ऐसी हेलीकाप्टर मां है जो बच्चे को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखने के लिए उसके चारों ओर घूमती रहती है। एक ऐसे टचलाइन पिता हैं जो अपने बेटे को फुटबाल खेलने के लिए हमेशा उकसाते रहते हैं जिसे फुटबाल खेलना पसंद नहीं है। ऐसे ही एक और टचलाइन मां है जो स्वीमिंग पूल के किनारे अपने मोबाइल पर स्टापवाच लगाकर बेटे की निगरानी करती है। इको मम्मी हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहती है कि उनके बेटे के खाने की प्लेट में शुद्ध सब्जियां और आर्गेनिक मशरूम है कि नहीं। क्राफ्ट मम्मी पत्तियों और घास के कोलाज बनाकर अपने बच्चों को देती हैं और चाहती हैं कि वे भी हमेशा कुछ न कुछ बनाते रहे।

खेल और पढ़ाई के मामले में दवाब बनाने वाले माता-पिता सबसे बुरा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। एक बच्ची के मां-बाप उसे सप्ताह में दो बार स्वीमिंग के लिए सुबह छह बजे के सेशन करने और पांच बार स्कूल के बाद के सेशन करने के लिए कहते हैं। यहां तक कि बच्ची का एक हाथ टूट जाने के बाद भी उस पर स्वीमिंग करने के लिए दवाब डाला जाता रहा। बच्ची को तैराकी के दौरान अपने टूटे प्लास्टर चढ़े हाथ को पानी से बाहर रखना पड़ता था। एक और टेनिस खिलाड़ी को उसकी मां ने ट्रेनिंग रोक देने के लिए कहा क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी बेटी जीत नहीं सकती। तो दवाब डालने और प्रेरित करने के बीच फर्क कैसे पता लगेगा? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि वैसे माता-पिता जो जीवन में कुछ बनना चाहते थे लेकिन बन नहीं पाए, वे अपने बच्चों के जरिये उसे पूरा करना चाहते हैं। बेले व्यू में मुख्य मनोवैज्ञानिक डा. शिलादित्य राय कहते हैं कि ऐसे मां-बाप यह समझने में भूल कर जाते हैं कि संभव है कि उनके बच्चे भी वो काम न कर पाएं। विश्वदीप और सम्पाली के पिता करो या सजा पाओ की इसी मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण हैं। विश्वदीप की दुखद मौत पर खेल मनोवैज्ञानिक लैला दास कहती हैं कि पिता द्वारा लगातार दवाब बनाए जाने के कारण बच्चे के मन में डर बैठ गया होगा जिसके कारण उसे हार्ट अटैक आया होगा। अमेरिका की ओलंपिक जिम्नास्ट डामिनिक माकिनो जिन्होंने अपने मां-बाप से तलाक की मांग की है, कहती हैं कि उन्होंने कभी बचपन देखा ही नहीं। मैंने हमेशा सिर्फ जिम को देखा। मैं सोचती हूं जिम्नास्टिक के अलावा आपने क्या जाना। क्या हम आइसक्रीम खाने नहीं जा सकते? क्या आप मेरे मां और पापा नहीं हो सकते? बालीवुड में कभी टाप शीर्ष बाल कलाकार रह चुकीं डेजी ईरानी बेहद बुरे अनुभव के बारे में बताती हैं ‘‘शूटिंग के दौरान एक बार रोने का सीन होने पर मेरी मां ने मुझे चींटी काटा था ताकि मैं रोउं। मुझे शुरुआत में केवल दो साल के लिए स्कूल से हटाया गया था लेकिन दोबारा कभी स्कूल नहीं भेजा गया। मैंने कभी अपने कमाए पैसे को नहीं देखा। मुझे शूटिंग करने या कैमरे के सामने जाने से नफरत थी लेकिन मेरी मां को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मुझे आजादी तब मिली जब मैंने अपने से कहीं ज्यादा उम्र के व्यक्ति से शादी कर ली। मैंने अपने तीनों बच्चों में से किसी पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए दवाब नहीं डाला।” राज कपूर की  मशहूर फिल्म बूट पालिश में काम कर चुकीं बेबी नाज ने बताया था कि उनके मां-बाप हमेशा इस बात के लिए झगड़ते रहते थे कि उनके कमाए पैसे का हकदार कौन होगा जबकि वे स्टूडियो में रात के दस-ग्यारह बजे तक काम करने के बाद भूखी बैठी रहती थीं। मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था तो श्रीदेवी ने 4 साल की उम्र से। क्या वे इतनी परिपक्व थीं कि अपना फैसला खुद ले सकें? अगर ये उनका उत्पीड़न नहीं था तो और क्या था?

घरेलू हिंसा की सारी कहानियां बच्चियों और महिलाओं पर केन्द्रित होती हैं। बाल मजदूरी की सभी घटनाओं में उनसे काम करवाने वाले नियोक्ता निशाने पर रहते हैं। लेकिन जब मां-बाप ही अपने बच्चों का उत्पीड़न करने लगें, उनकी मौत का जिम्मेदार बन जाएं तो क्या करना चाहिए? अगर अब आप किसी बच्ची को अपनी बाथरूम से निकलती मां को यह कहते हुए देखें कि ‘‘वह छोटी बच्ची की तरह लग रही है” तो एक मिनट के लिए रुकें और उसे एक विकल्प देकर देखें कि यह बच्ची भी अपनी बालकनी में दूसरे बच्चों के साथ खेल रही है।