कठिन है साझा परवरिश की राह-Ms. Flavia Agnes


flavia2बच्चों के संरक्षण और अभिभावकत्व से जुड़े अंग्रेजी कानूनों की शुरुआत इस सिद्धांत से हुई थी कि पिता ही बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक हैं। इस सिद्धांत को भारत समेत सभी कामनवेल्थ देशों ने अपनाया था जो गार्जियन्स एंड वार्ड एक्ट, 1890 (जीडब्ल्यूए) में झलकता भी था।

1956 में जब हिन्दू कोड बनाया जा रहा था तो हिन्दुओं को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया और उन्हें विशेष दर्जे में रखते हुए हिन्दू माइनारिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 (एचएमजीए) का निर्माण किया गया। बाकी के अल्पसंख्यक समुदायों ईसाई, मुसलमान और पारसी को पूर्व के जीडब्ल्यूए के तहत रखा गया। हालांकि वैवाहिक याचिकाओं के लिए सभी पर्सनल कानूनों में समान सिद्धांत का पालन किया जाता रहा।

        यद्यपि सिद्धांततः पिता को बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक माना गया लेकिन फिर भी मां की भूमिका प्राथमिक देखभाल के लिए महत्वपूर्ण मानी गई और तलाक की स्थिति में बच्चे का शारीरिक संरक्षण मां को दिया जाने लगा। हालंkकि इसे अस्थायी व्यवस्था ही समझा गया। जिन मामलों में मां पर अनैतिकता का आरोप लगा हो या जहां मां ने दूसरी शादी कर ली हो, उन मामलों में उसे बच्चे की कस्टडी प्राप्त करने से वंचित रखा जाता था। हालांकि समान अवस्था में यदि पिता पर बच्चों की उपेक्षा करने, उन्हें मारने-पीटने, अनैतिक व्यवहार करने या दूसरी शादी कर लेने का आरोप लगा हो तो भी उसे उसके प्राकृतिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था। यह स्थिति तलाकशुदा महिलाओं को उनका अधिकार पाने से रोकती थी। इस अन्याय के विरुद्ध ^^बच्चे का हित सर्वोपरि है’इस न्यायिक सिद्धांत की उत्पत्ति हुई। यह सिद्धांत पिता का बच्चे पर प्राकृतिक अधिकार वाले सिद्धांत में एक छेद के समान था। आज संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों के कन्वेंशन (यूएनसीआरसी) पर आधारित इस सिद्धांत को तमाम सीमागत और परंपरागत कानूनों से परे रखकर हर जगह अपनाया जा रहा है। बच्चों के संरक्षण, अभिभावकत्व और उस तक पहुंच को अब माता-पिता के अधिकारों के तहत नहीं रखा जा सकता है बल्कि अब बात बच्चों के परम हित की है। अदालतों को बेहद सतर्कतापूर्वक अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना होगा ताकि किसी भी बच्चे के उस मौलिक मानवाधिकार का हनन न हो सके जो उसे बिना डर और कष्ट के जीने की आजादी देता है।

            वास्तव में यह नीति उससे भी ज्यादा जटिल है जितनी की सामने दिखाई देती है। अगर पिता अमीर हो लेकिन मां के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन न हो तो बच्चे का हित किसके साथ होगा, कुछ मामलों में अदालतों ने यह व्यवस्था दी है कि मां के पास आय का जरिया न होने का यह मतलब कतई नहीं है कि उसे बच्चे की कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। पिता की उच्च सामाजिक स्थिति या उसका चरित्र तथा मां का नैतिक आचार, पिता के पक्ष में फैसला लेने के लिए संपूर्ण तथ्य नहीं हो सकते। इन मामलों में केवल एक ही तथ्य मायने रखता है और वह है बच्चे के प्रति दिखायी जाने वाली सुरक्षा और चिंता की भावना। वैधानिक सिद्धांतों में इस बात को भली-भांति अपनाया जा चुका है कि प्रारंभिक दिनों में बच्चे को उसकी मां के प्यार और देखभाल से अलग करना बच्चे के हित में नहीं होगा। इसके अलावा मां को बच्चे का समान रूप से अभिभावक मानने की सोच भी विकसित हुई है और आज के दौर में सभी आधिकारिक कार्यों, जैसे कि स्कूल में नामांकन कराने, बैंक खाता खुलवाने, पासपोर्ट, राशन कार्ड आदि बनवाने में अभिभावक के रूप में मां के अधिकार को भी मान्यता दी जाने लगी है। हालांकि इस स्थिति को पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है।

        जहां गैर कामकाजी माताओं को आय के साधन न होने की वजह से डराया जाता रहा है वहीं कामकाजी मांओं को भी एक अलग प्रकार के तनाव से गुजरना पड़ता है। क्या एक महिला जो नौकरी कर रही है और दिन का ज्यादातर समय घर से बाहर बिता रही है, बच्चे की देखभाल कर पाने में सक्षम होगीघ् हाल के कई मामलों ने इसका भी जवाब दिया है। यह माना गया कि एक मां को केवल इस कारण से कि वह नौकरी कर रही है, बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं रखा जा सकता है। आज के दौर के कस्टडी मामलों में न तो पिता को, जिसे प्राकृतिक रूप से अभिभावक माना जाता रहा है और न ही मां को, जो जैविक रूप से अभिभावक है, को आसानी से बच्चे की कस्टडी दे दी जाती है। बल्कि बच्चे के परम हित को सर्वोपरि मानते हुए घर के माहौल और उसके पालन-पोषण की व्यवस्था को ध्यान में रखा जाता है। साधारणतया अदालतें बच्चे को उसके वर्तमान माहौल से हटा कर गैर कस्टडी वाले अभिभावक के साथ रखने को तरजीह नहीं देती हैं।

        जब कोई मामला सामने आता है तो आम तौर पर अदालतें  बच्चे को उस अभिभावक के पास ही छोड़ देती हैं जिसके पास वो रह रहा होता है जबकि दूसरे को बच्चे से मिलने की छूट दी जाती है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि बच्चे से मिलने की छूट बच्चे के माता-पिता से मिलने के अधिकार के तहत दी जाती है न कि मां-बाप के अधिकार के तहत।

        वैवाहिक मामलों को देखने वाली अदालतों, काउंसलरों तथा वकीलों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कस्टडी संबंधी किसी भी केस के केन्द्र में एक बच्चा होता है। चूंकि बच्चा केस की सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं होता इसलिए उसकी गैरमौजूदगी में उसके हितों को सुरक्षित रखने का दायित्व कोर्ट का होता है। अदालतें दो पक्षों के बीच की लड़ाई में बच्चे को किसी वस्तु की नहीं देख सकतीं। घरेलू हिंसा के उन मामलों में जहां मां को जबरन घर से बाहर निकाल दिया जाता है, वहां तलाक के बाद बच्चे और मां सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस स्थिति में बच्चे को अदालत में प्रस्तुत कर बिना भय और आशंका के माहौल में उनकी इच्छा पूछी जाती है। वे किसके साथ रहना चाहते हैं, इस बारे में बच्चे को फैसला लेने को कहा जाता है। लेकिन अक्सर बच्चे अपने पिता के खिलाफ कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसका कारण पिता से उनका डर भी हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में अदालत को व्यावहारिक भूमिका निभाते हुए बच्चे के लिए सुरक्षित और स्नेह भरा माहौल बनाना चाहिए। बच्चों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके किसी भी फैसले का उन पर या उनकी मां पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। बच्चे के हित से जुड़ा सिद्धांत उस समय और भी मुश्किल में पड़ जाता है जब बच्चा खुद घरेलू हिंसा का शिकार होता है या वो अपनी मां के साथ हिंसा को देख चुका होता है। इन मामलों में अत्यधिक संवेदनशीलता की जरूरत होती है ताकि बच्चा दोबारा से सदमे में न चला जाय। ऐसे में कोर्ट पिता को बच्चे से मिलने की आसान छूट न देते हुए थोड़े समय के लिए ही मिलने की छूट दे सकता है जिससे कि बच्चे को पिता के साथ अच्छे संबंध दोबारा स्थापित करने के लिए समय मिल सके। बच्चे की भावनाओं को देखते हुए अदालत इस समय में धीरे-धीरे बढ़ोतरी कर सकती है। हाल के दिनों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें बच्चे को पिता या परिवार का कोई पुरुष यौन हिंसा का शिकार बनाते हैं। पहले से ही टूट चुके परिवारों में कई बार पत्नी से बदला लेने के लिए बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है।

        हाल के दिनों में बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में आई बढ़ोतरी को देखते हुए ला कमीशन आफ इंडिया ने साझा परवरिश की अवधारणा को अपनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किये हैं। यह अवधारणा अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में पहले से ही अपनाई जा रही है। इस धारणा को अपनाए जाने के पीछे जो तर्क दिय जाते हैं उनके मुताबिक अन्य विकसित देशों की तरह भारतीय परिवारों में भी लोगों की भूमिकाएं बदल रही हैं, जैसे कि पुरुष अब घरों में बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी लेने लगे हैं। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह बताया गया है कि बच्चे की परवरिश में मां और पिता दोनों का एक साथ शामिल होना ज्यादा अच्छा है बनिस्पत कि केवल मां या केवल पिता के। हालांकि इस अवधारणा को लागू करने से पहले साफ-साफ कहा गया है कि कोई भी सुधार भारतीय संस्कृति, समाज और लैंगिक संबंधों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

         लगभग सभी विकसित देशों में तलाक के मामलों में फैसला विवाह संबंधी संपत्ति के बंटवारे के साथ ही होता है। साथ ही बच्चे की कस्टडी पाने वाले को अपने घर में रहने और स्वयं व बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए वित्तीय सुरक्षा पाने का हक होता है। उन देशों में अलग हुई महिलाओं के लिए सुविधाजनक आश्रय और अकेली माताओं के लिए वित्तीय सुरक्षा दिये जाने का भी प्रावधान है।

          मौजूदा कानूनों के तहत बच्चे के 18 वर्ष के होने के बाद उसका साथ देने की जिम्मेदारी से पिता को मुक्त किया जा सकता है। ये वो समय होता है जब बच्चे को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती है। जब बच्चा डिग्री कालेज में पहुंचता है तो उस समय अकेली मां को उसका साथ देने के लिए छोड़ दिया जाता है। पिता द्वारा बच्चे को इस तरह उपेक्षित और अकेला छोड़ दिया जाना आईपीसी की धारा 317 की तरह कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जाता है जबकि अगर कोई अकेली मां अत्यधिक दवाब के कारण भी बच्चे को छोड़ती है तो उसके खिलाफ प्रावधान बनता है।

        इस समय हमारे देश के जो हालात हैं, चाहे वह किसी भी वर्ग में हो, वो ये है कि तलाक या विलगाव गंभीर वित्तीय असुरक्षा की ओर धकेलते हैं। आयकर भरने से किसी की आर्थिक स्थिति का पता नहीं चल जाता है और कई मामलों में तो गुजारा भत्ता को भी कम कर दिया जाता है क्योंकि पत्नी और बच्चे को दुख पहुंचाने के लिए पति अपनी अच्छी खासी नौकरी तक छोड़ देते हैं।

        ध्यान देना होगा कि हम जिन विकसित देशों की बात कर रहे हैं वे पहले से ही यह मानते हैं कि माता-पिता दोनों की साझा परवरिश उस स्थिति में बिल्कुल भी ठीक नहीं है जहां किसी एक को दुव्र्यवहार या घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साथ ही गुजारा भत्ता नहीं देने को बच्चों की उपेक्षा का मामला बनाया जा सकता है। इसके अलावा साझा कस्टडी केवल उन्हीं मामलों में दी जा सकती है जहां मां और पिता दोनों का व्यवहार दोस्ताना और अच्छा हो। जहां दोनों एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी का भाव रखते हों और सहयोग करने को तैयार नहीं हों, वहां बच्चे की साझा कस्टडी नहीं दी जानी चाहिए। ज्यादातर मामलों में बच्चे की कस्टडी बेहद विवादास्पद हो जाती है। ऐसा शहरी धनी परिवारों में अधिक होता है। गंभीरता से जरूरत इस बात की है कि तलाकशुदा महिलाओं और उनके बच्चों को वित्तीय सहयोग मिले जो उनके जीवन को स्थिरता प्रदान कर सके।

(लेखिका महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली अधिवक्ता और मुंबई स्थित मजलिस लीगल सेंटर की निदेशक भी हैं।)

 Ms. Flavia Agnes का यह आलेख मंजरी के 8 वें संस्करण ‘बागवान‘ में पूर्व प्रकाशित।