अपनी जिम्मेदारी से न भागें मां-बाप डा. बिंदा सिंह प्रसिद्ध क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट, बिहार

13 साल की बच्ची क्या जानती थी इस दुनिया के बारे में। रिश्तों को उसने मम्मी, पापा और भाई में ही समझा था जो विश्वास और प्रेम से भरे थे। इसलिए फेसबुक पर जब उसे एक ‘दोस्त’ मिला तो वह भी उसे उन्हीं रिश्तों जैसा लगा। दोस्ती परवान चढ़ी और ‘दोस्त’ ने उसे मिलने के लिए बुलाया। खुशी से झूमती वह बच्ची अपने ‘दोस्त’ से मिलने गई लेकिन जब लौटी तो ………..!

हमारे आस-पास की ही कहानी है यह और अगर हम नहीं चेते तो हमारे घर की भी हो सकती है। वह बच्ची कभी सामने तो कभी छिपकर फेसबुक पर चैट किया करती थी। मम्मी ने देख लिया तो डांट दिया वरना कोई बात नहीं। उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनकी बेटी किसके साथ चैट कर रही है। उसका वो तथाकथित दोस्त कौन है। और नतीजा सबके सामने है। सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन जब बच्चे उसका इस्तेमाल कर रहे हों तो सचेत और सतर्क रहना मां-बाप की जिम्मेदारी है।

पटना की ख्यात क्लीनिकल साइकालाजिस्ट डा. बिंदा सिंह बताती हैं कि वर्चुअल फ्रेंडशिप के दौर में सभी को सावधान रहना जरूरी है। चाहे वो कोई बच्चा हो या वयस्क। क्योंकि इंसान का ये स्वभाव होता है कि वह गलत चीजों की ओर जल्दी आकर्षित होता है और अच्छी बातों की अनदेखी करता जाता है। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर फर्जी नाम से आकर्षक अकाउंट बनाने वाले लोगों की कमी नहीं है जो मासूम लोगों को ‘दोस्त’ बनाकर उनके साथ खिलवाड़ करते हैं। डा. बिंदा कहती हैं कि अभिभावकों को न तो बहुत ज्यादा सख्ती से और न ही अत्यधिक ढिलाई से पेश आना चाहिए। उन्हें अपने बच्चों के साथ दोस्त की तरह रहने और अपने साथ हर बात साझा करने की उनमें आदत डालनी चाहिए। मां-बाप को बच्चों के साथ भावनात्मक संबंध विकसित करना चाहिए ताकि वे उनसे डर कर या शरमा कर कोई बात छिपा न सकें। इसके अलावा एक बात जो महत्वपूर्ण है वो यह कि बच्चों का कम्प्यूटर कामन रूम या हाल में रहना चाहिए जिससे वे जो करें सबके सामने करें। प्राइवेसी के नाम पर बच्चों में गलत आदत न पड़े इसका ध्यान रखना चाहिए। साथ ही छोटी उम्र में बच्चों को स्मार्ट फोन देने से भी बचना चाहिए। डाॅक्टर कहती हैं कि लगातार सोशल मीडिया में रहने वाले किशोरवय बच्चे अक्सर पहचान की संकट से गुजरने लगते हैं। वर्चुअल रिश्तों में रहते-रहते वे अपने वास्तविक रिश्तों को ही बिगाड़ने लगते हैं जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है।

इसी तरह टीवी पर बच्चे क्या देख रहे हैं यह देखना भी मां-बाप का ही काम है। छोटे या किशोर उम्र के बच्चों के साथ बैठकर टीवी देखने से पहले ये जान लें कि दिखाए जाने वाले धारावाहिक या फिल्म कैसी है। केवल अपने मनोरंजन के लिए उनका भविष्य खराब करने से बचना चाहिए। हिंसक, डरावनी और सेक्स आधारित फिल्में या कार्यक्रम बच्चों के साथ न देखें और न ही उन्हें देखने दें। डा. बिंदा सिंह कहती हैं कि बच्चे एक्सपेरिमेंटल स्वभाव के होते हैं। वे जो देखते हैं उसे खुद करने की कोशिश करते हैं। कई बार छोटे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए हम कार्टून चैनल लगा देते हैं और खुद काम में लग जाते हैं। लेकिन हमें देखना होगा कि उक्त कार्टून की भाषा कैसी है और उसके चरित्र क्या सिखा रहे हैं। कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे के साथ हम खुद भी बैठकर कार्टून देखें ताकि उसके अच्छे-बुरे प्रभाव को जान सकें। साथ ही बच्चों के टीवी देखने का समय भी तय करना चाहिए। ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चे ज्यादा खाने की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं और उनमें शारीरिक कार्य करने की क्षमता घट जाती है। वे दौड़ने या आउटडोर गेम खेलने से कतराने लगते हैं जो उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।

किशोरावस्था को जीवन का सबसे नाजुक और संवेदनशील हिस्सा मानते हुए डा. बिंदा कहती हैं कि इस उम्र के बच्चों की समस्याओं की ओर सभी को ध्यान देना होगा। परिवार से लेकर सरकार तक को इस उम्र की जरूरतों और मनोभावों को समझना होगा। वे कहती हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे-बच्चियों अथवा झुग्गियों और स्लम में रहने वाले बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक सभी प्रकार की बातों की सही जानकारी देना बहुत जरूरी है। निजी स्कूल तो अपने स्तर से किशोर छात्र-छात्राओं की काउंसिलिंग कराते हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में कोई काम नहीं हा रहा। वहां भी बच्चों को सेक्स, मासिक चक्र और अपने शरीर से जुड़ी अन्य बातों के बारे में बताना चाहिए। इसके लिए किसी प्रोफेशनल काउंसिलर की मदद लेनी चाहिए और विशेषकर लड़कियों के स्कूल में महिला काउंसिलर को ही जाना चाहिए। साथ ही घर में मां-बाप यदि अपने बच्चों को इन चीजों के बारे में बताएं तो बच्चे गुमराह होने से बच जाते हैं। वे बताती हैं कि किशोर उम्र के बच्चे कई तरह की भ्रांतियों में पड़कर गलत रास्ते पर चल देते हैं जो अंततः उनके लिए घातक सिद्ध होता है। गुप्त रोगों के इलाज के नाम पर पैसे वसूलने वाले झोलाछाप डाक्टर ऐसे बच्चों का गलत फायदा उठाते हैं।

डा. बिंदा सुरक्षित और खुशहाल बचपन के लिए स्कूलों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। हर बच्चा आत्मविश्वास से पूर्ण हो इसके लिए जरूरी है कि हर बच्चे को मौका मिले। स्कूलों में शिक्षक इसमें महती भूमिका निभा सकते हैं। केवल कुछ ही बच्चों को तरजीह न देकर उन्हें हरेक बच्चे की प्रतिभा को समझने और उसे सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके अलावा स्कूलों में सेक्स एजुकेशन और नैतिक मूल्यों दोनों की शिक्षा दी जानी चाहिए तभी हम कामयाब कल की उम्मीद कर सकेंगे।